मेरा गाँव
माना ऊँची ऊँची गगन चुम्बी इमारते नहीं ।पर मेरे गाँव में रौनक आजभी हैं पिज़ा बर्गर की संस्कृति नहीं चौपालों की शान आज भी है । गाडी मोटर का शोर नहीं । पर बैलो के गले की घंटी का शोर आज भी है ।
इन शहरों की गलियां
और मेरे गाँव की बस्ती ।
यहाँ संगमरमर की ज़मी
पर फिसलते से अरमान ।
गाँव में गोबर के फर्श पर
लीपकर बसते मेरे अरमाँ ।
यहाँ पिज़ा बर्गर की चकाचौंध
सी रंगीन शामें ………..।
गाँव की चौपालों पर हुक्कों
की गुड़गुड़ाहट में ठाहको की आवाजें ।
यहाँ तन दिखाने की हौड़
वहाँ तन छुपाने को पैबंद लगाती सभ्यताएं ।
ए शहर तू बड़ा बहुत है ……
पर हर नुक्कड़ चौहराहे पर अकेला खड़ा है ।
मेरे गाँव में तुझ सी शानों शौकत नहीं है
पर आकर देख वाह प्यार बसता बहुत है ।


