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लोकमान ने देश को जोकमान बनाकर नागरिकों को शोकमान और भोकमान बना दिया

 

बिम्मी शर्मा, काठमांडू, २६ अक्टूबर |

यह देश जोकरों का है इसी लिए जोकतंत्र यहां फलफूल रहा है । इसी जोकतंत्र में जोकमान जैसे लोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं । क्योंकि इन्हें पता है बिशात में बिछे हुए पासे नहीं सिर्फ जोकर है । खेलने वाला भी जोकर, खिलाने वाला भी जोकर और देखने, सुनने और पढ्ने वाला दर्शक और पाठक भी जोकर ही हैं । करीब १० साल पहले यहां लोकतंत्र के नाम पर जोकतंत्र आया था । तभी तो लोकमान जैसे लोग देश को जोकमान बना कर हम नागरिकों को शोकमान और भोकमान बना देते हैं । और हम किसी के विरोध में गाली और किसी के समर्थन में ताली बजाने लगते हैं । यह जानते हुए भी कि दोनों तरफ कोई सही नहीं है तब भी हम अपना ईमान दाव पर लगा देते हैं । शायद झुठ और बेईमानी ही हमारी पहचान बन चुकी है ।

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जब राजनीति के दंगल में दोनो पक्ष के खिलाड़ी खासे चतुर, कपटी और दुष्ट हैं तब बुद्धिमान जनता जनार्दन को किसी एक का पक्ष लेने कि बजाय तटस्थ और मौन रह कर दोनों पक्ष का तमाशा देखना चाहिए । पर नहीं हमें तो खुद तमाशें में कूद कर अपना तमाशा बनाने में मजा आता है । यह देश की मीडिया तो है ही खराब का पक्ष पोषण करने वाली । इसी लिए अपनी अकूत काला धन और संपति को गंगाजल से धुलवाने के लिए मीडिया को कनिका चुगने को दे रही है । कौवे के गले में माला पहना दीजिए कैवा कांव, कांव करते हुए पूरे गाँव में घूम कर सबको दिखाएगा । यही हाल नेपाल की मीडिया का है । गलत सही का फर्क पता नहीं चले कौवे की तरह कांव, कांव करने ।

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अपनी ही करनी से स्वर्ग सिधार चूके राजा विरेन्द्र बिना लोकसेवा पास किए हुए व्यक्ति को सरकारी सेवा में ले आए । और उन्ही के भाई और भविश्य के राजा ज्ञानेन्द्र नें भी इस विष वृक्ष को सींचने का काम किया । जब देश में १७ हजार नागरिकों की वलि दे कर लोकतंत्र आया । तब यह लोकतंत्र अन्य देशों से अलग लूटतंत्र के रुप में यहां परिभाषित हुआ । भूखे, नंगे पैदा हुए नेताओं ने राजकोष को अपनी तिजोरी में भरना शुरु कर दिया । फटेहाल नेता जब देश और जनता का हाल बदलने की बजाय अपना ही हालचाल बदल कर देश को बेहाल बनाने में लग गए ।

पिछले साल दिसंबर में अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग द्धारा नेकपा एमाले और एमाओवादी के जिन २९ भ्रष्ट मंत्री और नेताओं के भ्रष्टाचार और अनियमितता के खिलाफ जो पूर्जी काटा गया था । अभी लोकमान कार्की के खिलाफ नेकपा एमाले और एमाओवादी का महाअभियोग लगाना उसी का बदला है । यह बात समझने वाले समझ गए हैं जो ना समझे वह अनाड़ी है । यह देश सिर्फ एक लोकमान के कारण नहीं बल्कि कई सारे रोकमान के कारण पतन की तरफ जा रहा है । पर उन रोकमान को तो कोई रोक नहीं रहा है पर एक पात्र लोकमान को सभी खेद रहे हैं ।

नेपाल और यहां की जनता का यह दुर्भाग्य है कि यहां सिर्फ पात्र को तरजीह दिया जाता है प्रवृति को नहीं । जब राज शासन का अंत किया गया तब भी सिर्फ पात्र ही परिवर्तन हुआ था । प्रवृति तो अभी भी वही है । सामंती सोच वाले ज्यों का त्यों है । यदि सोच में सामंतीपन न होता तो वर्तमान राष्ट्र पति श्रीमती विद्या देवी भंडारी नेपाली सेना के निचले तबके के सैनिक से अपने जुत्ते न उठवाती ? किसी पात्र को सर पर उठाना और उसी को किसी दिन पंसद न आने पर शर से गिरा देना नेपाली समाज कि आदिम परपंरा है । और हम लकिर के फकिर बन कर उसी परपंरा का निर्वाह कर रहे हैं ।

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एक डाक्टर बड़ा ही ईमानदारी का मुखौटा पहन कर बार, बार अनशन में बैठता है । वह जनता को भरमाने के लिए स्वास्थ्य क्षेत्र की कमजोरी का सुधार और देश के नागरिकों को अच्छी स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराने के लिए अनशन का उद्धेश्य बतलाता है । पर उस डाक्टर का असली मंशा तो किसी बडे और लोकमान के दुश्मन का १२ अर्ब की संपति को सरकार की नजर से बचाना है । क्योंंकि अख्तियार की नजर उस अनियमित रुप से कमाए गए १२ अर्ब रुपएं की पोल खोल कर उस व्यक्ति को दंड देने पर थी । इसी लिए डाक्टर ने उस व्यक्ति को बचाने के लिए अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा कर अपने अनशन में लोकमान कार्की के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव लाने की मांग की । क्या यह एक डाक्टर की प्राकृतिक मांग थी ? डाक्टर को अपने स्वास्थ्य क्षेत्र कि कमी कमजोरी को हटाने के लिए हर तरह का अधिकार और कर्तव्य करने और मांग रखने चाहिए । महाभियोग तो संसद और सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है । तब क्यों कोई डाक्टर किसी के लिए सती जा रहा है ?

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एक पत्रकार समाचार लेने और दिखाने के अपने कर्तव्य को भूल कर न्यायाधीश का फैसला देने और करने लगे तो क्या होगा ? जब दोनों ही पक्ष गलत है यह जानते हुए भी किसी एक का पक्ष ले कर उसक घनघोर विरोध करने का मतलब है कि दाल में कुछ काला है । सभी अनलाईन और प्रिंट मीडिया को कौए और चूहे की तरह दाना डाल कर जो आपका विरोधी या नंबर एक दुश्मन है उसी का जाल बुनने और काटने मे लगा दो और चिर्यस करके वीयर्स की चुश्की के साथ ताली बजाते हुए तमाशा देखते रहो । जनता तो है ही मूर्ख जो बताया और दिखाया जाता है उसी को सही मान लेती है । क्योंकि इस देश में बरसों से एक भद्धा सा जोकतंत्र पनप कर विशाल वृक्ष बन गया है ।

किसी दूसरे को चोर या दोषी करार देते हुए तर्जनी उठाओगे तो तीन उंगली तुम्हारी ओर ही मुड़ कर तुम्हें ही दोषी दिखाएगी और प्रश्न करेगी ? जो लोकमान के पक्ष में है वह तो दोषी हैं ही पर जो लोकमान के विपक्ष में खडे हो कर उनका विरोध कर रहे हैं वह भी उतने ही दोषी हैं । क्योंकि वह प्रायोजित जमीन पर खडेÞ हंै और किसी और का दाना चुग कर और किसी को महा शक्तिशाली बनने और दूसरा लोकमान पैदा करनें में भरपूर मदद कर रहे हैं । इसी लिए यह देश इन्ही भेड़चाल वाले नागरिकों के कारण जोकमान बन कर जोकतंत्र में परिणत हो रहा है । (व्यग्ंय)

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