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नेता पद और पावर के मद में इतने चूर हो जाते हैं कि जनता को जन्तु समझते है : बिम्मी शर्मा

 
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बिम्मी शर्मा, बीरगंज , ३० कार्तिक |
नेता रोगी हैं इसी लिए देश भी रोगी है । देश जगह जगह से फट रहा है, देश की अतंडिया फट कर सरे आम बह रही है । देश लकवा ग्रस्त और दमे का मरीज जैसा हर समय खांसता रहता है । नेता खुद देश को आर्यघाट पर पहुंचा रहे हैं । नेता पहले चुनाव जीतने के लिए हर तिकडम करते हैं और जब सत्ता के गलियारे में पहुंच जाते है तब राजकोश पर सेंध मार कर लूट और कोहराम मचाते हैं । नेता पद और पावर के मद में इतने चूर हो जाते हैं कि जनता को जन्तु जैसा व्यवहार करने लगते हैं । जनता को जन्तु मानने के कारण ही यह नेता बाद में महा रोगी और लाइलाज मरीज बन जाते हैं । यह धन के भोगी और शरीर से महा रोगी नेता कालांतर में इतने गरीब और लाचार हो जाते हैं कि अपना ईलाज कराने के लिए भी इनके पास पैसे नहीं होते । इसी लिए सरकार के सामने याचक मुद्रा में प्रस्तुत होते हैं और जनता की खून, पसीने की कमाई को जोकं की तरह चूस लेते हैं । हमारे देश के नेता में ईंसानों का कोई लक्षण नहीं है । यह तो खटमल, मलेरिया, डेगुं और चिकनगुनिया के मच्छर और जोंक जैसे चरित्र के है । बाघ और शेर भी अपना शिकार खुद करते पर हमारे देश के नेता गीदड कि तरह है जो दुसरे का शिकार और परिश्रम की कमाई को लुट कर या चुरा कर खाने में अपना शान समझते हैं ।
जितना बडा नेता उतनी बडी डकैती या लूट । यह नेता जब पद में रहते हैं ता करोडों रुपएं का वारे न्यारे करते हैं । वह पैसा इनका चला जाता है जब अपनी पाप की करनी से रोग ग्रस्त हो जाते है तब इन के पास अपना इलाज कराने के लिए पैसा नहीं होता । जब पद में रहते है तब भी देश को लुटते है और जब पद से बाहर होते है तब भी बिमारी का बहाना कर देश को लूट्ने में कोई कसर नहीं छोड्ते । चाहे राष्ट्रपति हो या प्रधान मंत्री इस देश को बिमारी बहाना बना कर सभी लूट, खसोट रहे हैं । जनता है ही सभी का पेट पालने वाली और सीधे सच्चे मन से सरकार को टैक्स अदा करने वाली कामधेनू गाय । इस देश के सभी नेताओं को पद से हटने के बाद एक ही बार में कैंसर जैसी भयंकर बिमारी ही लग जाती है जो देश और जनता को करोडों का चूना लगाने के बाद ही ठीक होती है । गरीब जनता अपने लिए सरकार से सिटामोल का भी उम्मीद करना छोड चूकी है अस्पताल और ईलाज तो दूर की बात है । इस देश की भोली जनता कितनी दयालू हैं कि खुद के रातदिन रोग से कलपने के बाद भी अपने टैक्स को समय में सरकार को देती है और रोगी नेताओं को निरोगी बनाने में मदद करती है ।
वैसे इस देश मे जनता तो बहुत कम है । बांकी विभिन्न वाद को मानने वाले और पार्टी के कार्यकर्ता और लठैत ही ज्यादा हैं । रोगी नेता देश के लिए कुछ करें न करें पर अपनी पार्टी के लिए कार्यकता की संख्या बढाने मे हमेशा सक्रिय रहते है । जिस के कारण देश निस्क्रिय और रोगी बन जाता है । यह गरीब देश नेताओं को ईलाज के लिए पैसे देने के मामले में सचमुच दान वीर कर्ण है । कर्ण भी कुछ देर के लिए सोचेगें कि दान दें या न दें । पर इस देश के नेता और सरकार तनिक भी नहीं सोचते और फटाक से किसी रोगी नेता को करोड रुपयां ऐसे दे देतें है जैसे पान खाने के बाद कोई पनवाडी को सौ रुपए का नोट देता है । पनवाडी तो छुट्टा वापस कर देता है पर यह रोगी नेता बांकी पैसा वापस तो नहीं करेगें उल्टे स्वर्ग सिधार जाने के बाद अपने साथ ही ले जाते है । ताकि यमराज को कुछ दे दिला कर नर्क की यातना कम कराने की पूरजोर कोशिश करते हैं । सरकार जनता से स्वास्थ्य सेवा कर वसुलती है । गरीब जनता दरिद्र सरकार को अपना पेट काट कर भी टैक्स देनें में संकोच नहीं करती । और इस देश की निर्लज्ज सरकार को अपना कर्तव्य तो कुछ याद नहीं रहता पर अधिकार के नाम पर अपने मन माफिक जनता से टैक्स के रुप में खून के आंसू निचोड लेती है ।
इस देश के प्रधान मंत्री डेढ लाख रुपएं के पलगं मे सोते है । एक साधारण नेत्री डेढ लाख का बैग ले कर चलती है । पर जब बीमार पडते हैं तो यह इतने गरीब और दरिद्र हो जाते हैं कि सरकार से ईलाज के लिए पैसे मागंते है वह भी देश में नहीं विदेश में ईलाज कराने के लिए । नेताओं को इस देश के अस्पताल और यहां के डाक्टर पर रत्ति भर भी बिश्वास नहीं है । इसी लिए सात समुन्दर पार ईलाज के लिए जाते है और करोडों रुपएं का खर्चा करवा डालते हैं । ताज्जुब की बात यह है कि इसी गरीब और फटेहाल देश में मेडिकल शिक्षा बहुत महंगी है । जनता की पहुंच स्वास्थ्य सेवा में बहुत कम है, नेता गण अपना ईलाज करवाने विदेश चले जाते हैं तब अस्पताल और डाक्टर किसके लिए बने है ? क्या यह सब इस देश के हाथी के दिखाने वाला दांत है चबाने वाला नहीं ? देश के राज कोष पर नेता गण नाग कि तरह कुंडली मार कर बैठे है । बेचारी जनता ईन्ही नाग जैसे डंक मारने वाले नेताओं को अपने टैक्स के रुप में दूध पिलाती है ।
एक सुजाता कोईराला ही दोषी नहीं है । राज कोष पर लुट हरेक तंत्र में होता आया है । तभी तो लोकतंत्र के नाम पर लूटतंत्र अपने पूरे शबाब पर है । एक सुंदर नव यौवना को देख कर जैसे सभी लार टपकाते हैं और मौका मिलने पर सभी उसको लूट कर अपनी प्यास बुझाते हैं । देश भी उसी तरह का हो गया है । वह नव यौवना भी रात दिन के उत्पीडन से अंदर ही अंदर गलती और जलती है । देश भी बेईमान, भ्रष्ट, दरिद्र और व्यभिचारी नेताओं के जल और गल रहा है । नेता खुद अपने करतुत से रोगी बन कर देश को महा रोगी बना रहे हैं । अतिंम अवस्था में पहुचे रोगी को जिस तरह उसके अपने लोग घेर कर बैठ जाते है । उसी तरह लाचार जनता चुपचाप देश को मरते हुए देखने के लिए अभिशप्त हैं । ( व्यग्ंय)

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