Sun. Aug 23rd, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

अंगीकृत को संवैधानिक पद देने का अभ्यास नहीं है

 

shekhar-koerala
नेपाल–भारत का सम्बन्ध सदियों से अच्छा चल रहा है । लेकिन पिछली बार इसमें कुछ आशंका जताने वाले भी है । पिछले साल हुए मधेश आन्दोलन और नाकाबन्दी के बाद नेपाल–भारत सम्बन्ध को लेकर खूब बहस भी हो रही है । साथ में हिन्दी भाषा का बहस भी जुड़ गया है । इसी सन्दर्भ को लेकर हिमालिनी के लिए सलाहकार समिति के सदस्य वरुण मिश्रा ने नेपाली कांग्रेस के नेता डा. शेखर कोइराला के साथ विराटनगर में बातचीत किया है, प्रस्तुत है उसका संपादित अंश–
० क्या आप मानते हैं, मधेश आन्दोलन के क्रम में भारत की ओर से नाकाबन्दी हुई थी ?
– जी हाँ । नाकाबन्दी के कारण लाखों सर्वसाधारण प्रभावित हुए थे । मधेश से लेकर काठमांडू तक के नागरिकों को हर समान के लिए वास्तविक मूल्य से ज्यादा देना पड़ता था । हम सभी ने देखा है कि आन्दोलन के शुरूआती काल में भारत के कस्टम विभाग रातभर काम करता था, सामान को नेपाल की ओर पास करते थे । ओभरटाइम काम करके भी क्लियरेन्स करते थे । जिस कामके लिए भारत सरकार की प्रशंसा भी ही हुई है । लेकिन जब नाकाबन्दी किया गया, तब से यह कुछ भी नहीं हो पाया ।
० लेकिन सीमा पर मधेसी मोर्चा बंद का आह्वान कर रहे थे, आन्दोलनकारी के द्वारा उस समय दर्जनों सवारी साधन में तोड़फोड़ भी हुई थी । लेकिन आप कैसे कहते है कि यह तो भारत की तरफ से की गयी अघोषित नाकाबन्दी थी ?
– सही कहा आपने । कुछ सीमाओं में आन्दोलनकारी आन्दोलन कर रहे थे, सवारी साधन भी बन्द था । लेकिन सभी सीमाओं में आन्दोलनकारी नहीं थे । अगर भारत चाहता तो उस नाके से नेपाल में सामान भेज सकता था, जहाँ आन्दोलन का प्रभाव नहीं था । जैसे की काकड़भिट्टा नाका को ले सकते हैं ।
० सार्क सम्मेलन में नेपाल सरकार ने जो रुख दिखाया, उसके सम्बन्ध में कुछ कहेंगे ?
– भारत–नेपाल बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध है । पाकिस्तान के कारण भारत ने घोषणा किया कि भारत सार्क सम्मेलन में सहभागी नहीं हो सकता । लेकिन नेपाल सरकार ने कहा कि सार्क सम्मेलन होना ही चाहिए । सार्क–अध्यक्ष राष्ट्र होने के नाते यह स्वभाविक भी है । फिर भी नेपाल सरकार ने भारत को ही साथ दिया है । यहाँ विभिन्न राजनीतिक दलों का बयान भी भारत के पक्ष में ही आया है । हम सब महसूस कर सकते हैं कि अगर भारत–पाकिस्तान के बीच समझदारी न हो, तो सार्क सम्मेलन का कोई भी औचित्य नहीं है । सार्क देशों में से कोई भी एक राष्ट्र, सार्क सम्मेलन को बहिष्कार करता है तो सम्मेलन नहीं हो सकता, सार्क के अन्दर यह नियम भी है । हम उम्मीद करते हैं कि भारत–पाक सम्बन्ध पुनः सुमधुर बनेगा और सार्क पुनः अपनी गति लेने मे सफल होगा ।
० अभी हाल, अंगीकृत नागरिकता के सम्बन्ध में खूब बहस हो रही है, इस सम्बन्ध में आप क्या कहते हैं ?
– अंगीकृत नागरिक वो है, जो बाहर देश से आकर नेपाल की नागरिक प्राप्त करता है । ऐसे नागरिकों को संवैधानिक पद मिलना चाहिए या नहीं, इस प्रश्नों को लेकर कुछ बहस हो रही है । मुझे लगता है कि अंगीकृत नागरिकों को संवैधानिक पद नहीं मिलना चाहिए । राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, प्रधानन्यायाधीश जैसे कुछ पद ऐसे होते है, जो यहाँ के आदिवासी अर्थात् वंशज नागरिक ही उसमें दावा कर सकते हैं । विश्व के कई देशों में ऐसा ही अभ्यास होता आ रहा है । भारत हो या अन्य किसी देश, वहाँ से शादी करके आई हुई महिलाओं को संवैधानिक पद देने का सवाल ही नहीं उठता ।
० हिन्दी भाषा को लेकर भी विवाद हो रहा है, क्या हिन्दी नेपाल के राष्ट्रीय भाषा नहीं बन सकता ?
– नेपाल में नेपाली भाषा के बाद सबसे ज्यादा बोले जानेवाले भाषा मैथिली, भोजपूरी, अवधी आदि हैं । लाखों लोगों के लिए यह मातृभाषा भी है । ऐसी अवस्था में हम लोग कैसे हिन्दी को स्वीकार करें ? हिन्दी, भारत के लिए राष्ट्रभाषा है, लेकिन नेपाल के लिए नहीं हो सकती ।
० अन्त में, संविधान संशोधन कब होगा ?
– संविधान संशोधन आवश्यक है । क्योंकि इसके बिना संविधान का कार्यान्वयन नहीं हो पाएगा । संविधान में बहुत ऐसे मुद्दे है, जिसका संशोधन होना जरूरी है । नेपाली कांग्रेस संविधान संशोधन के लिए लचीला है । सीमांकन, नागरिकता, भाषा तथा राष्ट्रीय सभा का प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दा में सभी दलों की सहमति होनी आवश्यक है । सभी राजनीतिक दलों को इसे गम्भीरता के साथ लेना चाहिए । तब जाकर शांतिपूर्ण माहौल में संविधान कार्यान्वयन हो सकेगा ।

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may missed

WP2Social Auto Publish Powered By : XYZScripts.com