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पूर्व प्रधानमंत्री ओली की खरी बोली

 

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रविवार संध्या पत्रकार सम्मेलन करते हुए पूर्व प्रधानमंत्री ने वर्तमान हालात पर अपनी ही शैली में वक्तव्य दिया है । एक नजर उनकी बोली पर
अभी संविधान संशोधन में सहभागी होने की कोई सम्ँभावना नहीं है । झुमका और बुलाकी का लोभ दिखाकर बहलाया जा रहा है । मेरी इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है । पर हा संसद किसी भी हालत में नहीं चलने लेंगे ।
हमें भी प्रधानमंत्री ने एक दे बार बुलाया और पूछा कि संशोधन किया जाय या नहीं उस समय मधेशियों से कोई समझौता नहीं हुआ था । फिर अचानक रातोरात सलाह कर प्रस्ताव दर्ता हो गया । उन्हें क्या लगा कि पत्रकार साए हुए हैं । यह प्रस्ताव अदालत का अपमान है ।
पहले गायत्री मंत्र के साथ रेडियो बजता था और सुबह की शुरुआत होती थी किन्तु आजकर तो मधेशी के समाचार के साथ शुरु होती है । कहाँ है आन्दोलन ? आन्दोलनरत हैं पर कहाँ हैं पता नहीं बस ऐसे ही कहे जा रहे हैं ।
सीमापार से बेटा आया शादी हूई, बेटी आई शादी हुई और शाम में पर्स में नागरिकता चहिए । विवाह दर्ता हुआ और नागरिकता मिल गई । भारत में सात वर्ष चाहिए और यहाँ हाथों हाथ चाहिए उसमें भी संतुष्टि नहीं है आश्चर्य की बात है ।
चुनाव की बात आती है कि मधेशी कहते हैं कि चुनाव नहीं होने देंगे । क्या मधेशी के बिना चुनाव नहीं होगा ? मधेशी के नाम में ब्लैकमेलिंग ? प्रदेश में समानुपातिक चाहिए श्र अभी समानुपातिक नहीं है ?
भमरत के साथ कोई दुर्भावना नहीं है । पडोसी है तरक्की करे हमारी शुभकामना है किन्तु हमारे मामले में नहीं हस्तक्षेप करे । हमारा गला दबाने की कोशिश करते हैं और हम चिल्लाए भी नहीं ? कपडे के भीतर हाथ डाल कर चिकोटी काटते हैं और हम उफ तक नहीं करें ऐसा कहाँ होता है ?

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