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नातावाद, कृपावाद से आये न्यायाधीश से निष्पक्ष न्याय की उम्मीद बेमानी ही होगी : मुरलीमनोहर तिवारी

 

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मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु), वीरगंज , १५ जनवरी | न्याय परिषद ने देशभर के उच्च अदालत में ८० न्यायधीश नियुक्ति किया है। जिसमे जिल्ला न्यायाधीश से ३७, नेपाल बार एसोसिएसनबाट से २७ तथा सहसचिव और विशिष्ट श्रेणी से १६, ९ कानुन, न्याय और सरकारी वकिल समूह से नियुक्त किया गया है ।

कानुन व्यावसायी के तर्फ से पार्टीगत आधार में सिफारीस किया गया है। अधिकांश कानुन व्यावसायी नेपाली कांग्रेस के तर्फ से सिफारिस हुए है। माओवादी से १२ सिफारिस हुए है। भौतिक योजना तथा यातायात मन्त्री रमेश लेखक के फूफेरा भाई  सुदर्शनदेव भट्ट भी न्यायधिश हुए। उसी तरह सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश जगदिश पौडेल के बेटा सुवास पौडेल, पूर्व प्रधानमन्त्री तथा नेपाली कांग्रेस के सभापति शेरबाहादुर देउबा के पूर्व पिए मुनिन्द अवस्थी, न्यायपरिषद सदस्य पदम बैदिक के फर्म पार्टनर मदन पोखरेल, परिषद सचिव कृष्ण गिरि का साला धुर्वराज नन्द, गृहमन्त्री विमलेन्द्र निधि का भतिजा रमेश कुमार निधि, राजधानी के शंखमुल में हत्या हुए पूर्व न्यायाधीश रणबहादुर बम का बेटा दीपेन्द्रबहादुर बम को भी न्यायाधीश बनाया गया है । इसमें चौतर्फी रूप से आर्थिक खेलचाल का आरोप भी लगा।

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नेपाल के संविधान के धारा ४२ के उपधारा (१) के अनुसार आर्थिक सामाजिक या शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े महिला, दलित, आदिवासी, जनजाति, मधेशी, थारू, मुस्लिम, पिछड़ा वर्ग, अल्पसंख्यक, सीमान्तकृत, अपांग, लैंगिक तथा भौतिक अल्पसंख्यक, किसान, क्षर्मिक, उत्पीड़ित या पिछड़े क्षेत्र के नागरिक तथा आर्थिक रूप से विपन्न खस आर्य को समानुपातिक समावेशी सिद्धान्त के आधार में राज्य के निकाय में सहभागिता का हक़ होगा।

इस सिद्धांत अनुसार किसी को शामिल नही किया गया। इसमें सिर्फ राजनितिक पहुच का प्रभाव दिखा है। जो अधिवक्ता- बुद्धिजीवी इन दलों के चाटुकार बने थे, उनको जोरदार झापड़ लगा है। जो दलों की सिफारिश से चुने गए, जो नातावाद- कृपावाद से चुने गए उनसे निष्पक्ष न्याय की उम्मीद बेमानी ही है। राज्य जिन चार स्तंभों पर खड़ा रहता है, उसी में दीमक लग जाएं तो राज्य खंडहर बनता है।

दूसरी बात आती है मोर्चा की, मोर्चा की हालत सांप और छुछुंदर जैसी हो गया है, ना निगल सकते है ना ही उगल सकते है। प्रचण्ड सरकार को मोर्चा का समर्थन मिला है, इसलिए इस निर्णय में भी मोर्चा का समर्थन माना जाएगा। अब मोर्चा की समस्या ये है अगर वो इसका विरोध करते है तो संबिधान संशोधन लटक जाएगा, वैसे भी कुछ दिनों से ओली और प्रचण्ड में गलबहियां हो रही है, और गच्छेदार- कमल थापा के सरकार में शामिल होने के अटकलों से रही-सही कसर पूरी हो जाती है।

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मोर्चा बार-बार कह रहा है संशोधन से मधेश की मांग तो पूरा नही होगा, सिर्फ आंदोलन को निष्कर्ष मिलेगा और मोर्चा का फेश सेविंग होगा। मोर्चा ऐसे फसा है कि न्यायधीश प्रकरण का बिरोध करे तो संशोधन भी हाथ से जाएगा, फिर फेस सेविंग भी नही हो पाएगा। ऐसा हर बार होता है जब बंदर को फ़साना होता मटके में मूंगफली दाल दिया जाता है, बंदर मटके में हाथ डालकर मुट्ठी में मूंगफली बंद कर लेता है, अब वो ना ही मुट्ठी खोलता है ना ही भाग पता है, और अंततः पकड़ा जाता है। यही हालत हमारी है, जब संशोधन से कुछ मिलने ही वाला नही है तो बिरोध और प्रतिकार का रास्ता बंद करने की जरूरत क्या है ? एक बार ग़लत पर चुप रहने का अर्थ है, उसे सही प्रमाणित करना। अगर हमारे नेतृत्वकर्ता थक गए है या हार रहे है तो आत्मसमर्पण ना करें, कृप्या उस पर बिरोध और असंतोष प्रकट कर भावी पीढ़ी पर छोड़ दे, लेकिन शोषण का मौन समर्थन ना करें।

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मधेश का उपहास उड़ाने वाले शुरू से उपहास उड़ाते और कमजोर समझते आए है, लेकिन वे गौर करे गजेंद्र बाबु के समय से अब तक मधेश कितना मजबूत हुआ है, और जिस दिन सारे मधेशी एक साथ आ गए, तब कितनी बड़ी शक्ति बनेगी। ख़स शासन का हर शोषण, और हर शोषण से मधेशी नेतृत्व का हारते जाना, कुंठा- आक्रोश और बिस्फोट की परतें बढाता जाता है, इसका एक असर ये हो सकता है कि पूरा मधेश थक-हार कर बुजदिल होकर नत्मस्तक हो जाएं, जो की अमूमन दुनिया में कही भी हुआ नही, दूसरा असर, विस्फ़ोट अलगाववाद का बिकराल रूप लेगा, जिससे मधेश अब तक परहेज करते रहा है।

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