पांचाली तेरे चीर को हरा किसने ? श्वेता दीप्ति
पांचाली तेरे चीर को हरा किसने ? श्वेता दीप्ति, ९ माघ
पांचाली तेरे चीर को हरा किसने ?
ये वही था जिसे ये गुरुर था कि दुनिया उसी की है । 
और तुम सिर्फ एक औरत थी
जिसे ऐसे ही एक गुरुर ने हार दिया था
तुम उस वक्त भी एक समान थी
और आज भी वही सामान हो ।
कुछ भी नहीं बदला
बस वक्त गुजरा है
आज भी औरत में सीता को देखने की चाहत है,
पर हर दिल में दुर्योधन और रावण है ।
पर कल का रावण अच्छा था
भले ही उसकी अच्छाई के पीछे कोई शाप हो
जिसके डर ने उसे तुमसे दूर रखा
पर आज सिर्फ रावण है हर ओर,
निरंकुश और आततायी ।
पर औरत ! आज तुम्हे सीता नहीं बनना
और न ही अपने सतीत्व की परीक्षा देनी है तुम्हे,
क्योंकि आज कही कोई राम नहीं है ।
आज तुम्हे परित्यक्ता होने का डर नहीं होना चाहिए,
क्योंकि तुम न तो सीता हो और न द्रौपदी,
तुम सिर्फ ईश्वर की एक सुन्दर रचना हो,
प्रकृति हो, सृष्टि हो
और इस सबसे ऊपर इंसान हो,
देवी नहीं सिर्फ इंसान ।
श्वेता दीप्ति, ९ माघ


