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हिन्दी का प्रयोग पूरे नेपाल में होता है लेकिन इसे विरोध तथाकथित राष्ट्रवाद से झेलना होता है : कुमार सच्चिदानन्द

 

prachand gaur

कुमार सच्चिदानन्द , वीरगंज ,१७ फरवरी |

११ फरवरी, रौतहट के झिंगुर्वा गाँव में एक मुशायरा का उद्घान करने के क्रम में प्रधानमंत्री प्रचण्ड ने सभा को न केवल हिन्दी वरन अच्छी हिन्दी में सम्बोधित किया । यह महत्वपूर्ण इसलिए है कि न तो हिन्दी उन्होंने कक्षाओं में पढ़ी और न ही विदेशी भाषाओं के स्कूल में हिन्दी का अध्ययन किया । इसके बावजूद वे हिन्दी बोल रहे हैं और अच्छी हिन्दी बोल रहे हैं । यह घटना इस बात को सिद्ध करती है कि जिस हिंदी को विदेशी भाषा कहकर हम उसे हिकारत के भाव से देखते हैं उसकी जडें किसी न किसी रूप में नेपाल में भी हैं ।
दरअसल नेपाल में हिन्दी का समाजशास्त्र ही विचित्र है । यह सच है कि नेपाल में नेपाली के साथ-साथ हिन्दी भी बहुप्रयुक्त भाषा है लेकिन लाख नकारात्मकता के बावजूद इसकी लोकप्रियता का ग्राफ नीचे नहीं आ रहा । नेपाल की राजनीति और राजनीतिज्ञ हिंदी का प्रयोग भाषायी लालीपाप के रूप में करते आ रहे । जब तराई में वे उतरते हैं तो आम लोगों के साथ अपना संवाद हिंदी में करते हैं और ऐसा करनेवाले प्रचण्ड पहले नेता नहीं हैं । मगर जब हिंदी को संवैधानिक मान्यता देने की बात होती है तो बहस शुरू हो जाती है और बहस भी ऐसी जिसमें नकारात्मकता अधिक होती है ।
यह सच है कि हिन्दी का प्रयोग तो पूरे नेपाल में होता है लेकिन इसे विरोध तथाकथित राष्ट्रवाद और क्षेत्रीयता से झेलना होता है । यह सच है कि देश आज लोकतंत्र की हवा में साँस ले रहा है । इसलिए माँगें हर ओर से उठना स्वाभाविक है और इसे लोकतंत्र की शक्ति मानी जा सकती है । लेकिन इन माँगों में से सही आवाज़ को चुनना और संबोधित करना राज्य का धर्म हो जाता है । आज देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है कि एक वर्ग ऐसा है जो भाषा और वेशभूषा में राष्ट्रीयता देख रहा है जबकि दूसरा वर्ग इसे अपनी औपनिवेशिकता का प्रतीक मानता है किसी भी  रूप में इस बंधन को तोड़ना चाहता है । अब इस विवाद से नए रास्ते को को ढूँढ़ना समय का तकाजा है क्योंकि इसके बिना अमन की बातें ख्याली पुलाव मात्र हो सकती हैं ।
यह सच है कि नेपाल का समाज विविधतापूर्ण है । इन विविधताओं के प्रति सम्मान का भाव ही इसकी एकसूत्रता का आधार बन सकता है । किसी की अवहेलना कर या किसी पर दबाब डालकर अगर एकसूत्रता लाने का प्रयास किया जाता है तो ऐसे प्रयासों की असफलता अवश्यम्भावी है । सच है कि नेपाल में अनेक भाषाएँ बोली जाती हैं और हर भाषा के स्थानीय प्रयोगकर्ता इसके प्रयोग और सम्मान में अपना सम्मान देखते हैं । इसलिए आवश्यक है कि राज्य हर भाषा का सम्मान करे, ऐसे वातावरण का निर्माण करे जिसमें सारी भाषाओं की उन्नति और विकास सुनिश्चित हो । लेकिन यहाँ प्रयोग होनेवाली दो बड़ी भाषा धाराओं के प्रयोग का प्रश्रय देकर सरकार भाषायी समस्या का समाधान कर सकती है ।

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भाषा के संबंध में नीतियाँ बनाते हुए हमें इस बात का ध्यान तो रखना ही चाहिए कि गंगा का अजस्र प्रवाह रोकने से भी नहीं रोका जा सकता । वह तो अनवरत बह रहा है । यह हमारी स्वतंत्रता है कि हम कहाँ का पानी पीना चाहते हैं । व्यापार जगत का यह सिद्धांत कि एकाधिकार उत्पादों की गुणवत्ता प्रभावित करता है, भाषा के क्षेत्र में भी लागू होता है । अगर हम नेपाल की भाषाओं का सम्यक् विकास और गुणवत्ता में वृद्धि करना चाहते हैं तो एक सहज और समृद्ध भाषा-धारा से उन्हें जोडना ही होगा ।

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