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नेपाल को पदकों से अलंकृत करानेवाले खिलाडी ! राजेन्द्र भण्डारी ! !

rajendra bhandari
 

आज की राजनीति में ‘स्पोर्टस’ का अच्छा खासा महँत्त्व है। खेल के जरिए देशों के बीच सद्भाव, मैत्री और प्रेम बढÞाया जा सकता है। इसीलिए आज खेल को सिर्फखेल नहीं माना जाता। दूसरी ओर स्वर्ण्र्ााजत-कांस्य विजेता खिलाडी अपनी शोहरत और देश की शान दोनों का साथ-साथ इजÞाफा करते हैं। आइए, नेपाल की गरिमा में चार चाँद लगानेवाले, नेपाली सेना में कार्यरत ३५ वषर्ीय खिलाडी राजेन्द्र भण्डारी के जीवन में जरा नजदीक से झाँकते हैं। भण्डारी मूलतः तनहुँ जिले के हैं, विगत कुछ वर्षों से थानकोट महादेव स्थान-७ में सपरिवार निवास कर रहे हैं।

rajendra bhandari
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हिमालिनी- आपने धावक के रुप में अन्तर्रर्ाा्रीय ख्याति प्राप्त की है। देश का सिर ऊंचा किया है। खेल के प्रति आप में कैसे अभिरुचि उत्पन्न हर्ुइ –
भण्डारी ः मैं नेपाली सेना में कार्यरत जवान हूँ और देश की सेवा कर रहा हूँ। सेना में आन्तरिक स्तर पर अनेकों खेलकूद होते रहते हैं। वैसी ही प्रतिस्पर्धाओं से मुझे खिलाडÞी होकर देश का नाम रौशन करने की प्रेरणा मिली।
हिमालिनी ः आपने शुरुआती दिनों में अभ्यास और संर्घष्ा दोनों को साथ-साथ कैसे सम्भाला –
भण्डारी ः मैं अभी भी हर रोज सुबह में चार घंटे और शाम को दो घंटे दौडÞ का अभ्यास करता हूँ। प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा लेने का मौका मिले, इसके लिए मुझे जीतोडÞ मेहनत करनी पडÞी, धर्ैय करना भी सीखा मगर एक बात शीशे की तरह साफ है कि अगर आप अपनी योग्यता और क्षमता को हर रोज सवाँरेंगे तो आगे आने से आप को कोई नहीं रोक सकता। सूरज को बादल कब तक ढÞक पाएगा –
हिमालिनीः आप जिस क्षेत्र में कार्यरत हैं, उसका रुख आपके प्रति कैसा रहा –
भण्डारीः मुझे नेपाली सेना ने भरपूर मदद की है। पूरा-पूरा सहयोग दिया है। मैं आज जो कुछ बन पाया हूँ, यह नेपाली सेना की बदौलत ही संभव हुआ है। मैं नेपाली सेना के प्रति तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।
हिमालिनी ः आप के विचार में खेलकूद के क्षेत्र में नेपाल सरकार को और क्या-क्या करना चाहिए –
भण्डारी ः बहुत से देशों में मुझे जाने और खेलने का अवसर मिला। अन्य देशों में खेल और खिलाडÞी पर वहाँ की सरकार जितना खर्च करती है, जितनी सुविधाएँ देती है, उसे देखते हुए तो यहाँ कुछ भी नहीं है। आज विश्व में ‘स्पोर्टस-साइन्स’ का बोलबाला है। स्पोर्टस की हर बारीकियों पर पूरा-पूरा ध्यान दिया जाता है। इस बात को हमारी सरकार न जाने कब समझेगी। जितनी जल्दी समझ जाय, उतना ही बेहतर होगा। नेपाली खेल जगत को बेहतर करना हो तो सरकार सबसे पहले खिलाडिÞओ को आधुनिक संसाधन मुहैया करे। उसके बाद पुराने कुशल खिलाडिÞयों से प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करे। फिर खिलाडÞी को आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करे। तब जाकर अपेक्षित परिणाम प्राप्त किया जा सकता है।
हिमालिनी ः आपको स्वर्ण्र्ााजत आदि पदकों से कब-कब, कहा“-कहा“ नवाजा गया –
भण्डारी ः इस्लामावाद, श्रीलंका, बंगलादेश, सिंगापुर आदि देशों में मेरा अच्छा पर््रदर्शन रहा, उन जगहों में मैं पुरस्कृत भी हुआऔर देश का गौरव भी बढÞाया। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर में भी मुझे ढेÞर सारे पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।
हिमालिनी ः इस क्षेत्र में पदार्पण करनेवाले नवागन्तुक खिलाडिÞयों को आप क्या सन्देश देना चाहते हैं –
भण्डारी ः मैं राष्ट्र को क्या दे सकता हूँ और मैंने अभी तक क्या दिया- ऐसा सोचते हुए देश के नाम और गौरव को उँचाई प्रदान करने के लिए वे आगे आवें तो उनका और देशका भला होगा।
हिमालिनी ः भविष्य के लिए आपकी योजना –
भण्डारीः मैं खिलाडÞी हूँ, खिलाडÞी रहूँगा, मेरा जीवन तो अब स्पोर्टस का पर्याय बन चुका है। मैं आजीवन खेल से जुडÞा रहूँगा।
हिमालिनीः सब से ज्यादा खुशी के क्षण –
भण्डारी ः जब जीत मिलती है, पुरस्कार मिलता है, उस समय मुझे अपने देश के राष्ट्रगान की धुन सुनते हुए बहुत आनन्द आता है। छाती चौडÞी हो जाती है।
हिमालिनी ः खेल जीवन की कोई अविस्मरणीय घटना –
भण्डारी ः श्रीलंका में जब मैं जीता, तब मुझ पर डाँपिङ के झूठे आरोप लगाए गए। बाद में आरोप गलत साबित हुआ। उस समय मुझे अत्यन्त आर्श्चर्य और दुःख हुआ, बाद में खुशी भी हर्ुइ।
-हिमालिनी के अतिथि सम्पादक मुकुन्द आचार्यद्वारा ली गई अन्तरवार्ता के आधार पर)

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