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सहमति के मकड़जाल में उलझा कर सरकार धोखा देना चाहती है ? मुरलीमनोहर तिबारी

 

माने या ना माने मधेश की चौथी शक्ति है, सीके राउत, सीके राउत को पकड़ना, जमानत मिलना, फिर एक ही प्रकार मुक़दमे में दुबारा पकड़ना, और ज़ेल में हमला करवाना, इनसब में सरकार की बदनीयत और साज़िश झलकती है, लेकिन इन घटनाओं पर मानवाधिकारवादी संगठन और मधेशी दलो की चुपी एक ही कहानी की तरफ ले जाती है।

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मुरलीमनोहर तिबारी (सिपु),वीरगंज, २६ अप्रैल | मधेशी दलों के एकीकरण से मधेश में ऊर्जा का संचार हुआ है। मोर्चा के सात घटक दलों में से छौ एक साथ आ गए, अब मधेश में दो शक्ति हो गए है, एक फोरम और दूसरा राजपा। ये मधेश के लिए बहुत ही उचित और ब्यवहारिक क़दम है। मधेश की सामाजिक अवस्था ऐसी है कि एक भाई किसी दल में है, तो दूसरा भाई दूसरे दल में। अगर वाक़ई मधेश में एक ही दल रहा तो उस दल से नाराज़ लोग या तो घर बैठ जाएंगे या फ़िर मधेश बिरोधी दल में जाने को मज़बूर हो जाएंगे।

जहाँ तक दलों के नामकरण का सवाल है, सबसे पहले सदभावना पार्टी के नाम में भी ‘मधेश’ नही था, यहां दल के नाम में ‘मधेशी’ रखने से ज्यादा महत्वपूर्ण है, मधेश के लिए ईमानदारी और जबाबदेही रखने की। जिज्ञासा हो रही है कि अब ‘जय मधेश’ के बदले क्या नारा होगा, ‘जय राष्ट्र’ ? अभी की सबसे बड़ी चुनौती है, छौ दलों के मिलन में स्थायित्व हो और गुट-उपगुट ख़त्म हो। मधेश के अधिकार के लिए फोरम और राजपा और ज़्यादा जोश-जांगर से लगे और दो दल रहते हुए भी चुनाव मिलकर लड़े।

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मधेश में इन दो शक्तियों के अलावा दो और शक्तियां है, जिसमे एक है तमरा अभियान, जिसकी गतिविधियां ज्यादा तो नही दिखती, लेकिन मधेश के लिए नीतिगत रूप से लगातार विश्लेष्ण करके मधेशी आवाम को खबरदार और सजग करते आ रहे है, जैसे ही सरकार और मोर्चा के बीच सहमति की खबरें आई, तमरा अभियान ने इन समझौतों के असर की पड़ते खोल दी, मधेश हित में ऐसे संगठन को अलग रखने की कोशिश घातक सिद्ध होगी।

आंदोलन स्थगित की खबरें भी आई, बाद में ख़बर आई की आंदोलन जारी रहेगा। यहां दुबिधा की स्थिति है, पिछले अनुभव से ये सिद्ध हो चूका है, की कई बार सहमति के बाद धोखा ही मिला है। इसलिए जबतक पुख़्ता तरीक़े से अधिकार सुनिश्चित नही होता आंदोलन मन्थर करने की आवश्यक्ता नही है। अब ये भी तय है कि चुनाव दो चरण में होगा, जबकि मोर्चा का अड़ान था, की स्थानीय चुनाव प्रदेश सरकार कराएगी, उस अड़ान का क्या हुआ ? मोर्चा ने कहा, सीमांकन के बग़ैर कोई समझौता नही होगा, लेकिन सहमति में सीमांकन को शब्दों के जाल में उलझाया गया है। जनसँख्या के आधार पर स्थानीय क्षेत्र बढ़ाने का क्या हुआ ? अंगीकृत और भाषा के अधिकार का क्या हुआ ? क्या इतने लंबे संघर्ष से मोर्चा थक गया है, और संघर्ष से बचने के लिए समझौता का खोल ओढ़ रहा है ? क्या मोर्चा बिदेशी शक्तियों से सहयोग लेने के चक्कर में उनके हाथों की कठपुतली बन गया है ? क्या ये संभव नही है कि सहमति के मकड़जाल में उलझा कर बाक़ी प्रदेश में चुनाव कराकर सरकार धोखा देना चाहती है ?

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माने या ना माने मधेश की चौथी शक्ति है, सीके राउत, सीके राउत को पकड़ना, जमानत मिलना, फिर एक ही प्रकार मुक़दमे में दुबारा पकड़ना, और ज़ेल में हमला करवाना, इनसब में सरकार की बदनीयत और साज़िश झलकती है, लेकिन इन घटनाओं पर मानवाधिकारवादी संगठन और मधेशी दलो की चुपी एक ही कहानी की तरफ ले जाती है।

एक चूहा किसान के घर में बिल बना कर रहता था। एक दिन चूहे ने देखा कि किसान और उसकी पत्नी चूहेदानी लेकर आए। ख़तरा भाँपने पर उस ने कबूतर को यह बात बताई कि घर में चूहेदानी आ गयी है।
कबूतर ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा कि मुझे क्या ? मुझे कौनसा उस में फँसना है ? निराश चूहा ये बात मुर्गे को बताया, मुर्गे ने खिल्ली उड़ाते हुए कहा… जा भाई..ये मेरी समस्या नहीं है। हताश चूहे ने बाड़े में जा कर बकरे को ये बात बताई… और बकरा हँसते हँसते लोटपोट होने लगा।

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उसी रात चूहेदानी में खटाक की आवाज़ हुई जिस में एक ज़हरीला साँप फँस गया। अँधेरे में उसकी पूँछ को चूहा समझ कर किसान की पत्नी ने उसे निकाला और साँप ने उसे डंस लिया। तबीयत बिगड़ने पर किसान ने वैद्य को बुलवाया। वैद्य ने उसे कबूतर का सूप पिलाने की सलाह दी। कबूतर अब पतीले में उबल रहा था। खबर सुनकर किसान के कई रिश्तेदार मिलने आ पहुँचे जिनके भोजन प्रबंध हेतु अगले दिन मुर्गे को काटा गया। कुछ दिनों बाद किसान की पत्नी मर गयी… अंतिम संस्कार और मृत्यु भोज में बकरा परोसने के अलावा कोई चारा न था……वह चूहा अब दूर जा चुका था…बहुत दूर ………..।

अगली बारी मोर्चा के अन्य नेता- कार्यकर्त्ता की हो सकती है। मधेश के लिए चारों शक्तियों को कम से कम कुछ मुद्दों पर एक होकर काम करना पड़ेगा। हरेक शोषित, उपेक्षित ये नही सोचे ये मेरी समस्या नहीं है । रुकिए और दुबारा सोचिये…. हम सब खतरे में हैं…समाज का एक अंग, एक तबका, एक नागरिक खतरे में है तो पूरा देश खतरे में है….
जाति पाती के दायरे से बाहर निकलिए। स्वयं तक, पार्टी तक सीमित मत रहिए। समाजिक बनिए संगठित होइए और हरेक क़िस्म के ग़लत के खिलाफ आवाज उठाइए। जय मधेश।।

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