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नेताओं की हरकत देखकर आज शहीद भी शर्मिंदा हो रहे होंगे : डा. मुकेश झा

 

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डा. मुकेश झा, जनकपुर ,१९गते वैशाख | मधेस आंदोलन से नेपाल की राजनीति में लाये हुए परिवर्तन से देश और जनता की अवस्था मे भले ही परिवर्तन नही हुआ परन्तु नेताओं की चांदी हो गई। मधेस मुद्दा को किनारा कर पार्टी जोड़तोड़ का माहिर खिलाड़ी आज भी उसी कार्य मे लगे हैं जिसमे उनकी व्यक्तिगत और थोर बहुत पार्टी की फायदा हो, चाहे मधेस कहीं भी जाए।

बात मधेस की हो और “मसीहा” उपेन्द्र यादव की चर्चा नही हो यह हो ही नही सकती, उसमे भी उस अवस्था मे जब राजनैतिक माहौल गर्म हो। यह एक ऐसे मधेस मसीहा हुए जो मधेस का सारा मुद्दा समेटकर काठमांडु गए और वहीं के हो गए। जिस लिए मधेस ने उनको काठमांडु भेजा उस को छोड़ कर बांकी हरेक काम किए और आज भी यह सिलसिला चल रहा है। भाषण कला में निपुणता, नेपाली उच्चारण में शुद्धता, अन्तर्वार्ता में दक्षता से भरे एक प्रखर व्यक्तित्व अंदर से इतना प्रबल मधेस विरोधी होगा इसका कल्पना शायद ही कोई कर सकता है। वार्ता , सहमति और सम्झौता करने में भी इनकी जोड़ी समूचे नेपाल में नही, परन्तु कारण क्या है जो इनका हस्ताक्षर किया हुआ एक भी समझौता आज तक कार्यान्वयन नही हुआ ? सब से आश्चर्य की बात तो यह है कि इतना होने के वावजूद भी इनको आत्मनिरीक्षण करने का सूझ नही आया। वैसे स्वयं के करतूत पर कभी गौर नही करना किसी भी नेता का विशेषता ही होता है वह उनमे भरपूर है। वर्तमान समय मे पिछले एक दशक से मधेस निरंतर संघर्ष में ही है, जिसमे सौ से ज्यादा शहीद हुए, हजारों घायल हुए, हजारों पर सरकार द्वारा मुकदमा लगाया गया जो आज भी मारे मारे फिर रहे हैं। इन बातों का जरा भी खयाल नहीं करके सत्ता एवम भत्ता के लिए “संसद में संघर्ष” का खोखला नारा दे कर जनमत को लात मार कर आज भी जनविरोधी गतिविधि में शामिल होना शर्मनाक कृत्य है।

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नेपाल सरकार ने मधेसी के छाती में गोली ठोक कर मधेस विरोधी संविधान जारी किया जिसमें कुछ धाराएं ऐसी भी है जिसको संसोधन किये बिना किसी भी चुनाव में जाना या चुनाव को समर्थन करना मूर्खता ही कही जाएगी। स्वयं उपेन्द्र यादव जी ने हरेक कार्यक्रम अन्तर्वार्ता, गोष्ठी, सभा मे वक्तव्य दिया कि जब तक संविधान विधेयक परिमार्जन सहित पेश हो कर संसोधन नही होगा तब तक उनकी पार्टी किसी भी चुनाव में नही जायेगी, फिर आज ऐसी क्या बात हुई जो रातो रात संघीय समाजवादी फोरम चुनाव में जाने की घोषणा कर बैठी ? क्या बाबूराम जी का साथ इतना प्यारा हो गया जो मधेस के मांग को ठोकर मार कर चुनाव में चल दिये ? या मधेसी को धोखा देने की आदत की पुनरावृत्ति है उपेन्द्र यादव जी का ? अब उनके पार्टी का कहना है कि चुनाव में भाग लेना लोकतन्त्र का समर्थन है, लेकिन यह बात भूल गए कि कैसा चुनाव में भाग लेना ? असंवैधानिक चुनाव में भाग लेने से लोकतन्त्र की रक्षा होगी या हत्या होगी ? जनाधार को ठुकराने का परिणाम क्या होता है उसका साक्षी स्वयं उपेन्द्र जी रह चुके हैं, जिसने दरवार से निकालकर राजाओं को फेंक दिया तो फिर कोई पार्टी या नेता कौन सी बड़ी बात है। मधेस को धोखा देने वाला चाहे कोई भी हो मधेसी जनता उसे कतई माफ नही करेगी। अगर संघीय समाजवादी फोरम अपना जनाधार मधेस में बनाये रखना चाहती है तो इस तरह के असंवैधानिक रुप से हो रहे चुनाव को लोकतांत्रिक चुनाव कहना बन्द करे और अविलम्ब अपना घोषणा वापस लेकर संविधान संसोधन के लिए जनवाज के साथ अपना आवाज एक करे, नही तो मधेस के इतिहास का अगर कालिख व्यक्ति एवम पार्टी की गणना हुई तो इनको भी नही बख्शा जाएगा। सवाल यह है कि क्या इसी तरह की संघीयता, लोकतंत्र के लिए मधेसी ने शहादत दिया ? संघीय समाजवादी के वर्तमान हरकत देख कर आज शहीद भी शर्मिंदा हो रहे होंगे , और वह उन चादर एवम झंडे को अपने पार्थिव शरीर से उतार फेंकते जो इनके हाथों से उनपर चढ़ाया गया था।

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