जब पूरा तंत्र ही भ्रष्ट हो तो उसका निराकरण करने वाला बलि का बकरा तो बनेगा ही : श्वेता दीप्ति
कार्की के लिए यह कहा जा सकता है कि कई निर्णय उन्होंने पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किया, जो किसी भी तरह न्यायायिक प्रक्रिया में उचित नहीं माना जा सकता । पर एक बेबाक और साहसी महिला का अपने कार्य क्षेत्र से पटाक्षेप दुर्भाग्यपूर्ण हुआ ।
श्वेता दीप्ति, काठमांडू ,३ मई | बीते हुए सप्ताह में कई आकस्मिक घटनाएँ घटीं । मोर्चा के एकीकरण की तपिश अभी ठन्डी भी नहीं हुई थी कि प्रधानन्यायाधीश सुशीला कार्की पर महाभियोग की घटना ने वातावरण में गरमी ला दी है । न्यायालय के अस्तित्व पर भी सवाल खडे हो रहे हैं । लोकमान के विरुद्ध जब महाभियोग प्रस्ताव पंजीकृत हुआ उसके कुछ समय के बाद ही सुशीला कार्की के बेन्च ने ही लोकमान के अख्तियार प्रमुख की नियुक्ति को बदर किया था । तभी कार्की ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें भी इसी दौर से गुजरना होगा । आलोचना करने वाले चाहे जितनी भी आलोचना करेंं पर कई बातें उनमें अवश्य थीं जिसकी वजह से एक साहसिक प्रधानन्यायाधीश के रूप में उन्हें जरुर जाना जाएगा । उनके अवकाश प्राप्ति में महज एक महीना कुछ दिन ही बाकी थे और इस अवस्था में उन्हें महाभियोग झेलना पड़ा और निलम्बित होना पड़ा । इसके पीछे की वजह भी स्पष्ट है । तकरीबन सभी यह मान रहे हैं कि नेपाल प्रहरी आइजीपी प्रकरण जिसमें अनावश्यक हस्तक्षेप और सक्रियता दिखाने की वजह से उन्हें यह आरोप झेलना पड़ा है ।
उनका कार्यकाल कई मायने में सफल माना जाएगा । परन्तु वो भले ही भ्रष्टाचारी नहीं हों पर अदालत परिसर में होने वाले भ्रष्टाचार को वो रोक नहीं पाईं । हाँ इतना अवश्य हुआ कि भ्रष्टाचार के मुद्दा में कई प्रभावशाली नेताओं को उनके कार्यकाल में सजा मिली । जिसकी वजह से आम जनता में उनकी एक अच्छी छवि बनी । किन्तु आज जो आरोप लगा है कहीं ना कहीं उनकी यह छवि भी कारक रही है । जब पूरा तंत्र और निकाय भ्रष्ट हो तो उसका निराकरण की कोशिश करने वाला बलि का बकरा तो बनेगा है । स्थिति यह है कि जब तक महाभियोग की प्रक्रिया का कोई निष्कर्ष आएगा तब तक वो न्यायिक कार्यक्षेत्र से मुक्त हो चुकी होंगी । इतना ही नहीं आगे भी वो न्यायिक क्षेत्र में किसी भी रूप में शामिल नहीं हो पाएँगी, ऐसे में देखा जाय तो एक सोची समझी नीति के तहत ही उनपर महाभियोग लगाया गया है । क्योंकि कार्की की नियुक्ति में भी कई बाधाएँ आई थीं । जिसे उन्होंने पार किया था और एक सर्वोच्च पद को हासिल किया था । पर नदी में रहकर मगरमच्छ से उन्होंने बैर लिया और जिसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा ।
कई बार उनके वक्तव्यों ने भी उन्हें विवादित किया । उनके वक्तव्य की वजह से मधेश में उनकी काफी आलोचना भी हुई । जब उन्होंने घूँघट को लेकर बयान दिया था । उनके बयान को संस्कृति और परम्परा से जोड़कर उनकी काफी आलोचनाएँ हुई । हो सकता है कि आज जिस तरह मधेश और मधेशी के खिलाफ हवा चल रही है वो भी उससे प्रभावित हों और इसलिए उनका वक्तव्य भी पूर्वाग्रह से ग्रसित रहा हो । पर व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि मधेशी महिलाओं के पिछड़ेपन को दर्शाने के लिए उन्होंने प्रतीक के तौर पर घूँघट शब्द का प्रयोग किया था जिसे भावनात्मक रूप देकर एक अलग ही दिशा दे दी गई । पर सच कड़वा होता है और सच यह है कि मधेशी महिला आज भी काफी पीछे है । दस महिला नब्बे का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती । महिलाओं की स्थिति बेहतर है इसकी कल्पना तभी सच होगी जब सौ में से नब्बे महिला सक्षम होंगी । पर विडम्बना यह है कि हम सच सुनना कहाँ चाहते हैं । और सबसे महत्तवपूर्ण बात यह कि हमें यह सच मानना होगा कि हमारी कमी ही सामने वाले को आक्षेप का मौका देती है । खैर, यह बहस का एक अलग मुद्दा हो सकता है ।
कार्की के लिए यह कहा जा सकता है कि कई निर्णय उन्होंने पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर किया, जो किसी भी तरह न्यायायिक प्रक्रिया में उचित नहीं माना जा सकता । पर एक बेबाक और साहसी महिला का अपने कार्य क्षेत्र से पटाक्षेप दुर्भाग्यपूर्ण हुआ ।


