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आखिर क्या है राष्ट्रवाद ?

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राष्ट्रवाद एक जटिल, बहुआयामी अवधारणा है, जिसमें अपने राष्ट्र से एक साझी साम्प्रदायिक पहचान समावेशित है । यह एक राजनीतिक nepal rastrabadविचारधारा के रूप में अभिव्यक्त होता है, जो किसी समूह के लिए ऐतिहासिक महत्व वाले किसी क्षेत्र पर साम्प्रदायिक स्वायत्तता, और कभी–कभी सम्प्रभुता हासिल करने और बनाए रखने की ओर उन्मुख हैं । इसके अतिरिक्त, साझी विशेषताओं, जिनमें आम तौर पर संस्कृति, भाषा, धर्म, राजनीतिक लक्ष्य औररअथवा आम पितरावली में एक आस्था सम्मिलित हैं, पर आधारित एक आम साम्प्रदायिक पहचान के विकास और रखरखाव की ओर, यह और उन्मुख हैं । एकयक्ति की राष्ट्र के भीतर सदस्यता, और सम्बन्धित राष्ट्रवाद का उसका समर्थन, उसके सहगामी राष्ट्रीय पहचान द्वारा चित्रित होता हैं ।
किसी राजनीतिक या समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से, राष्ट्रवाद के उद्गमों और आधारों को समझने के लिए लगभग तीन मुख्य रूपावलियाँ हैं । पहली, जो वैकल्पिक रूप से आदिमवाद या स्थायित्ववाद जानी जाती हैं, एक दृष्टिकोण है जो राष्ट्रवाद को एक प्राकृतिक दृग्विषय के रूप में वर्णित करता है । इस मत की यह धारणा है कि यद्यपि राष्ट्रत्व अवधारणा का औपचारिक ग्रंथन आधुनिक हो, पर राष्ट्र हमेशा से अस्तित्व में रहें हैं । दूसरी रूपावली संजातिप्रतीकवाद की है जो एक जटिल दृष्टिकोण हैं जो, राष्ट्रवाद को पूरे इतिहास में एक गत्यात्मक, उत्क्रन्तिकारी दृग्विषय के रूप में प्रसंगीकृत करके, और एक सामूहिक राष्ट्र के, ऐतिहासिक अर्थ से ओतप्रोत राष्ट्रीय प्रतीकों से,यक्तिपरक सम्बन्धों के एक परिणाम के रूप में राष्ट्रवाद की ताकÞत का आगे परीक्षण करके, राष्ट्रवाद को समझाने का प्रयास करता हैं । तीसरी, और सबसे हावी रूपावली हैं आधुनिकतावाद, जो राष्ट्रवाद को एक हाल के दृग्विषय के रूप में वर्णित करती हैं, जिसे अस्तित्व के लिए आधुनिक समाज की संरचनात्मक परिस्थितियों की आवश्यकता होती हैं । क्या गठित करता हैं एक राष्ट्र को, इसके लिए कई परिभाषाएँ हैं, हालाँकि, जो राष्ट्रवाद की अनेक विभिन्न किस्मों की ओर ले जाती हैं । यह वह आस्था हो सकती हैं कि एक राज्य में नागरिकता किसी एक संजातीय, सांस्कृतिक, धार्मिक या पहचान समूह तक सीमित होनी चाहिएँ, या वह हो सकती हैं कि किसी अकेले राज्य में बहुराष्ट्रीयता में आवश्यक रूप से अल्पसंख्यकों द्वारा भी राष्ट्रीय पहचान को अभिव्यक्त करने और प्रयोग करने का अधिकार सम्मिलित होना चाहिए ।
राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान और राष्ट्रीय पहचान के अन्य प्रतीक राष्ट्रीय समुदाय के उच्च रूप से महत्वपूर्ण प्रतीक आम तौर पर माने जाते हैं । राष्ट्रवाद लोगों के किसी समूह की उस आस्था का नाम है जिसके तहत वे खÞुद को साझा इतिहास, परम्परा, भाषा, जातीयता और संस्कृति के आधार पर एकजुट मानते हैं । इन्हीं बंधनों के कारण वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि उन्हें आत्म–निर्णय के आधार पर अपने सम्प्रभु राजनीतिक समुदाय अर्थात् ‘राष्ट्र’ की स्थापना करने का आधार है । राष्ट्रवाद के आधार पर बना राष्ट्र उस समय तक कल्पनाओं में ही रहता है जब तक उसे एक राष्ट्र–राज्य का रूप नहीं दे दिया जाता । हालाँकि दुनिया में ऐसा कोई राष्ट्र नहीं है जो इन कसौटियों पर पूरी तरह से फिट बैठता हो, इसके बावजूद अगर विश्व की एटलस उठा कर देखी जाए तो धरती की एक–एक इंच जÞमीन राष्ट्रों की सीमाओं के बीच बँटी हुई मिलेगी । राष्ट्रवाद का उदय अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं सदी के युरोप में हुआ था, लेकिन अपने सिर्फÞ दो–ढाई सौ साल पुराने ज्ञात इतिहास के बाद भी यह विचार बेहद शक्तिशाली और टिकाऊ साबित हुआ है । राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों को अपने–अपने राष्ट्र का अस्तित्व स्वाभाविक, प्राचीन, चिरंतन और स्थिर लगता है । इस विचार की ताकत का अंदाजÞा इस हकीकत से भी लगाया जा सकता है कि इसके आधार पर बने राष्ट्रीय समुदाय वर्गीय, जातिगत और धार्मिक विभाजनों को भी लाँघ जाते हैं । राष्ट्रवाद के आधार पर बने कार्यक्रम और राजनीतिक परियोजना के हिसाब से जब किसी राष्ट्र–राज्य की स्थापना हो जाती है तो उसकी सीमाओं में रहने वालों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी विभिन्न अस्मिताओं के ऊपर राष्ट्र के प्रति निष्ठा को ही अहमियत देंगे । वे राष्ट्र के कानून का पालन करेंगे और उसकी आंतरिक और बाह्य सुरक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान भी दे देंगे । यहाँ यह स्पष्ट कर देना जÞरूरी है कि आपस में कई समानताएँ होने के बावजूद राष्ट्रवाद और देशभक्ति में अंतर है । राष्ट्रवाद अनिवार्य तौर पर किसी न किसी कार्यक्रम और परियोजना का वाहक होता है, जबकि देशभक्ति की भावना ऐसी किसी शर्त की मोहताज नहीं है ।
राष्ट्रवाद के आलोचकों की कमी नहीं है और न ही उसे खÞारिज करने वालों के तर्क कम प्रभावशाली हैं । एक महाख्यान के तौर पर राष्ट्रवाद छोटी पहचानों को दबा कर पृष्ठभूमि में धकेल देता है । अंग्रेजÞों के खिलाफÞ चले राष्ट्रवादी आंदोलन के दौरान रवींद्रनाथ ठाकुर जैसी हस्तियाँ इस विचार को संदेह की निगाह से देखती थीं । पर दिलचस्पी का विषय तो यह है कि राष्ट्रवाद के ज्यादातर आलोचक राष्ट्र की सीमा में रहने के लिए ही विवश नहीं हैं, पर उनमें से कई हस्तियाँ किसी न किसी राष्ट्र की स्थापना में योगदान करते हुए नजÞर आती हैं । राष्ट्रवाद विभिन्न विचारधाराओं को भी अपने आगोश में समेट लेता है । राष्ट्रवाद के प्रश्न के साथ कई सैद्धांतिक उलझनें जुड़ी हुई हैं ।’ मसलन, राष्ट्रवाद और आधुनिक संस्कृति व पूँजीवाद का आपसी संबंध क्या है? पश्चिमी और पूर्वी राष्ट्रवाद के बीच क्या फÞर्क है? एक राजनीतिक परिघटना के तौर पर राष्ट्रवाद प्रगतिशील है या प्रतिगामी ? हालाँकि धर्म को राष्ट्र के बुनियादी आधार के तौर पर मान्यता प्राप्त नहीं है, फिर भी भाषा के साथ–साथ धर्म के आधार पर भी राष्ट्रों की रचना होती है । सवाल यह है कि ये कारक राष्ट्रों को एकजुट रखने में नाकाम क्यों हो जाते हैं ? सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रवाद को अलग–अलग कैसे समझा जा सकता है ? इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं है, क्योंकि राजनीति विज्ञान में एक सिद्धांत के तौर पर राष्ट्रवाद का सुव्यवस्थित और गहन अध्ययन मौजूद नहीं है । विभिन्न राष्ट्रवादों का परिस्थितिजन्य चरित्र भी इन जटिलताओं को बढ़ाता है । यह कहा जा सकता है कि ऊपर वर्णित समझ के अलावा राष्ट्रवाद की कोई एक ऐसी सार्वभौम थ्योरी उपलब्ध नहीं है जिसे सभी पक्षों द्वारा मान्यता दी जाती हो ।
माक्र्सवाद भी राष्ट्रवाद से संबंधित सिद्धांत मुहैया कराने में नाकाम रहा है । दुनिया भर के मजÞदूरों को एक होने का नारा देने वाले माक्र्स और एंगेल्स मानते थे कि मजÞदूरों का कोई देश नहीं होता । अपने लेखन में उन्होंने वर्ग– विभाजन के परे जा कर राजनीतिक–सामाजिक और सांस्कृतिक एकता करने वाली किसी परिघटना को तरजीह नहीं दी । अपने युग के कुछ राष्ट्रीय संघर्षों के बारे में तो उनकी तिरस्कारपूर्ण धारणा यह थी कि वे नष्ट हो जाने के लिए अभिशप्त हैं । राष्ट्रवाद का कोई मुकम्मल सिद्धांत देने के बजाय उनकी रचनाएँ अपने युग कीयावहारिक राजनीति के तहत राष्ट्रीय प्रश्न पर विचार करती हैं । दूसरे और तीसरे इंटरनैशनल में राष्ट्रवाद पर काफÞी बहस हुई । लेनिन ने एक विशाल बहुजातीय साम्राज्य में क्रांति करने की समस्याओं से जूझते हुए राजनीतिक लोकतंत्र की आवश्यकता को अपने राष्ट्रवाद संबंधी विश्लेषण के केंद्र में रखा । उनका निष्कर्ष था कि राष्ट्रों को आत्म–निर्णय का अधिकार मिलना चाहिए । इसके बाद स्तालिन की विख्यात रचना मार्क्िसजÞम ऐंड नैशनल क्वेश्चन सामने आयी जिसमें उन्होंने राष्ट्रवाद की थियरी देने की कोशिश की । स्तालिन ने राष्ट्र के पाँच मुख्य तत्त्व बताये ः एक स्थिर और नैरंतर्य से युक्त समुदाय, एक अलग भू–क्षेत्र, समान भाषा, आर्थिक सुसंगति और सामूहिक चरित्र । चूँकि स्तालिन राष्ट्रों के उभार को उद्योगीकरण की जÞरूरतों से जोड़ कर देख रहे थे इसलिए उनका सिद्धांत राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उससे उभरने वाले बहुत से प्रश्नों की उपेक्षा कर देता था । कुल मिला कर माक्र्सवादी मानते रहे कि राष्ट्रवाद पूँजीवाद के विकास में उसका सहयोगी बन कर उभरा है । इस लिहाजÞ से उसे एक बूर्जÞ्वा विचारधारा की श्रेणी में रखा जाना चाहिए । राष्ट्रवाद प्रभुत्वशाली वर्गों को एकजुट करके राजनीतिक समुदाय की एक भ्रांत अनुभूति पैदा करता है ताकि पूँजीपतियों द्वारा किये जाने वाले अहर्निश शोषण और दरिद्रीकरण के बावजूद आम लोग धनी वर्ग के साथ एकता का एहसास करते रहें । माक्र्सवादी विमर्श का एक विरोधाभास यह है कि राष्ट्रवाद को पूँजीवादी वर्ग की विचारधारा मानने के बाद भी क्रांतिकारी राजनीति के धरातल पर कई कम्युनिस्ट पार्टियों ने राष्ट्रवाद को अपनी गोलबंदी का आधार बनाया है । क्रांति के पश्चात् समाजवादी समाज की रचना के लिए भी राष्ट्रवादी भावनाओं का इस्तेमाल किया गया है ।
सत्तर के दशक में होरेस बी. डेविस ने माक्र्सवादी तर्कों का सार–संकलन करते हुए राष्ट्रवाद के एक रूप को ज्ञानोदय से जोड़ कर बुद्धिसंगत करार दिया और दूसरे रूप को संस्कृति और परम्परा से जोड़ कर भावनात्मक बताया । लेकिन, डेविस ने भी राष्ट्रवाद को एक औजÞार से ज्यादा अहमियत नहीं दी और कहा कि हथौड़े से हत्या भी की जा सकती है और निर्माण भी । राष्ट्रवाद के जÞरिये जब उत्पीडि़त समुदाय अपनी आजÞादी के लिए संघर्ष करते हैं तो वह एक सकारात्मक नैतिक शक्ति बन जाता है और जब राष्ट्र के नाम पर आक्रमण की कार्रवाई की जाती है तो उसका नैतिक बचाव नहीं किया जा सकता । राष्ट्रवाद की सभी माक्र्सवादीयाख्याओं में सर्वाधिक चमकदार थियरी बेनेडिक्ट ऐंडरसन द्वारा प्रतिपादित ‘कल्पित समुदाय’ (इमैजिन्ड कम्युनिटीजÞ) की मानी जाती है । ऐंडरसन का मुख्य सरोकार यह है कि एक–दूसरे से कभी न मिलने वाले और एक–दूसरे से पूरी तरह अपरिचित लोग राष्ट्रीय एकता में किस तरह बँधे रहते हैं ।
दरअसल, राष्ट्रवाद से संबंधित सभीयाख्याएँ थोड़ी दूर चलने के बाद पेचीदा हो जाती हैं । इनमें एक प्रमुखयाख्या यह है कि आधुनिकीकरण की प्रक्रिया राष्ट्रवाद के जÞरिये खÞुद को जÞमीन पर उतारती है । इस तरह राष्ट्रवाद ‘आधुनिकीकरण के धर्म’ के तौर पर उभरता है । आधुनिकता के कारण सामाजिक जीवन में आयी जÞबरदस्त आर्थिक और राजनीतिक उथल–पुथल के बीच राष्ट्रवाद के जÞरिये हीयक्ति एक अस्मिता और संसक्ति के सूत्र हासिल कर पाया । दूसरी तरफÞ यह भी एक हकीकत है कि राष्ट्रवाद कई बार आधुनिकीकरण को रोकने या सीमित करने वाली ताकत भी साबित हुआ है । राष्ट्रवादी दलीलों के आधार पर ही ऐसे कईयापार समझौतों का विरोध किया जाता है जिनसे राष्ट्रीय उद्योगीकरण और आर्थिक समृद्धि की प्रक्रिया को गति मिल सकती है । राष्ट्रवाद के धार्मिक संस्करण –जैसे, ईरान का इस्लामिक राष्ट्रवाद या भारतीय राजनीति के धार्मिक पहलू सेकुलरीकरण की प्रक्रिया को अगर पूरी तरह ठप नहीं कर पाते तो धीमा अवश्य कर देते हैं । दूसरे, तीसरी दुनिया के अधिकतर देशों में राष्ट्रवाद करीब आधी सदी बीत जाने के बाद भी उद्योगीकरण और खेतिहर अर्थव्यवस्था की जद्दोजहद में फँसा हुआ है ।
पश्चिमी और पूर्वी राष्ट्रवादों की तुलना करने के दौरान कुछ विद्वानों ने पूर्वी राष्ट्रवाद को पश्चिमी राष्ट्रवाद के स्वस्थ मूल्यों की कमी का शिकार बताया है । कुछ विद्वान पश्चिमी राष्ट्रवाद को राजनीतिक और पूर्वी राष्ट्रवाद को सांस्कृतिक की श्रेणी में रखते हैं । इन धारणाओं के विपरीत कुछ अन्य विद्वान उल्टी मान्यता पेश करते करते हैं ः युरोपियन राष्ट्रवाद एक देशज ऐतिहासिक प्रक्रिया से निकलने के कारण कहीं अधिक सांस्कृतिक है, जबकि पूर्वी राष्ट्रवाद उपनिवेशवाद विरोधी राजनीतिक आंदोलनों के हाथों गढ़े जाने के कारण मूलतः राजनीतिक है ।’ दूसरे, अगर तीसरी दुनिया के देशों के राष्ट्रवाद पर प्रजातीय, जातीय और सांस्कृतिक पहलू हावी हैं तो उनके पीछे उपनिवेशवाद की भूमिका है जिसकी जिम्मेदारी पश्चिम पर ही डाली जानी चाहिए । उपनिवेशवादियों ने मनमाने ढंग से स्थानीय जातीयताओं की उपेक्षा की जिसके कारण अफÞ्रीका में कई कबीलाई और जातायी समुदाय दो परस्पर संघर्षरत राष्ट्रों में विभाजित हो गये हैं । तीसरे, भारत समेत ऐसे कई समाज हैं जो पारम्परिक रूप से सांस्कृतिक, धार्मिक और भाषाई विविधता से सम्पन्न हैं । ऐसे समाजों में राष्ट्रवाद का अनुभव पश्चिमी अनुभव से भिन्न होना लाजÞमी है । ऐसी परिस्थितियों में कभी तो राष्ट्रवाद बहुलताओं के बीच परस्पर संसक्ति के सूत्र का काम करता है और कभी उपराष्ट्रीयताओं के बीच हिंसक संघर्ष और प्रतियोगिता में फँस जाता है ।
पश्चिमी राष्ट्रवाद के प्रशंसक पूर्वी राष्ट्रवाद के कई कुछ पहलुओं को तर्कबुद्धि से परे बता कर उसके महत्व को खÞारिज करते हैं । लेकिन कुछ विद्वानों ने ध्यान दिलाया है कि इस तरह के तत्त्व पश्चिमी राष्ट्रवाद में भी निर्णायक रूप से मौजूद हैं । मसलन, अगर भारतीय राष्ट्रवादी किसी जÞमाने में काली देवी की आराधना करके प्रेरणा प्राप्त करते थे, तो युरोप के रोमानी राष्ट्रवादी भी इसी प्रकार के सामूहिकतावादी, हिंसक और आध्यात्मिक आयामों से प्रेरित होते रहे हैं । पश्चिम के राष्ट्रवाद को उदार, समझदार और सार्वदेशिक साबित करना एकयाख्यात्मक आदर्श की उपलब्धि तो करा सकता है, परयावहारिक रूप से ऐसा नहीं है ।’ पश्चिमी राष्ट्रवाद हो या पूर्वी राष्ट्रवाद, दोनों ही परिस्थितियों में सांस्कृतिक और राजनीतिक राष्ट्रवाद एक–दूसरे से प्रतियोगिता करते हुए एक–दूसरे को पुष्ट करते चलते हैं ।
भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद को जÞबरदस्त चुनौती दी है । बीसवीं सदी के आखरी दो दशकों और इक्कीसवीं सदी के पहले दशक के बाद कहा जा सकता है कि कम से कम दुनिया का प्रभु वर्ग एक सी भाषा बोलता है, एक सी यात्राएँ करता है, एक सा खÞाना खाता है । उसके लिए राष्ट्रीय सीमाओं के कोई खÞास मायने नहीं रह गये हैं । इसके अलावा आर्थिक भूमण्डलीकरण, बड़े पैमाने पर होने वाली लोगों की आवाजाही, इंटरनेट और मोबाइल फÞोन जैसी प्रौद्योगिकीय प्रगति ने दुनिया में फÞासलों को बहुत कम कर दिया है । ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जो अपने देश और सांस्कृतिक माहौल से दूर काम और जीवन की सार्थकता की तलाश में जाना चाहते हैं । युरोप की धरती ने राष्ट्रवाद को जन्म दिया था और वहीं अब युरोपीय संघ का उदय राष्ट्रवाद का महत्त्व कम कर रहा है । इस नयी परिस्थिति में कुछ विद्वान कहने लगे हैं कि जिन ताकतों ने कभी राष्ट्रवाद को मजÞबूत किया था, वे ही उसके पतन का कारण बनने वाली हैं । राष्ट्रीय संरचनाओं के बजाय राष्ट्रों से परे जाने वाले आर्थिक और राजनीतिक गठजोड़ आने वाली सदियों पर हावी रहेंगे ।
इन दावों में सच्चाई तो है, लेकिन केवल आंशिक किस्म की । एक राजनीतिक ताकत के रूप में राष्ट्रवाद आज भी निर्णायक बना हुआ है । पूर्व में चल रहे सांस्कृतिक पुनरुत्थानवादी आंदोलन, दुनिया भर में हो रही नस्ल और आव्रजन संबंधी बहस और पश्चिम का बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोककसग) संबंधी विवाद इसका प्रमाण है । आज भी फिÞलिस्तीनियों द्वारा राष्ट्रीय आत्म–निर्णय का आंदोलन जारी है । ईस्ट तिमूर इण्डोनेशिया से हाल ही में आजÞाद हो कर अलग राष्ट्र बना है ।
भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया ने राष्ट्रवाद के बोलबाले को कुछ संदिग्ध अवश्य कर दिया है, पर इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि उदारतावादी और लोकतांत्रिक राज्य से गठजोड़ करके गÞरीबी और पिछड़ेपन के शिकार समाजों को आगे ले जाने में राष्ट्रवाद की ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता । सभी उत्तर–औपनिवेशिक समाजों ने अपने वैकासिक लक्ष्यों को वेधने के लिए राष्ट्रवाद का सहारा लिया है । खÞास तौर से भारत जैसे बहुलतामूलक समाजों को एक राजनीतिक समुदाय में विकसित करने में राष्ट्रवाद एक प्रमुख कारक रहा है ।

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