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पं. दीपनारायण मिश्र का नागरिक अभिनन्दन : एक रिपाेर्ट

 

वीरगंज, सावन २१ गते शनिवार

वीरगंज के भोजपुरी भाषा के वयोवृद्ध साहित्यकार पं. दीपनारायण मिश्र का नागरिक अभिनन्दन किया गया । वीरगंज के माईस्थान से निकली शोभायात्रा शहर की परिक्रमा करते हुए स्थानीय जैन धर्मशाला पहुँची जहाँ आयोजित भव्य मूल समारोह में उनका नागरिक अभिनन्दन किया गया । इस समारोह की अध्यक्षता वीरगंज उद्योग वाणिज्य संघ के अध्यक्ष एवं आयोजन मूलसमिति के संयोजक श्री ओमप्रकाश शर्मा ने की जबकि मंच पर पूर्वराजदूत एवं प्राध्यापक विजय कर्ण, उप–महावाणिज्यदूत श्री नीरज जायसवाल, पत्रकार चन्द्रकिशोर, साहित्यकार गोपाल ठाकुर, गोपाल अश्क, व्यवसायी एवं ‘नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद्’ ओमप्रकाश सिकरिया एवं शहर के गणमान्य लोगों की उपस्थिति थी । इस अवसर पर दर्जनों संघ–संस्थाओं द्वारा पंडित दीपनारायण मिश्र का अभिनन्दन किया गया ।
किसी भी साधक के लिए यह जीवन का ऐसा महत्वपूर्ण क्षण है जिस पर वह गर्व कर सकता है क्योंकि यह उनकीे जीवनपर्यंत साधना का सामाजिक–साहित्यिक मूल्यांकन है । इसके साथ ही यह शहर के लिए भी गौरव की बात है कि उसकी मिट्टी ने कम से कम एक ऐसी विभूति उत्पन्न की जिस पर नगर गौरव करता है और ऐसे व्यक्त्वि को सम्मानित करने का सुअवसर उसे प्राप्त हुआ । इस दृष्टि से मिश्रजी की जीवन यात्रा अत्यन्त सफल मानी जा सकती है क्योंकि इस धरती पर साधना करते हुए उन्होंने न केवल स्थानीय स्तर पर अपनी स्वीकार्यता स्थापित की वरन राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनायी । आज निश्चित ही वे उम्र के चौथे दहलीज पर खड़े हैं और उनकी सक्रियता कम गई है, अशक्तता के कारण उनकी कलम रुक गई है लेकिन उनके चिन्तन का प्रवाह आज भी जारी है और चिन्ता आज भी कम नहीं हुईं । हर आगन्तुकों से वे भाषा और साहित्य के क्षेत्र की गतिविधियों पर संवाद करते हैं और अपनी ओर से उन्हें दिशा देने की कोशिश करते हैं । उनकी यही चिन्ताएँ और चिन्तनशीलता आज उन्हें इस मुकाम तक पहुँचायी है जहाँ पूरा नगर आज उनका श्रद्धापूर्वक सम्मान किया ।

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पंडित दीपनारायण मिश्र की यह विशेषता रही है कि किसी एक भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने स्वयं को सीमित नहीं किया । सर्वविदित है कि वीरगंज मूलतः भोजपुरीभाषी क्षेत्र है और भाषिक रूप में हिन्दी की भी यहाँ स्वीकार्यता है । एक बात यह भी है कि जिन दिनों भाषा और साहित्य के क्षेत्र में इनकी सक्रियता थी उस समय नेपाल में शिक्षा–दीक्षा की भाषा भी हिन्दी ही थी । लेकिन पंडितजी ने दोनों ही भाषाओं में अपनी कलम चलायी और अपने योगदान से उन्हें समृद्ध करने का प्रयास किया । इतना ही नहीं इनके विकास की भी चिन्ता इन्हें थी इसलिए ‘नेपाल भोजपुरी समाज‘ और ‘नेपाल हिन्दी साहित्य परिषद’ के ये संस्थापक अध्यक्ष भी रहे और दोनों ही भाषाओं के प्रशंसकों और सर्जकों को यहाँ से उन्होंने न केवल संगठित किया बल्कि सर्जना के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित भी किया । यही कारण है कि आज दोनों ही भाषाओं से जुड़े लोग न केवल मिश्रजी का सम्मान करते हैं वरन उनके समक्ष श्रद्धानत भी होते हैं ।
इस अवसर पर मंचासीन वक्ताओं ने एक स्वर से स्थानीय भाषा के विकास में पंडितजी की भूमिका और भोजपुरी के विकास के प्रति अपने विचार रखे । कार्यक्रम का संचालन पत्रकार सलमा खातून ने किया ।

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