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असहाय सी है, ज़िन्दगी; मिलती नहीं,  राहत कहीं; 

 
मौत पर, मातम नहीं ….
गंगेश मिश्र
असहाय सी है, ज़िन्दगी;
मिलती नहीं,  राहत कहीं; 
बह गया, कुछ ना बचा;
और ना बची, उम्मीद भी।
घर गिरा है, भरभराकर;
बह गए, दिखते नहीं;
जिनसे थी, उम्मीद सबको;
अब तलक, लौटे नहीं।
कर रहे, हर पर सियासत; 
मौत पर मातम नहीं; 
मर रही, पल-पल मनुजता;
दर्द होता, कम नहीं।
भूख से व्याकुल है, बेटा;
माँगता है, हर घड़ी;
कुछ तो दे माँ, खा तो लूँ; 
हमसे रहा जाता नहीं;
अब यूँ, रहा जाता नहीं।

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