असहाय सी है, ज़िन्दगी; मिलती नहीं, राहत कहीं;
मौत पर, मातम नहीं ….
गंगेश मिश्र
गंगेश मिश्र
असहाय सी है, ज़िन्दगी;
मिलती नहीं, राहत कहीं;
बह गया, कुछ ना बचा;
और ना बची, उम्मीद भी।
घर गिरा है, भरभराकर;
बह गए, दिखते नहीं;
जिनसे थी, उम्मीद सबको;
अब तलक, लौटे नहीं।
कर रहे, हर पर सियासत;
मौत पर मातम नहीं;
मर रही, पल-पल मनुजता;
दर्द होता, कम नहीं।
भूख से व्याकुल है, बेटा;
माँगता है, हर घड़ी;
कुछ तो दे माँ, खा तो लूँ;
हमसे रहा जाता नहीं;
अब यूँ, रहा जाता नहीं।
मिलती नहीं, राहत कहीं;
बह गया, कुछ ना बचा;
और ना बची, उम्मीद भी।
घर गिरा है, भरभराकर;
बह गए, दिखते नहीं;
जिनसे थी, उम्मीद सबको;
अब तलक, लौटे नहीं।
कर रहे, हर पर सियासत;
मौत पर मातम नहीं;
मर रही, पल-पल मनुजता;
दर्द होता, कम नहीं।
भूख से व्याकुल है, बेटा;
माँगता है, हर घड़ी;
कुछ तो दे माँ, खा तो लूँ;
हमसे रहा जाता नहीं;
अब यूँ, रहा जाता नहीं।


