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नेपाल का चांगुनारायण मंदिर जहाँ विष्णु शापमुक्त हुए

 

७ सितम्बर

नेपाल, जो कभी विश्व का एकमात्र हिन्दू राष्ट्र रहा है, धर्म अाैर संस्कृति का अाज भी एक अनुपम स्थल है. लिच्छवि सम्राट के शासनकाल में राजा हरि दत्त वर्मा ने नेपाल की ऊंची पहाड़ी की चोटी पर चंगुनारायण मंदिर का निर्माण करवाया था। चंगु नाम के गांव में स्थित यह मंदिर 325 ईसवी में बनाया गया था, जो चंपक के पेड़ों के घने जंगल से घिरा हुआ है।

चौथी शताब्दी में बनाए गए इस मंदिर को विष्णु जी के सबसे प्राचीन मंदिर के तौर पर जाना जाता है. नेपाल की प्रसिद्ध पैगोडा शैली में बने इस मंदिर को सन् 1702 में दोबारा बनाया गया था क्योंकि एक भीषण आग में पहले का बना हुआ मंदिर पूरी तरह जलकर नष्ट हो गया था।इस मंदिर में क्षीर सागर में नागशैया पर लेटे विष्णु भगवान की प्रतिमा है जो अद्वितीय है।चंगुनारायण मंदिर के विशाल प्रांगण में रुद्राक्ष के वृक्ष भी लगे हैं और इस मंदिर का महत्व इस बात से आसानी से लगाया जा सकता है कि यूनेस्को ने इस मंदिर को विश्वधरोहर की सूची में शामिल किया है।

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स्थानीय लोगों के बीच चंगु नारायण मंदिर के निर्माण से जुड़ी एक कहानी बहुत प्रचलित है जिसके अनुसार प्राचीन समय में एक ग्वाला, सुदर्शन नाम के एक ब्राह्मण से ऐसी गाय लेकर आया था जो बड़ी मात्रा में दूध देती थी। ग्वाला चंगु गांव में अपनी गाय को चराने लेकर गया और घास चरते-चरते वह गाय एक पेड़ की छांव में जाकर खड़ी हो गई. शाम को जब ग्वाला अपनी गाय को लेकर घर गया और दूध निकालने लगा तो गाय ने बहुत कम मात्रा में दूध दिया, बहुत दिनों तक ऐसा ही चलता रहा, जिस वजह से वह ग्वाला बहुत परेशान रहने लगा।एक दिन वह उस ब्राह्मण के पास गया और उसे सारी बात बताई। ग्वाला और वह ब्राह्मण गाय को लेकर उसी जंगल में गए और छुपकर वहां यह देखने लगे कि जब वह गाय उस पेड़ के नीचे विश्राम करती है तब असल में होता क्या है…

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दोनों ने जो देखा वह बहुत चौंकाने वाला था क्योंकि एक बालक गाय के पास आकर उसका सारा दूध पी जाता था।दोनों को लगा कि वह कोई शैतान है और वह पेड़ उसका घर, इसलिए ब्राह्मण ने उस चंपक के वृक्ष को ही काट डाला। पेड़ कटने के बाद वहां से मानव रक्त बहने लगा और दोनों यह सोच-सोच कर रोने लगे कि उनके हाथों किसी की हत्या हो गई।

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इतने में भगवान विष्णु अवतरित हुए और उन्होंने कहा कि उन्होंने कोई पाप नहीं किया बल्कि स्वयं विष्णु को एक श्राप से मुक्ति दिलवाई है जो उन्हें तब लगा था जब गलती से उन्होंने सुदर्शन के पिता की हत्या कर दी थी।सुदर्शन और उस ग्वाले को जब ये सारी कहानी पता चली तो दोनों उस स्थान को पवित्र स्थान मानकर पूजा करने लगे और फिर वहां एक मंदिर का निर्माण करवाया गया।

आज भी सुदर्शन नामक ब्राह्मण के वंशज इस मंदिर पर पुजारी का काम करते हैं और उस ग्वाले के परिवारवाले इस स्थान की रक्षा करते हैं.।

 

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