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गोलियाँ चल रही थीं, मधेश की जनता मौत का स्वाद चख रही थी ? : श्वेता दीप्ति

 

डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू | मत भूलें कि अगर सचमुच हम लोकतंत्र में साँसें ले रहे हैं तो एक दिन चुनावी प्रक्रिया से भी गुजरेंगे और तभी यही निरीह जनता आपको आइना दिखाएगी । दो वर्ष पहले आज के दिन ही मैंने उक्त पंक्तियों को अपने आलेख में लिखा था । आज देश चुनावी प्रक्रिया में है या यूँ कहें की मधेश चुनावी प्रक्रिया में है क्योंकि सरकार की नीति ने मधेश को दो नम्बर प्रदेश में सीमित तो कर ही दिया है । दो वर्ष पहले देश सुलग रहा था आग आज भी जिन्दा है बस राख की परत जम गई है । गोलियाँ चल रही थीं और मधेश की निरीह जनता मौत का स्वाद चख रही थी और उस मौत पर मरहम की जगह प्रमुख पार्टी उनकी मौत पर ठहाके लगा रही थी और इंसान मानने तक से इनकार कर रही थी । आज सब कुछ वही है सिर्फ तारीखें और साल बदले हैं पर दिलचस्प यह है कि आज नजारा बदला हुआ है । आदेश देने वाली जुवान और हाथ फिलहाल गुहार कर रहे हैं । आज एमाले अध्यक्ष को बार बार यह स्पष्टीकरण देना पड़ रहा है कि एमाले या वो स्वयं मधेश विरोधी नहीं है । परन्तु इसके बावजूद खुद को राष्ट्रहित के सबसे बड़े शुभचिन्तक रूप में स्थापित करने से पीछे नहीं हट रहे हैं । अपनी सोच को आज भी सही बताते हुए यही जाहिर कर रहे हैं कि उन्होंने जो कहा या किया, वो राष्ट्रहित के लिए किया ।

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फिलहाल सभी यह दावा कर रहे हैं कि वो मधेश में नम्बर वन बन कर निकलेंगे । परन्तु चुनाव का परिणाम क्या होगा यह तो आनेवाला कल बताएगा क्योंकि जीत और हार के कई आधार होते हैं । वोट बिकते भी हैं, ठगे भी जाते हैं और छीने भी जाते हैं । पर मजे की बात तो यह है कि आज जो चेहरे पर शिकन दिख रही है आखिर उसकी वजह क्या है ? शब्दों और विभेद के तीर तो निकल चुके हैं, घाव दिख नहीं रहा पर जिन्दा तो है और यही कारण है कि आपको बार बार यह कहना पड़ रहा है कि आप मधेश विरोधी नहीं हैं और आप ही मधेश के मसीहा बन सकते हैं । संविधान संशोधन प्रस्ताव को असफल करने पर जिस चेहरे पर मुस्कुराहट थी, कमोवेश आज उनकी पेशानी पर एक शिकन तो है जो स्पष्टीकरण के लिए विवश कर रहा है । मधेशी पार्टियों को चुनाव से दूर रखा गया एक सोची समझी नीति के तहत और यही वजह थी कि उनके वोट बैंक सुरक्षित हो गए । दो नम्बर के लिए भी यही मंसूबे थे पर ऐसा हो नहीं पाया । कारण चाहे आन्तरिक दवाब रहा हो या बाह्य।

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मधेशी दल खास कर राजपा नेपाल ने चुनाव में जाने का निर्णय किया । मधेश में इसका विरोध भी जारी है बावजूद इसके एक उम्मीद तो है कि मधेश की जनता इनकी विवशता को समझेगी । उपर की ओर जाने वाली सीढि़यों में पहले पायदान का उतना ही महत्व होता है जितना लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अंतिम पायदान का इसलिए भी आवश्यक था कि अपने क्षेत्र को अपने ही हाथों में लिया जाय ताकि आगे के पायदान पर चढने में आसानी हो सके । इस बात को मधेश की जनता को भी समझनी होगी । कई बार भावनाओं को तिलांजलि देनी पड़ती है और यह तो जमाना कहता है कि राजनीति भावनाओं से नहीं चलती । नेतृत्व को कभी कभी अनचाहा निर्णय भी लेना पड़ता है ताकि वो उन भावनाओं को तामील करने के लिए सक्षम हो सके ।

एक बात उभर कर आ रही है कि मधेशी दलों का बहिष्कार किया जाना चाहिए क्योंकि ये जीत कर भी उन्हीं का साथ देंगे जो मधेश के पक्ष में नहीं है । यह सच है, परन्तु इस परिदृश्य को बदलने के लिए संख्या और शक्ति का आँकड़ा निर्धारित करना मधेश की जनता के हाथ में ही है तभी कल की तस्वीर बदल सकती है । टिकट वितरण को लेकर जो तमाशा दिखा वो निःसन्देह अवसरवादी सोच को ही पुष्ट कर रही थी पर ऐसे नेताओं का बहिष्कार जनता का मत तो कर ही सकती है क्योंकि यह मानसिकता कभी ईमानदार नहीं हो सकती । राजपा सभी को एक साथ तुष्ट नहीं कर सकती पर कुछ कमजोरियाँ तो दिखीं जो उनकी स्थिति को मजबूती नहीं प्रदान कर सकता । उन्हें यह सोच कर नीति बनानी चाहिए थी कि यह अंतिम चुनाव नहीं है बल्कि पहली शुरुआत है और अगर यहाँ वो विश्वास खोते हैं तो आगे की राह कठिन हो सकती है । फिलहाल तो चुनावी घड़ी की सूई तेजी से वक्त की ओर बढ़ रही है, देखें मधेश क्या निर्णय लेता है ?

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