साहित्य में सहित का भाव होता है और सहित हमें जोड़ता है : श्वेता दीप्ति
नेपाल भारत मैत्री संघ द्वारा आयोजित “भारत नेपाल काव्य सेतु” का लोकार्पण कार्यक्रम में त्रि.वि.वि हिन्दी केन्द्रीय विभाग की पूर्व अध्यक्ष तथा हिमालिनी हिंदी पत्रिका की सम्पादक डा.श्वेता दीप्ति द्वारा की गई समीक्षा
काठमांडू | नेपाल और भारत जितने करीब हैं कभी कभी उतने ही दूर नजर आते हैं । ये दूरी क्षणिक ही सही पर वक्त बेवक्त दिख जाया करती है । पर आज सिर्फ और सिर्फ जुड़ने की बात करें, आबद्धता की बात करें । क्योंकि साहित्य में सहित का भाव होता है और सहित हमें जोड़ता है अपने आत्मिक भाव से । साहित्य की ही सर्वप्रिय विधा है कविता । एकांत क्षणों की उपज, भावों की शब्दमाला, अनुभूतियों के बिखरे पल और इन्हं सँजो कर जो दिल की गहराईयों निकलती है वही कविता है । जो हमें मोहती है, मुग्ध करती है और अनेक क्षणों में तुष्ट भी करती है ।
भारत नेपाल काव्य सेतु पर डा.श्वेता दीप्ति द्वारा की गई समीक्षा
भारत नेपाल काव्य सेतु अर्थात दो देशों को साहित्यिक धरातल पर एकात्म भाव से जोडने की एक सार्थक पहल । इसे पढ़ा मैंने और सुखद आश्चर्य ये हुआ कि इसमें कई भारतीय मित्रों की कविता भी शामिल है जो बहुत अच्छे कवि हैं । भारत नेपाल काव्य सेतु के लिए कुछ कहने का अवसर देने के लिए संयोजक वर्ग को मेरा आभार । संकलन से मुझे दूर रखा गया पर समीक्षा के अवसर ने इसके करीब ला दिया । यह कार्य तो दुरुह है और तब तो और भी, जब आपके पास समय बहुत कम हो । ४६ कवि और दस मिनट, किसे लूँ और किसे छोडूँ । इसलिए एक ही विनम्र अनुरोध है कि सबों की चर्चा सम्भव नहीं हो सकती पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि कोई किसी से कमतर हैं ।
संग्रह की पहली कविता शब्द ब्रह्म ने ही मुझे मुग्ध किया—
कविता निश्चय ही, शब्दों का झुण्ड नहीं होती
मेरे मित्र, सच कहुँ तो कविता होती है
प्राण का प्राण से अनन्त संवाद
जी हाँ कविता महज चंद शब्दों का खेल या संयोजन नहीं है । डा. योगेन्द्र कहते हैं—
शब्दों से निकलकर, नैसर्गिक निरझरनी की तरह
पहुँचता है दिग्दिगन्त में
और बन जाता है, सत्यं, शिवं, सुन्दरम्
तब कविता हो जाती है, पूर्णतः जीवन्त
तब कविता कहलाती है शब्द ब्रहम ।
यकीनन यह ब्रह्म शब्द है, जो हमें आत्मा से आत्मा तक का सफर कराता है ।
दर्शन से अलग डा. राजेन्द्र परदेशी की कविता खत भाई के नाम ने गाँव की सोंधी खुशबू का अहसास कराया । गंवई शब्दों के प्रयोग ने घर आँगन की धूल याद दिला दी साथ ही कविता में आपने मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी को आपने समेट लिया है ।
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एक कडवे सच को बयाँ करती है अमरजीत कोंके की कविता तू अगर । एक कटु सत्य है कि जो सफल हैं उन्हें लगता है सारी दुनिया सही चल रही है पर सच्चाई इससे परे होती है, कवि कहते हैं—
तू अगर अँधेरे में से रास्ता तलाश कर
रौशनी में आ गया
यह न सोच कि दुनिया बदल गई, यह न सोच कि इन्कलाब आ गया
क्योंकि,
जो दुनिया तू पीछे छोड़ आया, वहाँ आज भी
जहालत का डेरा है, तुझे रौशनी की चकाचौंध में बेशक दिखता नहीं
लेकिन वहाँ आज भी घनी कालिख का बसेरा है ।
इसी तरह डा. सुरेश की हाइकू, और डा. विनोद की आँखमिचौली मन को भाती है । मनीषा झा की कंचनजंघा कर्सियांग से काठमान्डौ और पोखरा के दृश्यावलोकन कराती है । डा अनिता पंडा की कविता जरुरत जिन्दगी की, जिन्दगी की जरुरतों से रुबरु कराती है—
बचपन के लिए खेल की, जवान के लिए रोजगार की
वृद्धों के लिए सम्मान की, मृत के लिए चार कंधों की जरुरत है ।
जी हाँ जरुरतों के साए में ही जिन्दगी की शाम हो जाती है ।
सौम्य और शालीन व्यक्तित्व की धनी मधु प्रधान की कविता जीवन के सच को उजागर करती है—
नियति ने, मेरे जीवन की किताब के
पहले पृष्ठ पर सजा दिया
उगता हुआ सूरज
फिर जाने क्यों घेर दिया काले घने बादलों से ?
उक्त पंक्तियाँ सुख और दुख की छवि नजरों के सामने साकार करती हैं ।
खंड खंड होती अस्तित्व की पीडा रघुवीर शर्मा जी की कविता मेरी कविता में उभर कर आती है । मन जीना चाहता है पर हालात जीने ना दे और इतना ही नहीं—
जब काँटे चुभते हैं मेरे पैरौं में
बोझ से टूटता है मेरा सिर
छटपटाने लगता है मेरा अस्त्त्वि
बुझा देती है बेदर्द हवाएँ मेरा दीपक
और मैं रो भी नहीं पाता ।
यूँ ही— मेरे दिल को यूँ जलाया देर तक
वादा कर के भी ना आया देर तक
वो गजब की मय पिलाई आँखों से
ये नशा नीचे न आया देर तक ।
याशमीन की गजलों का नशा भी कुछ ऐसा ही है—
कर के छलनी तीर से मेरा जिगर
यास्मीं वो मुस्कुराया देर तक ।
लतिका चोपड़ा की कविता मैं कर्ण, डा. भास्कर की सम्भव, ताना बाई एस पाटिल की भार मन को छूती है ।
कागज पर लिख देने के बाद
हल्का हो जाएगा मेरा मन
रो लेने से धुल जाएँगी मेरी आँखें
विरासत में मिले दुखों का बोझ तो मैं उठा लूँगी मगर
खुद मेरे द्वारा प्रतिदिन दिया गया दुखों का न्योता
उसका निवारण कैसे होगा प्रभु ?
प्रताप सिंह सोढी की कविता आज को जीने की चाहत देती है जब वो कहते हैं कि
मैं तो आगाज हूँ, अंजाम नहीं
इतिहास के पृष्ठ कभी कोरे नहीं रहते
प्रिवर्तन की कोई सीमा नहीं होती
वक्त के साथ सब होता है
इसीलिए तो मनुष्य जीता है ।
गुजरता वक्त कुछ छूटने का अहसास कराती है, जिन्दगी हमसे हमारा हिसाब माँगती है क्योंकि इसी एक जिन्दगी के साथ कई और भी जिन्दगियाँ शामिल हैं । उम्र और जिन्दगी के बीच के हिसाब को व्यक्त करती हैं अमरेन्द्र मिश्र की कविता उम्रभर—
एक उम्र होती है उम्र को झुठलाने की
एक उम्र होती है, जब थकती है
साथ चलते हमारे संग और
जिन्दगी माँगती है अपना हिसाब ।
अब बात करुँ मैं उस कवि हृदय की जिन्होंने राजनीति की उलझे हुए पेंचों में दिल के साथ जीने का वक्त निकाल लिया । अनुभवों का संयोजन ही कविता होती है । मैं सम्बोधन कर रही हूँ नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री लोकेन्द्रबहादुर चन्द या यूँ कहूँ कि कवि लोकेन्द्र बहादुर चन्द जी की । कोमल शब्दों का गुम्फन, कुछ खोने और कुछ पा लेने की अनुभूतियों की व्याख्या, एक सार्थक स्वर बन जाने की चाह या फिर जीवन की भागदौड़ से थक कर विराम लेने की हसरत, सब कुछ बयाँ है आपकी कविता में —
हृदय की सब कलुष पीड़ा फेक देना चाहता हूँ
मैं किसी का स्नेह भीगा, एक स्वर बस चाहता हूँ ।
ये पंक्तियाँ इनकी मानवीय गुणों की उच्चतम परिभाषा है जहाँ वो हर बुरी सोच से बाहर निकल जाना चाहते हैं । आपकी कविता सो जाऊँ छायावाद के युग में ले जाती है । कवि जीता है अपनी खामोशियों में, अपनी हसरतों में और जीवन से मिली अच्छे बुरे अनुभवों में । एक खामोशी और बैचेनी आपकी कविता में व्यक्त होती चली गई है—
अब जीवन से प्रश्न न पूछूँ, ना प्रश्नों के उत्तर खोजूँ
ना पथ की पहचान टटोलूँ, ना मंजिल के बारे में पूछूँ ।
सरिता को आँगन में लाऊँ, आकण्ठ तृप्त भी अब हो जाऊँ
लो पतवार तुम्हारे हाथों, अब धीरज धर मैं सो जाऊँ
थामो मेरी जीवन नौका, मेरा अपना लक्ष्य नहीं अब
नहीं रहा अब दुख भी अपना, सुख तो अपना था ही कब ?
आपके लिए मैं बस यही कहुँगी—
जिन्दगी से है शिकायतें अपनी जगह, जी लिया मैंने अपने हिस्से का सुख दुख
पर ये क्या कम है कि मैं जिन्दा रहूँगा शब्दों के रूप में तेरे दिल में कहीं ।
ईश्वर उनकी रचनाधर्मिता और कार्यक्षमता बनाए रखे यही कामना है ।
अपनी व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत मुकुन्द आचार्य जी की कविता भूचाल नेपाल के दर्द को जिन्दा कर गई जिसके घाव आज भी हरे हैं ।
वहीं ऋषभ देव घिमिरे की कविता खलनायक आज की राजनीति पर गहरा कटाक्ष है । इसी तरह इस सेतु के अन्य कवि डा. सुमी लोहनी, बून्द राणा, गणेश लाठ, कपिल अन्जान, रामबहादुर पहाडी, मंजु काँचुली, उदय चन्द्र दास, आदि कई कवियों की अनुभूतियों से सजी भारत नेपाल काव्य सेतू एक अनुपम कृति के रूप में हमारे समक्ष आई है । कुछ जो खटका दिल को वो है संपादन और प्रूफ संशोधन । कई जगहों पर ये गलतियाँ आँखों को चुभती रही । प्रकाशित रचना या कृति धरोहर बन जाती है । एकाध जगहों को हम नजरअंदाज कर सकते हैं पर अनगिनत को नहीं बावजूद इसके एक सफल कृति प्रस्तुत करने के लिए साधुवाद ।
अंत में मेरी चंद पंक्तियों के साथ—
शब्दों ने मुझसे कहा, तुम मुझे जोड़ो
मैं तुम्हारी भावनाओं को शक्ल दूँगा
आकार दूँगा तुम्हारी उन हसरतों को
जो छुपा रखा है तुमने दिल के किसी कोने में
दूर करुँगा तुम्हारी पेशानी पर पड़ी लकीरों को
क्योंकि मैं व्याख्या बनूँगा तुम्हारे अस्तित्व की ।
कृतज्ञता के साथ विदा आपसे इतना कह कर कि जो छूटा वो कम ना था, बस वक्त की मेहरबानी कम थी ।शुकिंया ।
















