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कुर्सी का खेल … : गंगेशकुमार मिश्र

 

कुर्सी का खेल … गंगेशकुमार मिश्र
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छक कर खाई;
रसमलाई;
जब-जब कुर्सी;
मिली है, भाई।
भूलूँ कैसे ?
ऊँची कुर्सी;
चाहूँ, भी; न जाय भुलाई।
लेता हूँ, तो देता हूँ;
नेता हूँ !
अभिनेता हूँ !
मन्त्री पद, पाने को;
दलबदलू बन;
नाम कमाई।
ईमान बेच,
बेईमान, बन गए;
झूठों के,
भगवान बन गए;
भोली जनता, बकरी जैसी;
बन बैठा मैं;
आज कसाई।

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