Thu. Apr 30th, 2026
English मे देखने के लिए क्लिक करें

जब प्रेम से मीत बुलाते हों दुश्मन भी गले लगाते हों,अपनत्व की आभा होती है उस रोज़ दिवाली होती है

 

 

जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई में भी मेले हों,
आनंद की आभा होती है
*उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है ।*

जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों,
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की,
उत्साह की आभा होती है
*उस रोज़ दिवाली होती है ।*

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
*उस रोज़ दिवाली होती है ।*

यह भी पढें   थापाथली क्षेत्र से ६८ परिवार सरकार के संपर्क में, सुकुम्बासी परिवारों को नागार्जुन सरकारी अपार्टमेंट में रखने के लिए सरकार सक्रिय

जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव के बाजे बज जाएं,
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
तृप्ति की आभा होती है
*उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है .*।

–अटलबिहारी वाजपेयी

अटलजी की कविता है , अतिशय सुंदर .

About Author

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *