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ओंकार का अर्थ एक सर्वव्यापी ध्वनि है

 

श्री गुरुग्रंथ साहिब का मंगलाचरण एक ओंकार से प्रारंभ होता हैं। श्री गुरु नानक देव जी महाराज ने पूरे गुरुग्रंथ साहिब में किसी न किसी रूप में अनेक बार इसे दोहराया है। ओंकार की महिमा का गुणगान वेद, उपनिषद् और पुराण सभी कर रहे हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि ओंकार का अर्थ एक सर्वव्यापी ध्वनि से है, जो निरंतर गूंजती रहती है। जैसे एक चालू कारखाने में निरंतर एक प्रकार की ध्वनि गूंजती रहती है, उसी प्रकार की ध्वनि सृष्टि-रचना की अनंत प्रक्रिया से सतत रूप से उत्पन्न होती रहती है, जिसका आकार ऊँ (ओंकार) जैसा ही होता है।
इसीलिए इसे ओंकार कहते हैं। ओंकार कोई स्वर नहीं है और न ही इसका कोई अर्थ है। यह एक अनहद नाद है, जो अनादि और अनंत है, जो विश्व की अबाध गति का प्रमाण है। इस ऊँ (ओंकार) के महत्व को भारतीय दर्शन और संस्कृति ने बहुत महत्व दिया है। मानव निर्मित औद्योगिक सभ्यता से पहले आदिम युग में जब मनुष्य अरण्यवासी हुआ करते थे, तब उनकी इंद्रियां प्रकृति से एकाकार रहा करती थीं। पाश्चात्य दार्शनिक रूसो कहते हैं कि तब प्रकृति और मनुष्य के स्वाभाव में भेद नहीं था। नगरीय-सभ्यता के आरंभ होते ही, यह एकता टूट गई। कारखानों के विकास और मशीनी युग के सूत्रपात ने प्रकृति और मानव के घनिष्ठ संबंधों को तोड़ दिया और मनुष्य स्वनिर्मित सभ्यता के शोर-शराबे में डूब गया।
वह संवेदनशील न रहकर तार्किक और बौद्धिक होता गया। असीम से विलग होकर ससीम और संकुचित होता गया। प्राकृतिक ध्वनियों-प्रतिध्वनियों और मनुष्य के कान के मध्य, कल-कारखानों की अनवरत ध्वनि ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली, जिससे ऊँ (ओंकार) की ध्वनि तो ओट में चली गई, किंतु इसका अर्थ यह नहीं होता कि सूर्य बादलों की ओट में चला गया है तो सूर्य सदा के लिए विलीन हो गया। गुरुनानक देव जी का प्रथम उद्घोष ओंकार ही था। यह उन्हें सुनाई पड़ा, उन्हें इसकी अनुभूति हुई, तभी तो आज विश्व इस ओंकार की अनूभूति के लिए व्यथित है, व्याकुल है। इस रचनात्मक ध्वनि को ‘ब्रrा’ मान लिया गया। यही ‘ऊँ’ यानी ओंकार आज्ञा चक्र को जाग्रत करता है। गुरुनानक देव जी और गुरुगोविंद सिंह जी त्रिकालदर्शी थे। यही कारण है कि आज ओंकार साधना के इन महान आत्माओं को विश्व का प्रबुद्ध वर्ग पूजता है। श्री गुरुनानक देव जी केवल सिखों के ही आराध्य नहीं, बल्कि वह संपूर्ण मानवता के लिए आराध्य हैं।

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