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क्या नेपाली शासक उपेन्द्र यादव को प्रधानमन्त्री बनने देगी ? : रोशन झा

 

रोशन झा, सप्तरी | सियासत की रंगत में ना डूबो इतना, कि वीरों की शहादत भी नजर ना आए, जरा सा याद कर लो अपने वायदे जुबान को, गर तुम्हे अपनी जुबां का कहा याद आए.” नेपाल की राजनीति में एक नयाँ मोड सामने आया है, संघिय समाजवादी फोरम नेपाल पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री उपेन्द्र यादव नेपाल के अगले प्रधानमंत्री बन सकते हैं ये अफवाह ईन दिनो जोरशोर के साथ सामाजिक संजालों में फैल रही है और कूछ अवसरवादी नेपाली मिडिया इसे तेजी से फैला भी रहे हैं। नेपाल में अभी प्रदेश सभा और प्रतिनिधि सभा का चुनाव सम्पन्न हुआ है, मधेसी मतदाताओं के बाहुल्य क्षेत्रों में मधेस केन्द्रित दलों को भारी बहुमत मिला है। मौजूदा हालात में नश्लभेदी नेपाली शासक सभी प्रदेशों में अपना गभर्नर भी न्युक्त कर चुकी है ऐसे में उनका मकसद साफ है कि प्रदेश की मुख्यमंत्री, राष्टिय सभा, प्रशासनिक निकाय, न्यायपालिका लगायत सभी उच्चतम पदों में पहाड़ी(नेपालीयों) को बैठाना ताकि वें आसानी से मधेस और मधेशीयों पे अपना शासन कायम रख सकें। सत्ता मोह में लिप्त ईन मधेस केन्द्रित नेताओं को भ्रमित कर अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए शासकों ने उपेन्द्र जी को प्रधानमंत्री पद की दावेदार के रुप में आगे कर मधेस से विजयी जनप्रतिनिधियों को गुमराह कर उन्का ध्यान भटकाने के लिए ये स्वांग रचा है।

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आइए नजर डालते हैं उपेन्द्र यादव की प्रधानमंत्री बनने की संभावनाओं पर, बडे ताज्जुब की बात है कि सदियों से मधेशियों पर दमन और शोषण करती रही नेपाली शासक कभी भी नेपाल के सर्वोच्च पद पर मधेशी को न्युक्त करेंगे ? कदापि नहीं और नाहीं नेपाली जनता किसी मधेसी को नेपाल के महामहिम के रुप में स्विकार करेंगे, क्योंकि जो लोग मधेशियों को भोट कभी भी जिताते नही है वो मधेसी को कैसे अपना आॅका मानने को तैयार होंगे ? बहुमतीय सरकार गठन में अगर उपेन्द्र यादव और उनकी पार्टी अहम भूमिका निर्वाह करती है तब भी शासक उन्हें केवल दो चार (लाचार) मन्त्रालय ही प्रदान करेंगे, ना कि देश का बागडोर ! एक विचारणीय बात ये भी है कि महज १०-११ सीट लानेवाले मधेस केन्द्रित दलों के साथ गठबन्धन कर सरकार गठन करने की शासकों को कोई आवश्यकता नहीं है वें खूद ही सरकार गठन करने के लिए सक्षम है। मधेस और मधेसी जनता की हकहित का मुद्दा उठाकर सैंकड़ों मधेसी वीरों की कुर्बानी के बाद मधेस की राजनीति में स्थापित हुए ईन मौकापरस्त सत्ता पुजारीयों ने बार-बार मधेशी जनभावनाओं के बिपरित सम्झौता का हवाला देकर मधेस के साथ गद्दारी किया है, ऐसे में अन्तिम मौका के रुप में मधेशी जनता के बीच से अनेकों प्रतिवद्धता के साथ बहुमत प्राप्त करनेवाले ईन छलचंदो के लिए यह अन्तिम संघर्ष भी है अगर इसबार भी ये लोग अपनी जुबान पर अडिग ना रह कर पद और पैसा के लालच में आकर सत्ता के आगे घुटने टेक दैते है तो मधेस से इनका राजनीति समाप्त होना निश्चित है, क्योंकि मधेस में अब एक और योद्धा ने जन्म ले लिया है। आगे का मार्ग स्पष्ट है इसबार हमारे नेताओं के लिए एक बडी चुनौती सामने है, देखना ये है कि नेताजी मधेसी जनमत का कदर करते हैं कि मंत्री प्रधानमंत्री पद के लिए मधेस के मुद्दों से पिछे हटते हैं !! मधेसी जनता अपने अधिकारों के लिए सदैव ही लड़ते आए हैं और जब भी मधेस का अस्तित्व खतरे में पड़ा है तब कोई ना कोई वीर पुरुष अवश्य ही अवतरित हुआ है। इस नदी की धार में ठंडी हवा तो आती हैं, नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो हैं. जय मधेस |

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