Wed. Apr 22nd, 2026
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अतीत के साथ वर्तमान का समन्वय : जौहर ज्वाला

 

डा.श्वेता दीप्ति

 

 

“युगों के बीतते भले ही कुछ लोग कर दें विकृत इतिहास करके मनमानी

सुगंध बनकर रहेगी भावी पीढ़ी के दिलों में इन देवियों की निशानी ।”

सौभाग्यवश डा.रामस्वरुप सिहं की कृति ‘जौहर ज्वाला’ ऐसे वक्त पढ़ने को मिली जब पद्मावती और जौहर की चर्चा जोरो पर है और इतिहास एक बार फिर जनमानस के मन में जिन्दा हो रहा है । जौहर यानि सतीत्व की रक्षा के लिए खुद की आहुति देना या आग की ज्वाला में खुद को होम कर देना । कवि ने आज के पटल पर अतीत को उकेरने की कोशिश की है और इसमें उन्हें सफलता भी मिली है । भारत का एक समृद्ध इतिहास रहा है, जिसके कई पहलू झकझोरने वाले हैं । उक्त कृति ऐसी ही एक गाथा को व्यक्त करती है । कहते हैं इतिहास जहाँ मौन होता है साहित्य वहीं से मुखर होता है । कल्पना साहित्य को जीवंतता प्रदान करती है । इतिहास कहता है कि महारानी पद्मिनी के सौन्दर्य पर आशक्त होकर अलाउद्दीन खिलजी ने राजा रतनसिंह को बन्दी बना लिया था और तब रानी रौद्र रुप धारण कर शिविर पर आक्रमण करती है और राजा को मुक्त कराती है । परन्तु अलाउद्दीन इस हार को सहन नहीं कर पाता और महल पर आक्रमण कर देता है । जब पद्मिनी को यह अहसास हो जाता है कि उनकी हार निश्चित है तब वह सोलह हजार वीरांगनाओं के साथ सतीत्व की रक्षा हेतु अग्निकुण्ड में समाहित हो जाती है । इतिहास की यही गाथा जौहर ज्वाला की विषय वस्तु बना । कवि स्वयं मानते हैं कि “जौहर ज्वाला” काव्य के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अन्तःकरण से निःसृत भावों का समावेश है । “जौहर ज्वाला” नामक मेरी इस पुस्तक में इतिहास के अतीत को वर्तमान से जोडना मेरा मुख्य ध्येय है । जौहर और साका का इतिहास जनमानस को झकझोरने वाला इतिहास है ।” पर कवि जौहर जैसी घटना की पुनरावृति की कल्पना नहीं करते बल्कि इस रचना में आज की पीढि़यों से यह आह्वान करते हैं कि —

अब समय की माँग है बेटी ! इस रास्ते पर

अब कभी भी तुम न चलना ।

ले हाथ में बारुद गोला अन्तिम समय तक

दुश्मनों से युद्ध करना ।

दुश्मनों के हाथों यदि कभी भी नौबत

अस्मत लुटने की आ जाए तो,

तुम भस्म होने से प्रथम चन्डिका बन

दुश्मनों को भस्म करना ।

कर लो याद ये संदेश तुम देश की,

देवियों से यह संदेश कहना ।

कवि कल को लेकर जहाँ उद्वेलित है वहीं आज को लेकर चिन्तित भी । वो सवाल करते हैं कि आत्म बलिदान, किसे कहते हैं ? क्या आज की पीढी को पता है ? कवि को आज की वो कृतघ्नता चुभती है जो लोग विस्मृत कर रहे हैं — निछावर कर दिया सर्वस्व देश हित में,

जिन शहीदों ने, उन्हीं का विस्मरण !

कैसी कृतघ्नता है ?

क्षुद्र स्वार्थ साधन हेतु

देश के कुछ लोग उनको कह रहे उग्रवादी ?

कवि अपनी लेखनी के माध्यम से इन कुविचारों से लड़ना चाहते हैं और स्वयं उद्घोष करते हैं कि—

आज का आदमी, सिर्फ अपने गुण और दूसरों के

अवगुण ही देखता है

इसीलिये यह कवि, जिसके हाथ में डंडा था कर्तव्य का

आज लेखनी लेकर खड़ा है ।

जौहर ज्वाला के प्रथम सर्ग में इतिहास के उन नायकों की चर्चा है जिन्होंने अपने प्राणों का बलिदान दिया । तन पर असंख्य घाव होने के बाद भी राणा सांगा ने हिम्मत नहीं हारी । वीर अपने प्राणों की बाजी लगाने से पीछे नहीं हटते और न ही नारियाँ अपने सुहाग को न्योछावर करने से हिचकती है —

क्षत्राणी

क्षत्रिय वंश की

बलिहारी तेरे अंश की,

अर्पण देश हित सिन्दूर अपनी माँग का

हँसकर करें ।

युद्ध में लडता हुआ

देश हित हो जाए जो बलिदान ।

वह सब कुछ खोकर

अपने देश के सम्मान को अमर करें ।

द्वितीय सर्ग में हल्दीघाटी का युद्ध, भामाशाह का त्याग, अरावली कानन में घास की रोटी खा रहे बालकों का करुण क्रन्दन व मान सिंह का विश्वासघात आदि का मर्मस्पर्शी चित्रण है —

हल्दीघाटी का भीषण युद्ध

उसूलों के लिए हुआ था युद्ध

इतिहास यह कहता रहेगा ।

देशभक्त भामाशाह ने

सारा खजाना अर्पित किया राणा को ।

तृतीय सर्ग में युद्ध का वर्णन है । पक्ष और विपक्ष दोनों की ओर से नगाड़े बजते हैं । अश्व, हाथी और पुरुषों के शीश कटते हैं । चारो ओर कोलाहल मचा हुआ है । हर ओर रुदन और चीख चित्कार का वातावरण है —

प्रारम्भ हुई भीषण मारकाट

प्रलय जैसा लगा होने ।

हय रुण्ड, गज रुण्ड, नरमुण्ड

धरती पर कटकर लगे गिरने ।

उक्त पंक्तियों में शब्दों के संयोजन देखते ही बनते हैं । कवि मार्मिकता के साथ उन विधवाओं का वर्णन करते हैं जो खुद को मिटाकर वहाँ पहुँच जाना चाहती हैं जहाँ वीरगति को प्राप्त कर उनके पति चले गए हैं —

हो गए बलिदान खुद, किया धन्य धरा धाम को ।

करवटें सूर्य क्यों लेने लगा ?

अस्त वह होने लगा ठहरो ।

न जाओ भास्कर मिला दो मेरे घनश्याम को ।

देवी की पावन देह से

एक प्रज्वलित ज्वाला हुई ।

ज रही पति मिलन को

पर करती आसमाँ के छोर को ।

फूल बरसे आसमाँ से

खुश गन्धर्व, किन्नर, देवता ।

सदा गीत गाये जायेंगे

कर याद इस बलिदान को ।

चतुर्थ सर्ग में एक क्षत्रिय वीरवाला द्वारा इतिहास के पन्ने पलटने एवं वीरांगनाओं की आहुति देने पर माँ बेटी का करुणामय कथन है । इस सर्ग में कवि अतीत और वर्तमान को एक साथ देखते हैं और समन्वय स्थापित करते हैं ।

पंचम सर्ग में वीरवाला के चितौड़गढ़ पहुँचने, शहीद पतियों के प्रति पत्नियों का अपरिमित प्रेम, जौहर की कथा सुनकर रोमांचित होने की दशा, गहरे लाल रंग के सूर्य में, सागर में देवियों के सौन्दर्य की प्रस्तुति है ।

अंत में कवि वीर वालाओं को सम्बोधित करते हैं और कहते हैं —

इस देश की वीरवालाओं ने ही

हमेशा बनके चिंगारी इस दुनिया की

लम्पट, अन्यायी, अहंकारी सत्ता को जलाया है ।

कवि बेटियों से कहते हैं —एक दीप से ही तो जलते हैं अनेकों दीप दुनिया में ।

कैसी भी आपत्ति आ जाये, बेटी ! तुम सब चिंगारी बनी रहना ।

तुम्ही ऐसी शक्ति हो ….और कुछ बनने की जरुरत है नहीं तुमको, चिंगारी बनी रहना ।

एक संदेश के साथ “जौहर ज्वाला” समाप्त होती है । कवि यह संदेश देते हैं कि गौरवशाली अतीत रहा है हमारा पर आज की बेटियों को जौहर करने की नहीं चिंगारी बनने की आवश्यकता है । उसे स्वयं अपने सतीत्व की सुरक्षा करनी है और इसके लिए उसे सक्षम होने की आवश्यकता है । कम एवं सहज शब्दों को संजो कर कवि ने बहुत बड़ा संदेश सम्प्रेषित किया है । “जौहर ज्वाला” को पढ़ना खुद से होकर गुजरने की अनुभूति दे गया ।

 

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