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ईश्वरचंद विद्यासागर

 

कोई भी व्यक्ति एक दिन में महापुरूष नहीं बनता। वर्षों की साधना और बचपन की छोटी-छोटी सीख उनके व्यक्तित्व को गढ़ती हैं। ईश्वरचंद विद्यासागर के बचपन में भी एक ऐसी ही घटना हुई, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी।

एक दिन उनके घर पर एक भिखारी आया। उसको हाथ फैलाये देख उनके मन में दया का भाव पैदा हुआ। वे तुरंत घर के अंदर गए और उन्होंने मां से कहा कि वे उस भिखारी को कुछ दे दें। मां के पास उस समय कुछ भी नहीं था। उनके हाथ में सोने के कंगन थे।

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मां ने अपने कंगन उतारकर ईश्वरचंद विद्यासागर के हाथ में रख दिए और कहा- जिस दिन तुम बड़े हो जाओगे, उस दिन मेरे लिए दूसरा बनवा देना। उन्होंने कहा कि अभी इसे बेचकर जरूरतमंदों की सहायता कर दो। बड़े होने पर ईश्वरचंद विद्यासागर ने अपनी पहली कमाई से मां के लिए सोने के कंगन बनवाकर दे दिए।

इसके साथ ही उन्होंने मां से कहा कि आज मैंने बचपन का तुम्हारा कर्ज उतार दिया। तब मां ने कहा बेटे, मेरा कर्ज उस दिन उतरेगा, जब किसी और जरूरतमंद के लिए मुझे ये कंगन दोबारा नहीं उतारने होंगे।

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मां की सीख ईश्वरचंद विद्यासागर के दिल को छू गई और उनके जीवन का दर्शन ही बदल गया। इसके साथ ही ईश्वरचंद विद्यासागर ने प्रण किया कि वे अपना जीवन गरीब-दुखियों की सेवा करने और उनके कष्ट दूर करने में बिताएंगे। उन्होंने ऐसा ही करके दिखाया भी।

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