कबिता
ये फूल हमारे उपवन के
:-वीरेन्द्रप्रसाद मिश्र
बच्चे हैं नटखट भी होंगे
कुछ पाने को ये मचलते होंेगे
अरमान भरा दिल उनका होगा
पूरा नहीं कर पाते होंेगे हम
लाचारी हमारी क्या जाने वे
ये फूल हैं मेरे उपवन के।
मत तोडÞो मत कुचलो इनको
बचाओं जंगली घाँसो से इनको
सींचो स्वच्छ पानी से इनको
छाया दो गर्मी और वषर्ा में इनको
अनुचित विकास मत होने दो इन मेंये फूल हैं मेरे उपवन के।
नित माली बन, देखो इनको
सुबह शाम ध्यान रखो इनपर
फूलों के पौधों के समान
इन्हें सँवारों इन्हे बचाओ
अपनों की भाँती देखो इनको
ये फूल हैं मेरे उपवन के।
पल्लवित पुष्पित होने दो इनको
इन्हें देख कलियाँ मुस्काएँ
खिलकर वे उदास न हो जाएँ
बिखरने से उन्हें बचाओ
आस उनका टूट न जाए
ये फूल हमारे उपवन के।
देश को प्रदेशों में बाँटो
क्या मधेशी, क्या जनजाति
क्या दलित, क्या उपेक्षित, ब्राहृमण-क्षत्री
समुचित सम्मान दो इन सबको
संतुलित विकास का अवसर दो
ये फूल हमारे उपवन के।
:-वीरेन्द्रप्रसाद मिश्र
बच्चे हैं नटखट भी होंगे
कुछ पाने को ये मचलते होंेगे
अरमान भरा दिल उनका होगा
पूरा नहीं कर पाते होंेगे हम
लाचारी हमारी क्या जाने वे
ये फूल हैं मेरे उपवन के।
मत तोडÞो मत कुचलो इनको
बचाओं जंगली घाँसो से इनको
सींचो स्वच्छ पानी से इनको
छाया दो गर्मी और वषर्ा में इनको
अनुचित विकास मत होने दो इन मेंये फूल हैं मेरे उपवन के।
नित माली बन, देखो इनको
सुबह शाम ध्यान रखो इनपर
फूलों के पौधों के समान
इन्हें सँवारों इन्हे बचाओ
अपनों की भाँती देखो इनको
ये फूल हैं मेरे उपवन के।
पल्लवित पुष्पित होने दो इनको
इन्हें देख कलियाँ मुस्काएँ
खिलकर वे उदास न हो जाएँ
बिखरने से उन्हें बचाओ
आस उनका टूट न जाए
ये फूल हमारे उपवन के।
देश को प्रदेशों में बाँटो
क्या मधेशी, क्या जनजाति
क्या दलित, क्या उपेक्षित, ब्राहृमण-क्षत्री
समुचित सम्मान दो इन सबको
संतुलित विकास का अवसर दो
ये फूल हमारे उपवन के।
गली गली में गली है !
:-मौन आवाजपहली गली के बाद
दूसरी गली आती है,
जहाँ से मैं गुजरा था !
उस गली के बाद
एक दूसरी गली आती है
जहाँ से तुम गुजरे थे !
मुझे पता है-
उसी गली के उस तरफ
कोई दूसरी गली आती है
इस तरह ‘हम चल रहे हैं’
ऐसा लगता है
हम गलियों में
मना रहे हें गली उत्सव !
मगर ये न समझना कि
अब नहीं बची दूसरी गली
क्योंकि अभी दूसरी गली से
गुजरना बाँकी है
जहाँ मुश्किल से मिलती हों
दूसरी गलियाँ !
जैसा कि इस देश से गुजर कर
हम पहुँचेगे दूसरे देश में
फकीरों की तरह
यात्रा के बाद यात्रा
फिर दूसरी यात्रा !
मगर, यात्रा में राहें समाप्त नहीं होती
पहली गली के बाद दूसरी गली
जहां पहुँचते हैं, पहली गली से
और, उस गली के बाद आएगी दूसरी गली
उस गली में तुम हो- यह विश्वास,
मैं इसी गली में बैठकर कर रहा हूँ
औ, यह गली तुम्हारी गली से
भिन्न है
क्योंकि इस गली के बाद हीं
वह गली आती है
जिस गली में तुम रहते हो !
इस जिन्दगी में तुम्हें पाने के लिए
मुझे इस गली को पार करना ही होगा
और, पहुँचना ही होगा तुम्हारी गली में
जिस गली में तुम कर रहे हो इन्तजÞार
जिस गली में है एक सपना मिलन का
और, जिस गली में है
एक सुन्दर सी कल्पना,
वचन देता हूँ
इस गली से गुजर कर
आउँगा मैं उस गली,
जिस गली के बाद शायद हम
साथ चलेंगे दूसरी गली में
और, वही गली होगी अन्तिम गली !
–हिन्दी रुपान्तरण मुकुन्द आचार्य)
युवा कवि श्याम बलामी अपने छद्म नाम ‘मौन आवाज’ से भी काव्य जगत में परिचित हैं
:-मौन आवाजपहली गली के बाद
दूसरी गली आती है,
जहाँ से मैं गुजरा था !
उस गली के बाद
एक दूसरी गली आती है
जहाँ से तुम गुजरे थे !
मुझे पता है-
उसी गली के उस तरफ
कोई दूसरी गली आती है
इस तरह ‘हम चल रहे हैं’
ऐसा लगता है
हम गलियों में
मना रहे हें गली उत्सव !
मगर ये न समझना कि
अब नहीं बची दूसरी गली
क्योंकि अभी दूसरी गली से
गुजरना बाँकी है
जहाँ मुश्किल से मिलती हों
दूसरी गलियाँ !
जैसा कि इस देश से गुजर कर
हम पहुँचेगे दूसरे देश में
फकीरों की तरह
यात्रा के बाद यात्रा
फिर दूसरी यात्रा !
मगर, यात्रा में राहें समाप्त नहीं होती
पहली गली के बाद दूसरी गली
जहां पहुँचते हैं, पहली गली से
और, उस गली के बाद आएगी दूसरी गली
उस गली में तुम हो- यह विश्वास,
मैं इसी गली में बैठकर कर रहा हूँ
औ, यह गली तुम्हारी गली से
भिन्न है
क्योंकि इस गली के बाद हीं
वह गली आती है
जिस गली में तुम रहते हो !
इस जिन्दगी में तुम्हें पाने के लिए
मुझे इस गली को पार करना ही होगा
और, पहुँचना ही होगा तुम्हारी गली में
जिस गली में तुम कर रहे हो इन्तजÞार
जिस गली में है एक सपना मिलन का
और, जिस गली में है
एक सुन्दर सी कल्पना,
वचन देता हूँ
इस गली से गुजर कर
आउँगा मैं उस गली,
जिस गली के बाद शायद हम
साथ चलेंगे दूसरी गली में
और, वही गली होगी अन्तिम गली !
–हिन्दी रुपान्तरण मुकुन्द आचार्य)
युवा कवि श्याम बलामी अपने छद्म नाम ‘मौन आवाज’ से भी काव्य जगत में परिचित हैं


