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कैसी उल्टी हुकूमत है, कैसा उल्टा है ज़माना ? जिन्हें होना था जेलखानों में, उनके हाथों में है जेलखाना : अजयकुमार झा

क्या यह एक सार्वभौम राष्ट्र का लक्षण है ?

जनकपुर | अजय कुमार झा | महाभारत में एक घटना है। राजकुमारों को परीक्षा भी लेना है और पीड़ित को न्याय भी देना है। इसी क्रममे एक विद्वान् ब्राह्मण और मूर्ख गरीब सूद्र व्यक्ति के विच हुए मारपीट को न्याय करना था। दुर्योधन ने सीधे मुर्ख गरीब सूद्र व्यक्ति को दोषी करार दिया और दण्ड का भागी भी।यह कहकर की ब्राह्मण से झगड़ने का सूद्र को अधिकार ही नहीं है।अतः दोषी हर हाल में वह सूद्र ही है। इसके वाद न्याय करने हेतु युद्धिष्ठिर को बुलाया गया। सारी बातें समझने के वाद युद्धिष्ठिर ने निर्णय के साथ जो तर्क प्रस्तुत किया;वह आज भी सांदर्भिक है। युद्धिष्ठिर ने ब्राह्मण को यह कहते हुए दोषी ठहराया की आप तो ज्ञानी हैं। पंडित हैं। लोगों को उनका धर्म बताते हैं। बच्चों को जीवन जीने की कला सिखाते हैं। सम्यकता,शालीनता आपका आदर्श है। सबमे ब्रह्म को देख लेना आप का गुण है। समाज में शान्ति का सूत्र देना आप के जीवन का उद्देश्य है। बिगड़े हुए को सही राह पे लाना आपका कर्तव्य है। यह सारी बातें मैंने भी आप से ही सीखी है। फिर आप ने उस अज्ञानी के ऊपर हाथ कैसे उठाया?क्या आपने अपनी सारी की सारी प्रज्ञा को खो दिया है? क्या आप पथ भ्रष्ट हो चुके है?अगर हाँ;तो भी दोष आप को लगेगा। क्युकी आप उस सूद्र से हर मायने में संपन्न हैं। जैसे एक अवोध बालक के गलती को सहज ही क्षमा कर दिया जाता है। वैसे ही वह अज्ञानी सूद्र भी क्षमा के हकदार है। परन्तु ब्राह्मण को क्षमा नहीं किया जा सकता। क्युकी जो न्याय और धर्म सिखाता है वह अनजाने गल्ती नहीं कर सकता।

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यही हालत आज छह महीने से नेपाल में प्रधान न्यायाधीश को लेकर चल रहा था। जिस देस के प्रधान न्यायधीश का प्रमाण पत्र पे प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाय। और गलत सावित हो गया हो; फिर भी वो पद नहीं छोड़ना चाहे; अडान ले; और जिन्हें कटघरे में होना चाहिए वो दूसरों को न्याय दे। इसको क्या कहा जाय!

किसी सायर ने कहा है- “कैसी उल्टी हुकूमत है ? कैसा उल्टा है ज़माना ? जिन्हें होना था जेलखानों में ; उनके हाथों में है जेलखाना “। 2074 श्रावण 2 गत्ते सम्माननीय महामहिम राष्ट्रपती श्री विद्यादेवी भंडारी जी के द्वारा नेपाल के संबिधान के धरा 129 के उपधारा 2 बमोजिम संवैधानिक परिषद् के सिफारिस में सर्वोच्च अदालत के वरिष्ठतम न्यायाधीश श्री गोपाल प्रसाद पराजुलीजी को नेपाल के प्रधान न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया था। उस समय भी उन के जन्म मिति को लेकर विवाद उठा था। विवादित मिति इस प्रकार है। पहल- 2010 श्रावण 16 गत्ते दूसरा-2009 श्रावण 21 गत्ते सोचने बाली बात है। यह जन्म मिति नेपाल के प्रधान न्यायाधीश जी का है। जब परम शक्तिशाली पद पे आसीन लोग अपनी और पद के मान-मर्यादा को इस प्रकार सार्वजनिक रूपसे मान हानि करबा सकतें हैं; तो क्या वो देस और जनता के साथ न्याय किए होंगे? क्या इनसे राष्ट्र गौरवान्वित हुआ है? अगर नहीं; तो अबतक के वह फैसला जो इन्होने किया है;उसपर कैसे भरोसा होगा?जो अन्याय में पड़े है उनका क्या होगा? और जो पद बचाने के लिए गलत तरीका को इस्तेमाल कर सकता है; वो धन कमाने के लिए क्या और गलत नहीं कर सकता? (लोभ है व्याधिंह कर मुला) हम जैसे आम नागरिक अब किस पर और कैसे भरोसा करेंगे ! किस आधार पर सर्वोच्च की सर्वोच्चता कायम रहेगा। इस विषय पर गहण चिंतन और अविलम्ब ठोस निर्णय की आवश्यकता है। ता की आम नागरिक अपने देस के सर्वोच्च गरिमावान और विवेक के खानी देवतुल्य, सभी आकांक्षाओं से रहित,निर्द्वन्द्व,निर्लेप,निर्विकार तथा निष्पक्ष व्यक्तित्व के धनी,प्रज्ञावान न्याय के प्रतिमूर्ति के प्रति पूर्णतः आश्वस्त हो सकें। अतः नयाँ नेपाल के नवनिर्मित सरकार और प्रधानमंत्री जी के समक्ष नेपाल के नागरिक और बुद्धिजीवियों का अपील है की एसा प्रयास किया जाय। सर्वोच्च अदालत द्वारा प्रकाशित वार्षिक बुलेटिन में प्रति वर्ष सभी न्यायाधीशों की जन्म मिति प्रकाशित होती है। जो की एक मजबूत आधार है पदीय गरिमा को बचाने का। और वरिष्ठता तथा कनिष्ठता को सार्वजनिक कर विवाद से बचने का। जहाँ से देस के विवादों को निकास मिलता है वहां तंत्र कमसेकम निर्विवाद हो ।

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