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सोच रहा हूँ (कविता ) : डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

 

सोच रहा हूँ

 

एक दिन मेरे दोस्त को, मैं लगा गुमसुम

बोला वो, क्या सोच रहे हो तुम

बातें बहुत सी हैं

सोच रहा हूँ, क्या सोचूँ, बोला मैं।

 

अलग-अलग हैं कितनी बातें

क्या-क्या हैं नए सन्दर्भ

विषयो की बिबिधता इतनी

चुनना बना जी का जाल।

 

दुःख पे जाऊ

जो लम्बे समय तक रहता है याद

या सुख पे, जो विस्मृत हो जाता है जल्दी

यादो से हर बार।

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पिछले करीब समय में, क्या मिला मुझे

जोर शायद इसपे डालूँगा

परन्तु संशय बना है अभी भी

क्या यही है सही विषय सोचने का।

 

झंझावात ये जटिल 

झकझोर रही कपाल

सचमुच सोचना क्या है मुझे

प्रश्न है ये जंजाल।

 

डॉ. रूपेश जैन ‘राहत’

१६/०६/०८

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