लट उलझी सुलझाना तुम जब-जब भी मै लट बिखराउँ।।सविता वर्मा “ग़ज़ल”
गीत सा मै गुनगुनाऊँ
रीत बनकर प्रीत निभाऊं।।
चन्दन वन में चन्दन बनकर
प्रिय महक-महक मै जाऊं।।
लट उलझी सुलझाना तुम
जब-जब भी मै लट बिखराउँ।।
आना तुम मन के आँगन में
जब-जब भी पायल छनकाउं।।
फीके सब बेला-गुलाब
प्रेम की तेरे सुगन्ध पाऊं।।
हँस-हँस हर बाधा में झेलूँ
साथ तुम्हारा जब-जब पाऊँ।।
गीत सा मै गुनगुनाऊँ
रीत बनकर प्रीत निभाऊं।।
सविता वर्मा “ग़ज़ल”


