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लट उलझी सुलझाना तुम जब-जब भी मै लट बिखराउँ।।सविता वर्मा “ग़ज़ल”

 

19 अगस्त

गीत सा मै गुनगुनाऊँ 
रीत बनकर प्रीत निभाऊं।।

चन्दन वन में चन्दन बनकर
प्रिय महक-महक मै जाऊं।।

लट उलझी सुलझाना तुम
जब-जब भी मै लट बिखराउँ।।

आना तुम मन के आँगन में
जब-जब भी पायल छनकाउं।।

फीके सब बेला-गुलाब 
प्रेम की तेरे सुगन्ध पाऊं।।

हँस-हँस हर बाधा में झेलूँ
साथ तुम्हारा जब-जब पाऊँ।।

गीत सा मै गुनगुनाऊँ
रीत बनकर प्रीत निभाऊं।।

सविता वर्मा “ग़ज़ल”

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