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इतिहास के किसी काल-खंड में मधेशी नेताओं की गद्दारी का विश्लेषण जरुर होगा : सुजीतकुमार ठाकुर

 

  इतिहास के तारीख में दर्ज़ हैं की आप के हर आंदोलन के आह्वान पर मधेशीयों का लहू नेपाली पुलिस के द्वारा पानी की तरह बहाया गया हैं | क्या आप को नहीं लगता की आप उस लहू का ब्यापार कर के काठमांडू के रंगीनियों में खुद को डूबा लिया हैं ?



मधेशी नेतागण के नाम एक खुल्ला पत्र

सुजीतकुमार ठाकुर | मधेश नेतृत्व से करीब ३ साल पहले आप के आह्वान पर मधेश के जनता ने सडको पर निकल अपने तन मन और धन से आप के नेतृत्व में लड़ाई लड़ी | कइयों ने अपनी जाने गँवाई तो कई अभी भी उस पुलिसिया अत्याचार की पीड़ा अपने जिस्म और आत्मा पर ले के अभिशप्त जीवन जिने के लिए मजबूर हैं | ३ साल पहले के आंदोलन का मूल मर्म था बिभेदकारी संविधान के प्रति मधेशी जनमानस के अस्वीकार्यता को जोरदार तरीके से उठाना | क्या मधेशी जनता ने आप के साथ कदम मिला के चलने में कोई कमी किया ? गरीबी , लाचारी से पीड़ित मधेशी जनता ने आप के आह्वान में नेपाल भारत सिमा पर महीनो बैठ के धरना दिया | भूख , प्यास को दरकिनार कर मेंची से महाकाली तक कीर्तिमानी मानवश्रृंखला का निर्माण कर अपने सन्देश को दुनिया समक्ष पहुंचाया | ऐसी कौन सी आंदोलन हुई हैं मधेश में २००६ के बाद जिस में आप को मधेशी जनता ने साथ नहीं दिया हैं | इतिहास के तारीख में दर्ज़ हैं की आप के हर आंदोलन के आह्वान पर मधेशीयों का लहू नेपाली पुलिस के द्वारा पानी की तरह बहाया गया हैं | क्या आप को नहीं लगता की आप उस लहू का ब्यापार कर के काठमांडू के रंगीनियों में खुद को डूबा लिया हैं ? कभी आप अपने अंतर्मन में झांक के देखते हैं या नहीं ? क्या कभी आप अपने से आत्मालोचना करने का हिम्मत किया है ?

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आप में से कुछ मधेशी नेता का हमेशा शिकायत रहता हैं की मधेशी जनता हम को वोट नहीं देती चुनावों में तो हम मजबूत कैसे होंगे , यह तर्क अपने आप में इतना घटिया और बचकाना हैं की राजनैतिक समझ होने वाले हर व्यक्ति इस कुतर्क को खारिज कर देंगे | पहली बात की आप का कोई आंदोलन चुनाव में समर्थन जुटाने के लिए नहीं हुआ था , आंदोलन में अगर आप को मधेशी जनता का समर्थन हासिल नहीं होता तो आप के पास शिकायत करने की छूट होती ? पर , आप किसी आंदोलन के उद्देश्य को बिना पूरा किए , पद-पैसा के लोभ में जीव लपलपाने लगेंगे तो आप नेता नहीं बस गिद्ध के श्रेणी में अपने को पाएंगे | नेपाल का ही इतिहास को एक बार अपने दिमाग को खोल के जरूर पढ़िए तो समझ में आएगा | क्या नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ने चुनाव लड़ा था प्रजातंत्र के प्राप्ति से पहले ? जब संघर्ष किया जा रहा था प्रजातंत्र के लिए तो उस को बिना पाए चुनाव में कूदने वाले फगत अवसरवादी थे , नेता नहीं | वैसे ही माओबादियों का संघर्ष चला और उन का लक्ष्य था गणतंत्र स्थापित करने का , क्या उस से पहले हुए किसी चुनाव में माओबादी पार्टियां गई लोगों के बिच की हम आप के लिए संघार कर रहे हैं , हम को सांसद बना दो , हम को मेयर बना दो ? उसी तरह आप लोग कभी एक मधेश एक प्रदेश , स्वायत मधेश , तो कभी समावेशी संबिधान के लिए आंदोलन करते रहे और उस को बिना पूरा किए चुनावी बैतड़नी पार करने का दुस्साहस किया | वह अपराध था , आज हो सकता हैं की आप को लोगों के भोलापन का लाभ मिल जाए और आप अपने को नेता मान कर खुद गौरवान्वित मह्शूश करते हो , मंत्री जी , माननीय जी सुन के फुले न समां रहे हो परन्तु इतिहास के किसी काल-खंड में आप के गद्दारी , लाचारी और अमानुषी प्रवृति का भी विश्लेष्ण होगा और आप को उचित बिशेषन से सुशोभित किया जाएगा |

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बेशर्मी का अगर कोई परिभाषा हो तो इस से बेहतर उदाहरण इतिहास में शायद ही मिले की जिस संविधान के जारी होने के दिन को आप लोगों ने काला दिवस घोसित किया था आज उसी संविधान का सपथ लेने में आप को गर्व मह्शूश हो रहा हैं | पशु बधशाला में काटने के लिए लाइ गई जानवरो को एहसास होता हैं की कटने की बारी शायद कभी भी आ जाए शायद इसीलिए वे उन के सामने रखे घास को खाने में रूचि नहीं दिखाते , उन बेज़ुबान जानवरो को भी एहसास होता हैं कि चंद पल के लिए दिए गए खाना का मूल्य उन का जीवन होगा, वे निर्बल होते हैं , संघर्ष में जित सकने की क्षमता नहीं होती फिर भी हरसंभव प्रयाश करते हैं अपने को बचाने के लिए | लेकिन आप के पास एक मस्तिष्क हैं , अपार मधेशी जनमानस का समर्थन भी हैं फिर भी आप सत्ता, पैसा रूपी चारा के चक्कर में फंस कर खुद को और आनेवाली नस्लों को नेपाली निरंकुश सत्ता के हाथो कटने के लिए बेबस कर देते हैं ? आप के इसी दूरदर्शिता से आज मधेश खंडित हो गया हैं और संभव हैं की और खंडित हो | आज संघर्ष पूर्व पश्चिम का होगा , भाषा-भाषियों का होगा , थारू-मुस्लिम , दलित -सवर्ण , राजधानी के बिषय पर भी होगा और इन सब में हारेगा मधेश , कुछ लोमड़ियों को इन सब संघर्षो के फलस्वरूप कुर्सी , पद का लाभ मिलेगा लेकिन महज एक ग़ुलाम होंगे वे काठमांडू के सत्ता के समक्ष |




एक मधेशी युवा , राम मनोहर यादव का पुलिस हिरासत में मौत हुई हैं लेकिन आप को सांप सूंघ गया हैं | आप की आत्मा नहीं जाग रही , क्यों ? क्योंकि वह व्यक्ति आप के राजनीति से इतर बिचार रखता था ? तो क्या राजनैतिक मतभिन्नता रखने वालो के साथ का यह ब्यबहार सही हैं ? अगर ऐसा ही समाज का निर्माण करेंगे तो हो सकता हैं की यह फार्मूला आप पर भी लागु हो , सत्ता से कभी आप की मतभिनता हो जाए तो आप की भी हत्या हो सकती हैं और तब लोगों को राय बन सकता हैं कि भाई यह तो देश विरोधी था इस के साथ यही होना चाहिए | अभी भी सम्हलने का समय हैं , जब आदमी जग जाए तब ही सवेरा होता हैं | कम से कम आप को ईमानदार राजनीति करनी हैं तो सत्ता के गलियारे से बहार निकलिए, मधेश की मिटटी में खुद को उतारिए , लोग आप के साथ होंगे | अगर एक साथ सारे लोग नेपाली सत्ता को अस्वीकार करके सडको पर आएँगे तो बिना किसी खास क्षति के हम नेपाली सत्ता के रीढ़ को तोड़ सकते हैं , हो सकता हैं की आप संघीयता के पक्ष में रहे या हो सकता हैं की आप आज़ाद मधेश के परिकल्पना के साथ हो लेकिन दोनों ही सूरत में आप का सत्ता के गलियारों में भटकने का कोई तार्किक कारण नहीं हैं | एक सामूहिक त्यागपत्र समूचे तानाशाही , अमानुषी नेपाली तंत्र को हिला देगी और समूचे बिश्व को एक शसक्त सन्देश जाएगा | हाँ , यह सामूहिक त्यागपत्र गाँव से ले के केंद्र तक होना चाहिए | क्या आप अपने पर लगे कालिख को पोछने के लिए तैयार हैं या उस कालिख से ही आप को प्यार हैं ?

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सुजीतकुमार ठाकुर

 

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