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मिथिला और भोजपुरा के नामपर मधेसी सहीद को अपमानित करने की कोशिस : अजयकुमार झा

प्रदेश का नामाकरण और भाषा के विवाद में फ़सा इस दो नंबर प्रदेश को बड़ी ही गम्भीरता और शुक्ष्मता के साथ निर्णय लेने की आवश्यकता है।

जलेश्वर, १३ सितम्बर | प्रदेश दो भाषा और नामाकरण विवाद का सर्वमान्य समाधान प्रदेस नंबर दो के लिए राज्य का नामाकरण और भाषा का छनौट अपनेआप में एक जटिल कार्य होता जा रहा है। उसमे भी जब सबकुछ नया हो तो समस्या का पहाड़ खडा होना भी स्वाभाविक हो जाता है। नेपाल के सन्दर्भ में देखा जाय तो माओवादी जनयुद्ध और मधेसियों के जन-आन्दोलन में हुए सैकड़ों वलिदानी के फलस्वरूप संघीय लोकतांत्रिक गणतंत्र की स्थापना हुई। बिभिन्न उताड़-चढ़ाव,संधि-समझौता के तहत नेपाल को सात प्रदेस में बिभाजित किया गया। मधेसियो के साथ षडयंत्र को निरंतरता देते हुए 22 जिला से आठ जिला में मधेस राज्य को सिमित कर दिया गया। जो दो नंबर प्रदेस के नाम से जाना जाता है। नेपाल में एक यही वह प्रदेस है, जिसमे अहंकारी खसवाद के सत्ता को जड़ से उखाड़ फेका है। बांकी छह प्रदेशों में वाम गठबंधन की बोलबाला है। सुरु से ही मधेसी स्वायतता की बात करता आ रहा है।

अब,जब कि प्रादेशिक सरकार बन चुकी है। प्रदेस दो के लिए दूसरा चुनौती सामने आ खड़ा हुआ है। जिसका सीधा सम्बन्ध पहिचान से है। प्रदेश का नामाकरण और भाषा के विवाद में फ़सा इस दो नंबर प्रदेश को बड़ी ही गम्भीरता और शुक्ष्मता के साथ निर्णय लेने की आवश्यकता है। मधेस के लाखों लोगों की भावना को हृदयंगम करने के वाद जिस मोड़ पे मैं पहुंचा हूँ, उसे यहाँ अभिव्यक्त करना कर्तव्य ही नहीं अपना धर्म भी समझता हूँ। रेडियो, पत्र-पत्रिका, ब्रत- त्यौहार, भोज -भात, विवाह-व्रतबंध, मेला-उत्सव, गाव-सहर-बजार, इत्यादि के माध्यम से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष संवाद,बात-चित के कारण मैं इस नतीजे पे पहुंचा हूँ, कि प्रदेश नंबर दो के नामाकरण और भाषायी विवाद को सुलझाने तथा सर्वग्राह्य चिरस्थायी बनाने के लिए समझादारी और दायित्वावोध के साथ साथ पूर्ण लोकतांत्रिक बिधि को ही अपनाना पड़ेगा। इसके लिए निचे लिखे बिन्दुओ पर विशेष जोड़ देने की आवश्यकता होगी।

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1– पुरे प्रदेश में पूर्वाग्रह रहित, निष्पक्ष भाव से उन ग्रामीण नागरिको से संवाद करना होगा, जिन्हें राज्य और भाषा के महत्व और गरमा के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। यहाँ संवाद का मतलब उन्हें इन समस्याओं के भावी प्रभाव, खतरा और सहजता के बारे में खुलकर बताना है।  2– प्रदेश के सभी वार्ड में इन दोनों मुद्दों पर एक हप्ता तक खुला छलफल और भ्रम निवारण तथा ससम्मान सभी के विचारों तथा तर्क को इज्जत कर एक सामूहिक दृष्टिकोण पैदा करना होगा। 3-बिभिन्न भाषाओं के अभियानी लोगो को सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय के विशाल भाव को अपनाने के लिए प्रेरणा तथा दवाव देना होगा। 4-मधेस के विशाल भावना को कुचलते हुए 22 जिला से 8 जिला में सिमित करने बाले खस षडयंत्र के भावी दुश्चक्र से आम नागरिक को सचेत कराना होगा। 5नेपाल सरकार द्वारा हिंदी के विरोध तथा मैथली -भोजपुरी के समर्थन करने के पीछे छुपे भायानक षडयंत्र को खुद भी समझना होगा और लोगों को भी समझाना होगा। 6– याद रहे ! मैथली भाषा को नपुंसक बनाने में खस षडयंत्रकारी को कितना समय लगेगा ! और मैथली में ब्राह्मण और अन्य जाती के बिच संघर्ष कराना तो चुटकी का खेल होगा। 7-जिससे खस साशक डरते हैं, कही न कही, वही हमारे लिए लाभदायक है। वह जानता है की हम और नेपाली भाषा किसी भी सूरत में हिंदी का मुकाबला नहीं कर सकेंगे। इसीलिए हिंदी का घनघोर विरोध नेपाली भाषाई के द्वारा हो रहा है। 8-महाभारत पहाड़ के दक्षिणी भाग के सम्पूर्ण क्षेत्र (चूरे पहाड़ से भारतीय सीमा तक) के सभ्यता,संस्कृति,समुदाय,समाज और जन समुदाय को अपने में समेट सकने बाले भाव का सम्प्रेषण आम जन मानस में होना आवश्यक है। 9-मधेस को सिमित दायरों में समेटने का सोच ही खस नियोजित है। अतः इसे समझकर ही कदम उठाएँ। यहाँ कुछ अभियानी समूह बड़े गर्व से खस के बिचार का संवाहक बनकर सामूहिक आत्मघात को अपना गौरव समझ रहे हैं। 10– वास्तव में देखा जाय तो, अबतक का आन्दोलन न मिथिला, न भोजपुरा. न थारू के नामपर हुआ है। यह तो समग्र मधेस के नामपर हुआ है। मधेसी वीरों ने मधेस के नामपर वलिदानी दिया है। फिर मिथिला और भोजपुरा क्यों ? मुझे इन अभियानियों में प्रत्यक्ष खसों का हाथ दिखाई दे रहा है। और ए मिथिला और भोजपुरा के नामपर खस के दलाल लोग मधेसी सहीद को अपमानित कर रहे हैं। साथही मधेस के महान आन्दोलन के जड़ को ही सुखाने में लगे हैं। 11-भाषायी क्षुद्र षडयंत्र और नामाकरण हेतु देखे जा रहे है अदूरदर्शी विवाद के कारण बांकी के 15 जिलों में बाटे हमारे मधेसी भाई भी आज सर्मिंदगी महसूस कर रहे होंगे।आशा की तो बात ही दूर है। अतः हमें सर्वमान्य मधेसी सहिदों के विशाल भावनाओं का हार्दिक सम्मान करते हुए विशाल मधेस की परिकल्पना को पूरा करने का पुरजोर प्रयास किया जाय। षडयंत्रकारियों को मुहतोड़ जवाव दिया जाय। चाहे वो मधेसी ही क्यों न हो। 12- इस भाव को पुर्णतः मधेसी नागरिकों में संप्रेषित हो जाने के वाद, छलफल हो जाने के वाद, दिल खोल के संवाद हो जाने के वाद, बड़े सम्मान और उदारभाव से सावधानी पूर्वक प्रदेश के नामाकरण और भाषा के लिए जनमत संग्रह कराया जाय। ताकी वह निर्णय सर्वमान्य हो, सर्वग्राह्य हो, दीर्घकालीन हो।

नोट:- है तंत्र वही सर्वोत्तम जिसमे, सब की सहमति ली जाए। सबका आदर सबका ख्याल,प्रतिभा की इज्जत की जाए।। जबतक सबका सम्मान नहीं, तबतक उत्तम परिणाम नहीं।।।

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