Fri. Aug 7th, 2020

विश्व का उत्कृष्ट संविधान एक पक्ष का खून बहा तो दूसरे ने दीवाली मनाई : डा.श्वेता दीप्ति

विश्व का उत्कृष्ट संविधान एक ओर हर्ष तो दूसरी ओर विषाद | मधेशी नेता बहे हुए खून को भूल गए हों और राजनेताओं के लिए तो वह खून भी आयातीत ही था पर मधेश की जनता आज भी उस शहादत को नहीं भूल पाई है ।हाँ हाथ जरुर खाली है पर हौसला आज भी बुलन्द है ।

 

डा.श्वेता दीप्ति, काठमांडू, १९ सितम्बर, २०१८ | सार्वभौम संविधानसभा से जारी नेपाल का पहला संविधान आज तीसरा वर्ष पूरा कर रहा है । सरकार इसे धूमधाम से मना रही है । परन्तु नेपाली जनता के ७० वर्ष की लम्बी प्रतीक्षा के बाद जो संविधान जारी हुआ वह मसौदा के समय से ही विवादित रहा । और देश के एक पक्ष का खून बहा तो दूसरे ने दीवाली मनाई । आज भी मधेश की जनता इसके विरोध में खडी है हालाँकि आज उन्हें अपने नेताओं का साथ नहीं मिल रहा है । पर देखा जाय तो संविधान के विरोध में जब आन्दोलन हुआ था तब भी जनता स्वतःस्फूर्त रुप से सडक पर आई थी जो आन्दोलन बाद में नेताओं के हाथ में चली गई । मधेश की जनता तो उस वक्त भी ठगी गई और आज भी अपने दोयम स्थिति में हाशिए पर है । पर देखा जाय तो देश की वह जनता जिसने दिल खोलकर संविधान का स्वागत किया था वह भी यह देख रही है कि जनचाहना के अनुरूप संविधान सफल नहीं हुआ । जनता की आकांक्षा को यह संविधान तीन वर्ष पूरा करने के बाद भी संबोधित नहीं कर पाया है । वैसे तो जिस सरकार को बहुमत के साथ जनता लाई थी वह सरकार भी आज अपनी असफलताओं के साथ अपनी जनता के मोह को भंग कर रही है । संविधान का जारी होना और संघीयता के साथ ही महंगाई का आकाश छूना यह परिस्थिति जनता के मन को कहीं ना कहीं विचलित कर रही है । वैसे देखा जाय तो कर बढाने और मंहगाई के बढने में कहीं ना कहीं संघीयता के प्रति जनता को खिलाफ करने की भी मंशा हो सकती है ।

क्योंकि वर्तमान सरकार न तो पहले संघीयता के पक्षा में थी और न ही आज । जिसकी तसवीर हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं क्योंकि संघीयता के बाद भी जिस तरह केन्द्र अपने अंकुश को प्रदेश सरकार पर लगाए रखना चाहती है उससे स्पष्ट होता है कि बरसों से चली आ रही शासकीय व्यवस्था को भूलना इन्हें रास नहीं आ रहा है । खास कर प्रदेश नम्बर दो के लिए आज भी इनकी मानसिकता यही है कि संविधान संशोधन की माँग या अधिकार की माँग मधेश की अपनी माँग नहीं है बल्कि आयातीत है । सोच ज्यों की त्यों है कि मधेश में जो नागरिक हैं वो नेपाली नहीं बल्कि भारतीय हैं जिसे भारत ने भेजा है और जो नेपाल की नागरिकता को लेकर नेपाल पर कब्जा करना चाहता है । भारत अपनी विस्तारवादी सोच के तहत यह सब कर रहा है यह सोचने वाले आज भी अपनी सोच पर ही अडिग हैं । यही कारण है कि मधेश की हर माँग को नकारा जाता रहा है । पर आश्चर्य तो यह है कि नेपाल को भारत की अनदेखी विस्तारवादी स्पष्ट दिख रही है पर चीन की वह विस्तारवादी नीति नहीं दिख रही जो सारा विश्व देख रहा है । खैर यह वह राजनीति है जहाँ राजनेता अपना हित देख रहे हैं देश या देश की जनता का नहीं ।

यह भी पढें   काठमांडू उपत्यका में ६२ सहित देशभर २५९ नयां व्यक्ति में कोरोना संक्रमण पुष्टी

यही वजह है कि मधेश को आज भी उपनिवेश ही माना जा रहा है । यही वजह थी जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्र का निर्धारण नहीं करना क्योंकि इन्हें डर था कि संसद में इनकी उपस्थिति अधिक हो जाएगी और शक्ति ये किसी भी रुप में मधेश की जनता को देना नहीं चाहते । संघीयता का विरोध इसलिए करना कि यह भारतीय सोच है और भारत के दवाब में यहाँ संघीयता लागू किया जा रहा है सोचने वाले और कहने वाले आज भी बहुत हैं । परन्तु ऐन केन प्रकारेण संघीयता लागू हो ही गया । क्योंकि यह तो तय ही जब जनता जगती है तो भले ही खून क्यों ना बहे वक्त क्यों ना लगे परिवर्तन तो निश्चित है और यह तो नेपाल का इतिहास ही बताता है । ऐसे में मधेश की भावनाओं को भले ही कितना भी आयातीत क्यों ना कह कर दबाया जाय परिवर्तन निश्चित है । राख के ढेर में भी आग की गरमी रहती है जो एक हलकी सी हवा से सुलग जाती है । भारत को कटघरे में खडा रख कर मधेश की जनता के साथ चाहे जितनी भी दोहरी नीति अपनाई जाय पर जनता तो वहाँ की भी सचेत हो ही चुकी है । पर मधेश की नियति यह है कि उनके पास कोई कद्दावर नेता नहीं है जो स्वार्थ की राजनीति नहीं वहाँ की मिट्टी की राजनीति करे । कल तक मधेश के मसीहा कहे जाने वाले आज राष्ट्रीय नेता का सपना पाल कर मधेश और मधेशी शब्द को भूल रहा है । पर वो अपनी जमीन भूल कर जिस राजनीति को गले लगा रहे हैं उससे वो अपनी छवि तो धुमिल कर रही चुके हैं । हर मधेशी नेता परिवारवाद और अवसरवाद का पोषक है । जिस कमजोरी को सत्ता बहुत अच्छे से जानती है । बस कुछ टुकडे फेक देना और वश में कर लेना आज तक यही होता आया है । आज जहाँ संविधान दिवस मनाया जा रहा है मधेश की जनता आज के दिन को काला दिवस मना रही है । मधेशी नेता बहे हुए खून को भूल गए हों और राजनेताओं के लिए तो वह खून भी आयातीत ही था पर मधेश की जनता आज भी उस शहादत को नहीं भूल पाई है । हाँ हाथ जरुर खाली है पर हौसला आज भी बुलन्द है ।

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
%d bloggers like this: