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जिउतिया पर्व  विधि एवं कथा

 
आचार्य राधाकांत शास्त्री
आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी से नवमी तिथि तक जिउतिया पर्व मनाया जाता है। इस में अष्टमी के दिन व्रत का खास महत्व होता है इस दिन महिलाएं अपनी संतान की मंगलकामना और लंबी आयु के लिए निर्जला व्रत रखती है।
जिउतिया पर्व का शुभ मुहूर्त :-
 प्रातः नदी , तालाब या सरोवर में स्नान कर अपने मातृ कुल के मृत सास, आदि पूर्वजों का ध्यान कर उनके नाम मन्त्र से खरी तेल जल में प्रवाहित कर उनका आशीर्वाद लेकर घर आकर सबका ध्यान पूजन कर पवित्र भोजन करने का विधान है, पुनः सायं एवं रात्रि काल मे भी अपने मनोनुकूल पवित्र भोजन करें । पुनः
रात्रि शेष 3 से 4 बजे तक स्नान ध्यान कर सास सहित सभी मातृ पक्षीय पूर्वजों का आसन देकर  ध्यान पूजन कर दही चिउड़ा चीनी , झिंगुनी का शब्जी अपने कुल परंपरा के अनुसार भोग लगा कर प्रार्थना करें ,
पुनः स्वयं प्रसाद ग्रहण कर सबका आशीर्वाद लें,
जिउतिया व्रत नियम
इस व्रत को करते समय केवल सूर्योदय से पहले ही खाया पिया जाता है। सूर्योदय के बाद कुछ भी खाने-पीने की सख्त मनाही होती है।
इस व्रत से पहले केवल मीठा भोजन ही किया जाता है तीखा भोजन करना अच्छा नहीं होता।
जिउतिया व्रत में कुछ भी खाया या पिया नहीं जाता। इसलिए यह निर्जला व्रत होता है। व्रत का पारण अगले दिन प्रातःकाल किया जाता है प्रातः 4 से 5 बजे पितरों ( सास) की पूजा सिंदूर दिया जाएगा,  जिसके बाद शुद्ध भोजन कर व्रत का पारण किया जा सकता है
पूजा विधि :-
आश्विन माह की कृष्ण अष्टमी को प्रदोषकाल में महिलाएं बरियार के पौधे के पास पूजन अर्चन कर  जीमूतवाहन की पूजा करती है। माना जाता है जो महिलाएं जीमूतवाहन की पुरे श्रद्धा और विश्वास के साथ पूजा करती है उनके पुत्र को लंबी आयु व् सभी सुखो की प्राप्ति होती है। पूजन के लिए जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, चावल, पुष्प आदि अर्पित किया जाता है और फिर पूजा करती है। इसके साथ ही मिट्टी तथा गाय के गोबर से चील व सियारिन की प्रतिमा बनाई जाती है। जिसके माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाया जाता है।
पूजन समाप्त होने के बाद जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा सुनी जाती है। पुत्र की लंबी आयु, आरोग्य तथा कल्याण की कामना से स्त्रियां इस व्रत को करती है। कहते है जो महिलाएं पुरे विधि-विधान से निष्ठापूर्वक कथा सुनकर ब्राह्माण को दान-दक्षिणा देती है, उन्हें पुत्र सुख व उनकी समृद्धि प्राप्त होती है।
 जीवित्पुत्रिका व्रत कथा
जीवित्पुत्रिका-व्रत के साथ जीमूतवाहन की कथा जुड़ी है। गन्धर्वों के राजकुमार का नाम जीमूतवाहन था। वह बड़े उदार और परोपकारी थे। जीमूतवाहन के पिता ने वृद्धावस्था में वानप्रस्थ आश्रम में जाते समय इनको राजसिंहासन पर बैठाया, किन्तु इनका मन राज-पाट में नहीं लगता था। वह राज्य का भार अपने भाइयों पर छोड़कर स्वयं वन में पिता की सेवा करने चले गए, वहीं पर उनका मलयवती नामक राजकन्या से विवाह हो गया।
एक दिन जब वन में भ्रमण करते हुए जीमूतवाहन काफी आगे चले गए, तब उन्हें एक वृद्धा विलाप करते हुए दिखी। इनके पूछने पर वृद्धा ने रोते हुए बताया, ‘मैं नाग वंश की स्त्री हूं और मुझे एक ही पुत्र है। पक्षीराज गरुड़ के समक्ष नागों ने उन्हें प्रतिदिन भक्षण हेतु एक नाग सौंपने की प्रतिज्ञा की हुई है। आज मेरे पुत्र शंखचूड़ की बलि का दिन है।
जीमूतवाहन ने वृद्धा को आश्वस्त करते हुए कहा, ‘डरो मत, मैं तुम्हारे पुत्र के प्राणों की रक्षा करूंगा। आज उसके बजाय मैं स्वयं अपने आपको उसके लाल कपड़े में ढंककर वध्य-शिला पर लेटूंगा। इतना कहकर जीमूतवाहन ने शंखचूड़ के हाथ से लाल कपड़ा ले लिया और वे उसे लपेटकर गरुड़ को बलि देने के लिए चुनी गई वध्य-शिला पर लेट गए।
नियत समय पर गरुड़ आए और लाल कपड़े में ढंके जीमूतवाहन को पंजे में दबोचकर पहाड़ के शिखर पर जाकर बैठ गए। अपने चंगुल में गिरफ्तार प्राणी की आंख में आंसू और मुंह से आह निकलता न देखकर गरुड़जी बड़े आश्चर्य में पड़ गए। उन्होंने जीमूतवाहन से उनका परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने सारा किस्सा कह सुनाया। गरुड़ जी उनकी बहादुरी और दूसरे की प्राण-रक्षा करने में स्वयं का बलिदान देने की हिम्मत से बहुत प्रभावित हुए। प्रसन्न होकर गरुड़ जी ने उनको जीवन-दान दे दिया तथा नागों की बलि न लेने का वरदान भी दे दिया।
इस प्रकार जीमूतवाहन के अदम्य साहस से नाग-जाति की रक्षा हुई और तबसे पुत्र की सुरक्षा हेतु जीमूतवाहन की पूजा की प्रथा शुरू हो गई।
जीवित्पुत्रिका व्रत के प्रभाव से सबके सभी सन्तान सुरक्षित दीर्घायु, सद्विचारी, एवं सर्व गुण सम्पन्न बने, आचार्य राधाकान्त शास्त्री
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