Wed. Jul 15th, 2020

लक्ष्य का जीवन में बडा महत्व:रबिन्द्र झा

हम जिस किसी चीज को अपना लक्ष्य बना लेते है, हमारी जीवन रुपी गाडÞी उसी ओर दौडÞने लगती हैं। लक्ष्य वह धूरी है, जिसके चारों ओर हमारे जीवन की समस्त गतिविधियां घूमने लग जाती हैं। जैसे किसी व्यक्तिने धनार्जन को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है तो वह अपने कारोबार पर अपना पूरा ध्यान और समय देनेका प्रयास करेगा। यदि वह मन्दिर भी जाता है तब भी उसकी पर््रार्थना अपने करोबार को बढÞÞाने के लिए ही होगी। यदि वह अपने गुरु के पास जाता है, तब भी वह गुरु से यही आशर्ीवाद लेगा कि उसका कारोबार बढÞÞ जाए अर्थात वह गुरु और परमात्मा का साध्य के स्थान पर साधन के रुप में उपयोग करेगा। वह मन्दिर में भगवान से उनकी भक्ति माँगने की अपेक्षा कारोबार की बढÞÞोत्तरी के लिए याचना करेगा। उसके लिए भगवान से भी अधिक महत्वपर्ूण्ा और मूल्यवान बस्तु है- धन एवं कारोबार। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति ने परमात्मा की प्राप्ति को अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लिया है तो वह सब चीचों को साधन के रुप में उपयोग में लाने का प्रयास करेगा अर्थात् धन, परिवार, संसार, शरीर आदि सभी को साधन बनाकर परमात्मा को प्राप्त करने की चेष्टा करेगा।

सन्त-महात्मा कहते हैं कि धार्मिक व्यक्ति वह नहीं है, जो रोज मन्दिर जाता है, जो रोज नमाज पढÞÞता या गुरुद्वारा में शीश नवाता है। धार्मिक व्यक्ति वह भी नहीं है, जो धार्मिक और आध्यात्मिक पुस्तक, ग्रन्थ आदि का पठन-पाठन करता है। धार्मिक उस व्यक्ति को भी नहीं कहा जा सकता, जो आत्मिक कार्यों में व्यस्त रहता है, अथवार् इश्वर तत्त्व पर प्रवचन देता है। इन सब क्रियाओं का उद्देश्य धन कमाना भी हो सकता है। कुछ लोग जीविकोपार्जन हेतु प्रवचन देने का कार्य करते हैं, ऐसे ही कुछ लोग पैसा कमाने के लिए धार्मिक कर्मकाण्डÞ आदि का कार्य करते हैं। कुछ लोग धन की आशा लेकर मन्दिर जाते हैं तो कुछ लोग विपत्तियों से मुक्ति पानेहेतु धार्मिक स्थलों की यात्रा करते है। इन धार्मिक क्रिया-कलापों का एक ही उद्देश्य होता है- कामना पर्ूर्ति। अतः ऐसे लोगों को पर्ूण्ात् धार्मिक नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः धार्मिक व्यक्ति तो वह है, जिसके अन्तस्करण में अहनिर्शर् इश्वर की स्मृति रहती है और जिस के जीवन का प्रधान लक्ष्य केवलर् इश्वर की प्राप्ति ही होती है।
महापुरुषों का कथन है कि भगवान की स्मृति केवल उसे रहती है, जो भगवान को अपना समझता है। प्रकृति का नियम है कि जिसे हम अपना समझते हैं, उसे हम कभी नहीं भूलते। हम उस वस्तु या व्यक्तियों को भूलते हैं, जिसे हम अपना नहीं समझते। जैसे कोई व्यक्ति अपने-अपने माता-पिता, भाइ-बहन, पति-पत्नी आदि परिजनों को नहीं भूलता तो इस का कारण यही होता है कि वह इन को अपना मानता है। इन का स्मरण करने के लिए प्रथकसे कोई उपाय नहीं करना पडÞता। भगवान की स्मृति हमें इसलिए नहीं होती, क्योंकि हम उसे अपना नहीं मानते। हम संसार की वस्तुओं को तो अपना मानते है, लेकिन भगवान को नहीं। गुरुवाणी कहती है- सब कुछ अपना इक रोम पराया। परायी बस्तुकी याद नहीं आती, उसे याद करना पडÞता है। हमने भगवान को पराया मान रखा है और उसकी वस्तुओं को अपना मान रखा है। कैसी विचित्र बात है कि हमने सब कुछ देनेवाले को तथा अपने मूल को तो पराया और जडÞ एवं नश्वर वस्तुओं को अपना समझ लिया है जिनका हमारे साथ स्थायी और नित्यता का सम्बन्ध नहीं है। सन्त मनीषी कहते हैं कि संसार की सब वस्तुएँ एवं हमारे नाते रिश्तेदार सब अनित्य है, क्षणभंगुर है। नश्वर है। इसलिए वे कभी हमारे बन नहीं सकते। हम रोज देखते हैं कि संसार की सब वस्तुएँ एक एक नष्ट हो रही हैं और हमारे नाते रिश्तेदार भी हमको छोडÞकर जा रहे हैं। फिर भी उन बस्तुओं एवं परिजनों के प्रति हमारी मोह-ममता भंग नहीं होती। केवल परमात्मा ही नित्य है, शाश्वत है, सनातन है, इसलिए वे ही हमारे अपने हो सकते हैं। स्वामी श्री रामकृष्ण देव जी का कथन है किर् इश्वर नित्य है, शेष सब अनित्यर्,र् इश्वर सत्य है, बाँकी सभी असत्य।
दूसरी ओर्रर् इश्वर सागर के समान शाश्वत बना रहता है। जब हमारे समक्ष सागर से संयुक्त होने की सम्भावना है तो फिर स्वयं को एक लोटे के साथ आशक्त होने का भला क्या औचित्य है –

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