मकर संक्रांति- इस बार १४ को नही १५ को मनाई जाएगी मकरसंक्रांति : आचार्य राधाकान्त शास्त्री
आचार्य राधाकान्त शास्त्री | आमतौर पर यह 14 तारीख को मनाई जाती रही है। इस त्योहार यानी मकर संक्रांति का सीधा संबंध हमारे ग्रह यानी पृथ्वी के भूगोल और सूर्य की स्थिति से जुड़ा है। इसी दिन, सूर्य उत्तरायण होकर मकर रेखा पर आता है। इसीलिए मकर संक्रांति का त्योहार इसी दिन मनाया जाता है। मकर संक्रांति के आसपास ही कुछ दिनों पर देशभर में अलग-अलग नाम और परंपराओं के हिसाब से त्योहार मनाए जाते हैं।मकर संक्रांति 15 जनवरी 2019
1) ज्योतिष के दृष्टिकोण से
ज्योतिष के नजरिए से देखें तो भी मकर संक्रांति बहुत अहम त्योहार है। इसका धर्मग्रंथों में भी उल्लेख हुआ है। मकर संक्रांति ही वो दिन होता है जब सूर्य धनु राशि छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करता है। और इसी के साथ उसकी उत्तरायण होने की गति आरंभ होती है। यह शुभ काल माना जाता है। माना जाता है कि इस दिन सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन को सुख और समृद्धि का दिन भी माना जाता है। इस दिन से वसंत ऋतु की शुरुआत भी हो जाती है। इसीलिए मकर संक्रांति को सुख-समृद्धि का अवसर और प्रतीक मना जाता है।
2) संस्कृति के अनुसार
भारत में सांस्कृतिक विविधताओं के लिहाज से भी मकर संक्रांति का अपना महत्व है। देश के ज्यादातर हिस्सों में यह त्योहार मनाया जाता है। हालांकि, नाम और प्रचलित परंपराएं अलग-अलग हैं। जैसे, देश के दक्षिणी राज्यों केरल, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में इसे सिर्फ संक्रांति ही कहा जाता है। तमिलनाडु की बात करें तो वहां ये त्योहार चार दिन चलता है और वहां इसे पोंगल कहा जाता है। पंजाब और हरियाणा में इसे लोहड़ी कहा जाता है। असम में बिहू वही है जो हमारे यहां यानी उत्तर भारत में मकर संक्रांति है।
3) खान-पान और दान भी विशेष
मकर संक्रांति को तिल का उबटन लगाने के बाद स्नान की धार्मिक मान्यता है। पवित्र नदियों में , संगम में स्नान का विशेष महत्व है । स्नान के लिए लोग जुटते हैं और वहां मेले भी लगते हैं। इस दिन दही चुड़ा या चावल की खिचड़ी बनाई जाती है और इसे घी और गुड़ के साथ सपरिवार खाया जाता है। तिल और गुड़ के बने लड्डू या गजक भी बड़े चाव से खाए और खिलाए जाते हैं। गाय, चावल, ऊनी वस्त्र , वर्तन, तिल, गुड़, खिचड़ी, कंबल और छाता दान किए जाने का विशेष महत्व और मान्यता है। महिलाएं सुहाग से जुड़ी वस्तुएं भी दान करती हैं।
4) सूर्य की प्रसन्नता
स्नान और दान करने का महत्व ये माना गया है कि इससे सूर्य नारायण प्रसन्न होते हैं और जीवन में सफलता और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त करते हैं। तिल के उबटन से स्नान के बाद सूर्य देवता को जल चढ़ाया जाता है और उनकी आराधना की जाती है। इसके बाद दान किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन ही सूर्य अपने पुत्र शनिदेव से नाराजगी त्यागकर उनके घर गए थे इसलिए इस दिन को सुख और समृद्धि का दिन भी माना जाता है।
5) वसंत ऋतु का आरंभ
मकर संक्रांति के बाद कड़ाके की सर्दी का दौर खत्म होने लगता है और धूप तेज हो जाती है। ऐसा सूर्य के उत्तरायण होने की वजह से होता है। दिन बड़े और रातें छोटी होने लगती है। कुल मिलाकर वसंत ऋतु का आगमन होता है और मौसम खुशहाल हो जाता है। वसंत ऋतु के आगमन को लेकर काफी साहित्यिक रचनाएं भी की गई हैं। देश के ज्यादातर हिस्सों में फसलें पकने लगती हैं। पोंगल और लोहड़ी इसी का प्रतीक हैं। यानी यह अन्नदाता के लिए आर्थिक दृष्टि से आशानुकूल समय होता है। कहा जाता है कि महाभारत में भीष्म पितामह ने मकर संक्रांति के दिन ही प्राण त्यागे थे, जिससे इस दिन से मोक्ष दायिनी अयन आरम्भ हो जाता है।
कुल मिला कर मकरसंक्रांति के दिन से सभी देवता देवी, ग्रह नक्षत्र एवं प्रकृति अपनी अनुकूलता सभी प्रजा के साथ सबको आनंदित जीवन प्रदान करते हैं,


