भावनाओं में बुना एक दर्द जो सालता है धीरे-धीरे मुझे : राजन
*अनाम रिश्ते*
राजकुमार जैन राजन
भावनाओं में बुना
एक दर्द
जो सालता है
धीरे-धीरे मुझे
वक्त, उम्र और सम्वेदनाओं
के द्वार पर
दूरियों को पार कर यह मन
तुम तक पहुंच ही जाता था
बार बार
खुशी मिलने, सपने बुनने
आत्मीय अहसासों के
बनते बादलों
और सम्बल बनने के वादों को
फलते- फूलते देखने के भरम में
सच समझ
कुलाचें भरता रहा मन
मृग- मरीचिका-सा
ख़ुशियों का ताना -बाना बुनते
यौवन के कंधे चढ़ आया
मन के किसी कौने में छिपा प्यार
मुझे शापित कर गया
खुशियों को ढहा दिया
रेत महल की तरह
सच ही तो कहा था
उस महापुरुष ने-
जीवन के रेगिस्तान में
भटकते-भटकते
मिट जाओगे
कस्तूरी पाने के भरम में
यह जीवन
ये अनाम रिश्ते भी तो
नदी के दो किनारे हैं
जो साथ- साथ चलते हैं
बंधे हुए हैं
अपने -अपने गुरुत्वाकर्षण से
फिर भी दोनों के बीच
खालीपन है
धरती और आकाश के मिलन की तरह
जो दिखते तो हैं, पर
कभी मिलते नहीं !.
● राजकुमार जैन राजन


