अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा, मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है : मुनव्वर राणा
तुम मुझे ख़्वाब में आ कर न परेशान करो ।
अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है
लगता है जैसे रेल से कटने लगा हूँ मैं
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है ।
तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना ।
ऐ ख़ाक-ए-वतन तुझ से मैं शर्मिंदा बहुत हूँ
महँगाई के मौसम में ये त्यौहार पड़ा है ।
कुछ उस ने भी बालों को खुला छोड़ दिया था ।
ये आईना हमें बूढ़ा नहीं बताता है ।
किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा ।
कहीं चलने की ज़िद करना मिरा तय्यार हो जाना ।
मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई ।
तुम्हारा शहर से जाना मिरा बीमार हो जाना ।
तुझे ऐ मुफ़्लिसी कोई बहाना ढूँड लेना है ।
ये बच्चे की तमन्ना है ये समझौता नहीं करती ।
आ के बरसात तिरे सामने तौबा कर ले ।
लड़कियाँ धान के पौदों की तरह होती हैं ।
मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है ।
माँ दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है ।
रात चुपके से कहा आ के हवा ने हम से ।
तिरी यादों की इक नन्ही सी चिंगारी बचाने में ।
फिर तो अब क़ैस को जंगल से निकल आने दो ।


