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वैदिक धर्मनिष्ठ संस्कृत के विद्वान् शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन : प्रियंवदा काप्ले

हिमालिनी, अंक जनवरी 2019 | इस जगत् मे सभी लोग एक ही स्वभाव के नही होते हैं । ‘स्वभावो मूध्र्नि वर्तते’इस कथन के अनुसार भी अपने अपने स्वभावों से प्राणियों मे विविधता दिखाई देती है । लोगों का भी भिन्न–भिन्न पहचान और अभिरूचि होती है । ऐसी  भिन्नताओं मे से इस लेख मे भारतवर्ष में और संस्कृत जगत् में सुप्रसिद्ध नेपाल के मूर्धन्य विद्वान् शिवराज आचार्य कौण्डिन्नयायन का आचार, संस्कार और विविध कर्मों की चर्चा की जाती है । उनके विद्याध्ययन के विशिष्ट गुण और योग्यता के कारण उन से वेदवेदाङ्ग, वेदोेपाङ्ग, स्मृतिपुराण इत्यादि के अनुशीलन से वैदिक धर्म और संस्कृतभाषा के प्रचार के निमित्त विविध प्रकार की पुस्तकें रची गई और प्रकाशित की गई हैं । इस के अतिरिक्त उन्होंने नेपाली भाषा की जीवन्तता निमित्र्तजिम्दो नेपालि भासा’ नामक आन्दोलन चलाया, संस्कृतशिक्षा की संस्थागत विकास के लिए पुस्तकालयों, विद्यालयों की स्थापना और प्रवद्र्धन में बड़ा योगदान दे चुके हैं ।

वे स्वयं को ‘वेदवेदाङ्गोपाङ्गस्मृतिपुराणादिशास्त्रवशंवद’, ऐसा मानने वाले हैं, नेपाली भाषा के आदिकवि भानुभक्त आचार्य जैसे सुप्रसिद्ध व्यक्तित्वों का वंशपुरुष श्रीकृष्ण आचार्य के वंश में जन्मा देवदत्त शर्मा के प्रपौत्र, लोकनाथ शर्मा के पौत्र, नरनाथ शर्मा और गंगामाया पद्मा देवी के पुत्र, बुद्धिसागर शर्मादि गुरुओं का शिष्य, हिमवत्खण्ड अन्तर्गत गण्डकी प्रदेश के मध्यवर्ती स्थल त्रितुङ्गाचल (तनहूँ) जिला अन्तर्गत चुँदिताम्रकूट ग्राम (अभीभानु नगरपालिका, वडा नं. ४) निवासी माध्यन्दिनीय–वाजसनेयीयों का पारस्कर सूत्रोक्त विधि अनुसार के पद्धति के अनुशरणकर्ता शिवराज आचार्य कौण्डिन्नयायन भारतवर्ष में और संस्कृतक्षेत्र मे सुविख्यात मूर्धन्य विद्वान् हुए । ऐसे व्यक्तित्व का जन्म ५००६ कलिसंवत्सर में मधुशुक्लषष्ठी तिथि में (वि.सं.१९९७।१०।२०।१)तनहूँ जिला अन्तर्गत बन्दीपुर नामक गाँव मे हुआ  था ।
शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन का अक्षरारम्भ पाँच वर्ष की उम्र मे हुआ । उस के वाद उन्होंने अपने पिताजी के साथ में रहते हुए पञ्चायन देवता पूजापद्धति, सप्तशती दुर्गाकवच इत्यादि पुस्तकें बाल्यकाल में ही पढ़ लिये । गाँवके भाषा पाठशाला में पण्डित रुद्र शंकर जी से और पिताजी से दुर्गा शप्तशती (चण्डी) का बाँकी अंश, रुद्राष्टाध्यायी, माध्यन्दिनीयवाजसनेयी शुक्लयजुर्वेदसंहिता, अमरकोश, लघु सिद्धान्त कौमुदी इत्यादि ग्रन्थे भी पढ् चुके थे  । औपचारिक रूप में वि.सं.२०१२ साल में काठमांडू में आए और प्रथम–परीक्षा दिए । उन्होंने शाङ्कर वेदान्ताचार्य परीक्षा (महेन्द्र विद्याभूषण), संस्कृत एमए परीक्षा (उपकुलपतिपदक), साहित्याचार्यपरीक्षा (कुलपतिपदक), दर्शन एमए परीक्षा (महेन्द्र विद्याभूषण), आयुर्वेद शास्त्री परीक्षा (प्रथम श्रेणी में सर्वप्रथम सहित रजतपदक), अङग्रेजी विषय में भी विशिष्ट शास्त्री परीक्षा समेत उत्तीर्ण किया था ।
उन्होंने वैदिकयज्ञा औपनिषदात्मज्ञानञ्च जैसे विषय में विद्यावारिधि (पीएच्डी), वेदाङ्ग शिक्षा शास्त्रस्यरचनात्मकं समीक्षात्मकञ्चपरिशीलनम्’ जैसे विषय में विद्यावाचस्पति (डी.लिट्.)उपाधि हासिल की थी  । इस के अतिरिक्त  अनौपचारिक रूप में वेद, वेदाङ्ग, वेदोपाङ्ग, स्मृतिपुराणा दिशास्त्रों का गंभीर अध्ययन करके अपने ज्ञानभण्डार का अभिवृद्धि किया । काठमांडू के बडेÞ पण्डित बुद्धिसागर पराजुली से शास्त्रीय अध्यायोपाकर्म विधिअनुसार स्वशाखावेदमन्त्रसंहिता–ब्राह्मणग्रन्थ–श्रौतसूत्र–गृह्यसूत्रादि ग्रन्थों का गुरुमुखोच्चारण और अनूच्चारणपूर्वक अध्ययन किया था  । इसी प्रकार अपने पाँचों पुत्रों को भी स्वशाखावेदमन्त्रसंहितादि का अध्यापन कराकर स्वाध्ययन में प्रवृत्त कराया ।
उन्होंने स्वाध्यायध्ययन से अर्जित वेद, वेदाङ्ग, वेदोपाङ्ग, स्मृतिपुराणादिशास्त्रों के ज्ञान का प्रकाशन, प्रचार के लिए बहुत ही पुस्तकों की रचना की । उनहोंने संस्कृतभाषा में, नेपाली और हिन्दी भाषा मे भी प्रशस्त ग्रन्थों की रचना की है । संस्कृत मे आचार्य कौण्डिन्न्यायनकृतः हैमवत्यासंस्कृतव्याख्यासहितः काव्यप्रकाशः (सन् १९८०) नाम का ग्रन्थ प्रकाशित है । इस ग्रन्थ की रचना के प्रसङ्ग में उनका विचार है ः–
(काश्मीरकैर् वाङ्गकैश्च मैथिलैः काशिकैरपि । दाक्षिणत्यैर् मद्ध्यदेश्यैर्विद्वद्भिर् विविधैरपि ।।
मीमांसकैस् तार्किकैश्च यतिभिर् धर्मशास्त्रिभिः । काव्यप्प्रकाशो व्यक्ख्यातो नैव नैपालकेन तु ।।
इति मे कौतुकमभूत्व्याक्ख्यानेऽत्र प्प्रवर्तितुम् । तदिदङ् कौतुकञ्चाद्द्योपशान्तिमगमन् मम ।।)
(८०–८२, काव्यप्रकाशः, १९८० ः ५१३) ।
अर्थात् –
काश्मीरी है  बंगाली है, मैथिली, काशी के सभी । दक्षिणी, मद्ध्यदेशीया और भी विद्वान् जुटे रहे ।।
मीमांसका,  तार्कीका थे सन्यासी, धर्मशास्त्री ने । काव्यप्रकाशकी व्याख्या किया,  नहीं नेपाली ने ।।
ऐसी  कौतुहलता से व्याक्ख्यार्थ अग्रता लिया । व्याख्या सम्पन्न होते ही मन में शान्ति छा गया ।।
इसी प्रकार उन के अन्य ग्रन्थों मे कतिपय–नैपाल–संस्कृतग्रन्थकार परिचयः (२०४८), कौण्डिन्न्यायनशिक्षा (२०४९), ब्रह्ममीमांसासूत्रम् (२००२क्रै.), वेदभाषानिघण्टु (२०५०), वैदिकमन्त्रसङ्ग्रह (२०५२), प्रायश्चित्तव्यवस्था (२०४९), सन्ध्योपासनपद्धतिः (२०५६), ब्रह्मयज्ञपद्धतिः (२०५९), एकोद्दिष्टश्राद्धपद्धतिः (२०५८), गरुडपुराणम् (प्रेतकल्पात्मकम्, २००४क्रै.) व्यावहारिकम् संस्कृतम् (प्रथमम् पुस्तकम्, २०५०), ( द्वितीयम् पुस्तकम्, २०५३), (तृतीयम् पुस्तकम्, २०५८), पाणिनीय शिक्षा (१९९८क्रै.), नारदीय शिक्षा (२००२क्रै.), वेदाङ्गज्योतिषकौण्डिन्न्यायनव्याख्यानम् (२००५क्रै.) इत्यादिरचित, सम्पादित और व्याख्यायित है ।
उन्होंने नेपाली भाषा मे भी विविध विषय सम्बद्ध ग्रन्थों की रचना प्रकाशित की है । उन ग्रन्थों में वृत्तनक्षत्रमाला(२०२८), जिम्दो नेपालि भासा (पैलो खण्ड, २०३०), जिम्दो नेपालि भासा (दोस्स्रो खण्ड – २०३७),नेपाली वर्णोच्चारण शिक्षा (२०३१), वैदिकधर्म मूलरूपमा (प्रथम संस्करण, २०४५, और परिमार्जित द्वितीयसंस्करण, २०६२) इत्यादि हैं । वैदिकधर्म मूलरूपमानाम की बृहदाकार किताब समग्र वेद वेदाङ् गोपाङ्गादि–शास्त्रके आधार में वैदिकधर्म–संस्कारकर्मों का परिचय प्रस्तुत किया है । वैसे ही धर्म–संस्कृति–दर्शन–शिक्षा–साहित्य–भाषा–व्याकरण–वेदवेदाङ्ग  इत्यादि विषयों का १४० से ज्यादा लघु आकार का निबन्ध भी प्रकाशित है ।
इसी तरह उन्होंने वेदाङ्गज्योतिषम् नामक कृति हिन्दी भाषा में भी अनुवाद करके भारतवर्षीय ज्योतिष के ज्वलन्त प्रश्न और वेदाङ्गज्योतिष (२००८क्रै.), गरुड पुराड प्रेतकल्प के अनुवाद, मनस्मृति (हिन्दी अनुवाद),  नारदीय शिक्षा (हिन्दी व्याख्या), पाणिनीय शिक्षा (हिन्दी व्याख्या)  इत्यादि ग्रन्थ प्रकाशन किया हैं । वेदाङ्गज्योतिषम् में वैदिकधर्म कार्य में आवश्यक संवत्सर, अयन, ऋतु, महीना, पक्ष, तिथि इत्यादि व्यवस्थाओं के विषय में अत्यन्त अच्छी तरह प्रकाश डाला है । आप सूर्यसिद्धान्त के अनुसार लोकप्रचलित पञ्चाङ्गपत्र (पत्रा) की अप्रामाणिकता को स्पष्टकर लगधमुनिप्रोक्तवेदाङ्गज्योतिष के आधार में सौर्यचान्द्रमान को अनुसरण करके बनाया गया वैदिकतिथिपत्र का प्रकाशन भी ( वि.सं.२०६७ से)प्रारभ्म कर चुके थे । जो अभी  प्रकाशित हो रहा है ।


शिवराज आचार्य कौण्डिन्नयायन अध्यापन, लेखन, धर्मप्रचार, सामाजिक उत्थान, शिक्षण संस्थाओं की स्थापना, पुस्तकालय सञ्चालन इत्यादि विविधकर्म में संलग्न थे । उन्होंने वि.सं.२०२४साल से २०६६ साल तक त्रिभुवन विश्वद्यिालय संस्कृताध्ययन संस्थान में, महेन्द्र–संस्कृत–विश्वविद्यालय (नेपाल–संस्कृत–विश्वविद्यालय) का वाल्मीकि विद्यापीठ में अद्वैत–वेदान्त विषय का अध्यापन किया । उन्होंने तनहूँ–चूँदीरम्घा गाँव में भानु–संस्कृत–माध्यमिक विद्यालय, भानु–पुस्तकालय और महर्षि–वेदव्यास–संस्कृत–माध्यमिक विद्यालय जैसी संस्थाओं की स्थापना की और सञ्चाालन कार्य मेंं सशक्त रूप में संलग्न रहे । उन्होंने नेपाल–संस्कृत–परिषद्, विद्वत्सभा (वि.सं.२०४० से २०४७ पर्यन्त) का संगठन और सञ्चालन भी किया थे । और भी कई संस्थाओं से आबद्ध रहे ।
उन्होंने बाल्यकाल से ही विविध विषय में, वैदिकधर्म, संस्कृतशिक्षा, सामाजिक–राजनीतिक कार्य, विद्याध्ययन इत्यादि में संलग्न हो कर बहुत कर्म किया था । आपके कुछ विचार और उपदेश इस प्रकार हैं,
 वेद–वेदाङ्ग– वेदोपाङ्ग–स्मृतिपुराणादिशास्त्रों का सभी लोगों को अनुशासनपरायण होना चाहिए, शास्त्रों का महत्त्वबोध करना चाहिए ।
 शास्त्रों का अनादर करने से कोई  परशुराम जैसा नही बन पाया हैं, सभी का पतन हो जाता है ।
 शास्त्र का अनुशासनरहित होने से धर्मभाव होने पर जो भी कर्म करे वो भी पापकर्म ही होता है ।
 वेदादिशास्त्र के वचनों को अनुशीलन अनपाश्रित्य जीवों से भी स्वतन्त्र हो कर ब्राह्मण को करना पड़ेगा ।
 अब तो ब्राह्मणत्व का,  हँसी के कारण से लोक को  ठगने का काम भी प्रचलित हो रहा है ।
 अब तोे, स्वतन्त्र ब्राह्मणों का शास्त्राध्ययन परम्परा भी अतिक्षीण होता जा रहा है जिसका सुदृढीकरण करना चाहिए ।
 संस्कृत शिक्षा का सर्वतोमुखत्वसिद्धि में नीतिशास्त्र विषय को भी समावेश करना चाहिए । इस विषय को सभी ओर पठनपाठन सञ्चालन करना चाहिए, इससे ही  संस्कृतशिक्षा का सर्वजनोपयोगित्व सिद्ध हो सकता है।
 हमारी धर्मनीति–सामाजिकनीति–अर्थनीति–शिक्षानीति इत्यादि विषय परम्परानुसार चलने के कारण      समाज में सङ्कट की स्थिति दिख रही है । अतः आत्मोद्धार स्वयं को करना होगा ।
उन्होंने मदीया संसकृतशिक्षणपद्धतिःइस शीर्षक में चुँदीरम्घानाम की पत्रिका में  प्रकाशित संस्कृतपद्य पर संस्कृतशिक्षण का स्वरूप और उद्देश्यं स्पष्टरूप से कहा है ः –
न्याय््यांवृत्तिं वा तपस्यामुपेत्य आपद्धर्मंचाऽवलम्ब्य क्वचिच् च ।
स्वे धर्मेह्यारमतामार्ययूनां सिद्ध्यै वृद्ध्यैचाऽऽदृतोऽस्त्येष यत्नः ।।
अर्थात् –…न्याय्यवृत्ति वा तपस्या व कर्मों को उपासना करके, किसी को आपद्धर्म का भी पालना करके अपने धर्म में ही प्रयत्न से खुश होकर रहने पर ही बृद्ध और सिद्ध द्वारा आदर किये जाते हैँ ।
उन्होंने कहा कि आस्तिक जन को इस सिद्धान्त का अनुसरण करना चाहिए । ऐसा उनका जीवनदर्शन का सार भाव भी है समझना आवश्यक हो गया है । इस प्रकार के वैदिक सनातन धर्म का मूर्तिमान् मूर्धन्य महामनीषी शिवराज आचार्य कौण्डिन्न्यायन का वि.सं.२०७४साल भाद्रशुक्लदशमी तिथि में ७७ वर्ष के उम्र में पशुपतिक्षेत्र स्थित आर्यघाट का ब्रह्मनाल मे ंअपनी पञ्चभौतिक शरीर का सविग्रह विसर्जन हुआ । भारतवर्ष मे संस्कृत जगत् में सुविख्यात बड़े विद्वान् कौण्डिन्नयायन की अनुपस्थिति राष्ट्र में और अन्तरराष्ट्रीय जगत् में भी अपूरणीय क्षति है ।

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