महिला बनाम दूसरा दर्जा
व्यग्ंय………..बिम्मी शर्मा
महिलाएं खुदको दूसरे दर्जे का नागरिक मानती है और सारी सहुलियत और फायदा पहले दर्जे का लेती है। किसी ने अपने शान में थोडा कम कसीदा पढ दिया तो पुरुष द्धारा खुद को या अपनी जाति काे भी महिलाएँ कम आंकने और महत्व न देने की बात को रोनी सी सुरत बना कर कहती है भई हम तो दूसरे दर्जे के नागरिक है । हम लोगो को कोई भाव देता ही नहीं । और कोई साग, भाजी है जो उसे भाव दे कर खरीदा या बेचा जाए ? मान,सम्मान और ईज्जत खुद के बनाने और कमाने से मिलता है । हरजगह सहुलियत खोजना और औरत होने का फायदा भरपूर उठाने में कोई भी औरत मौका नहीं छोडती । फिर चाहे आंसू या मुस्कान का हथियार ही दूसराें पर क्यों न फेकंना पडे । कमा कर लाता है पति पर पति कि कमाई पर ऐश औरत करती है । पति जमीन, जायदाद खरीदे या घर बनाए । उन सभी प्रोपर्टी पर पत्नी का अधिकार होता है और वह सारी सपंति पति बेचारे का खुद कि कमाई का होने पर भी पत्नी के नाम से खरीदा जाता है । जब कभी अपने भाईयों से संपति मे अंश या भाग बंडे की बात आती है तब पति विवादों से बचने के लिए वह सारी सपंति शादी में दहेज में मिलने की बात अदालत में पत्नी के मायके वालों का सिर गर्व से उंचा कर देता है । भले ही पत्नी के मायके वाले भिखमगें हो और शादी में फुटी कौडी भी दहेज में न दिया हो । पर अपनी कमाई हुई सपंति को भाई या पटिदरों से बचाने के लिए पति दिन दहाडे सफेद झूठ बोल कर पत्नी को पहले दर्जे की बना देता है । तब भी पत्नी या महिला वक्त बेवक्त ख््द के दुसरे दर्जे का होने का द््खडा रोती रहती है । किसी भीडभाड वाली जगह पर जाने पर महिलाओं काे पुरुष खुद ही रास्ता या जगह दे देते है । ईन्हे बिजली, पानी या टेलिफोन का बिल जमा करने के लिए ज्यादातर लाईन भी नहीं लगना पडता है । अस्पताल में भी इन्हे महिला होनें के नाते सभी सुविधाएं और सहुलियत पुरुषों से पहले मुहैया कराई जाती है । और अगर किसी औरत की गोदी में छोटा सा बच्चा भी हो तो सारी सहानुभूति और सुविधा उस और औरत को बडे आराम से मिल जाती है । फिर भी सुरसा की मुहँ की तरह औरत का मुहं भी जितनी ज्यादा सुविधा या केयर मिलती है उतना ही ज्यादा फैलता जाता है । औरत के पास कम योग्यता हो या वह बिल्कूल भी पढीलिखी न हो फिर भी पति नाम और योग्यता के कारण सारी सुविधाएं और सम्मान आराम से ले कर डकार जाती हैं । डाक्टर की बीबी बिना पढे लिखे ही डाक्टरनी हो जाती है । उसी तरह मास्टरकी बीबी मास्टरनी, पायलट की बीबी पायलटनी, प्रोफेसरकी बीबी प्रोफेसरनी, पंडित की बीबी पंडिताईन, चोर की बीबी चोरनी, धोबी की धोबन बन कर खूब धाक जमाती है । फिर भी इन औरतों को लगता है कि हाय दैया पुरुषों ने हम लोगों को आगे बढने नहींदिया और हमें दूसरे दर्जे की नागरिक होने और कहलाने पर मजवुर किया । हम चांद पर पहुंच कर उसी चांद को गले का हार बना कर पहना चाती थी पर ईन्ही पुरुष जाति ने हमारे पैर में बेडियां बांध कर हमे आगे बढ्ने नहीं दिया । हमारी किस्मत खोटी नहीं यह पुरुष जाति ही खोटा है । ज्यादातर महिलाएं बिना योग्यता और बिना कुछ किए धरे ही वह सब कुछ पाना चाहती है जो एक पुरुष अपनी योग्यता, सघंर्ष और एडी, चोटी का जोर लगा कर हासिल करता है । हासिल सब करना है परबिना मेहनत और योग्यता के सिर्फ आंसू और मुस्कान का फार्मूला प्रयोग कर के । ईसी लिए तो समानुपातिक कोटा में ज्यादातर उन औरतों का जलवा हैं जो बिना सहारा या पति के नाम या सहयोग के बिना एक कदम आगे बढ नहीं सहती । और यही औरतें ससंद से बाहर आने पर हाय तौबा मचाते हुए कहती है कि मर्द ने या मर्द कि बनाए हुए नियम, कानून और समाज नें हमें आगे नहीं बढने दिया और हमें दूसरे दर्जे की नागरिक बना कर घर में बंदी बना के रख दिया । ह्वा और पानी को आज तक कोई रोक सका है क्या ? खुद हवा बन कर उड नहीं सकती, पानी बन कर बह नहीं सकती । हमेशा परजीवी की तरह दूसरों का सहारा लेना और अपनी अयोग्यता को ढंक कर रखना ही औरतों की आदत बन गई है । कोई बेलदार पौधा बिना किसी बडे वृक्ष के तने से लिपट कर या उस के छावं के बिना न पनपता है न बढता है । औरत भी वैसी ही हो गई है । चाहिए सबकुछ पर बिना परिश्रम या योग्यता के । समावेशीता के नाम पर औरतों का कम परिश्रम और योग्यता का खोटा सिक्का भी बाजार में जोर से बजने या खनकने लगा है । तब भी अधिकांश औरत यही दुहाई देती है की उन्हे दूसरे दर्जे का माना जाता है और उन्हे वह सम्मान नहीं मिलता जितने की वह अधिकारिणी है । सम्मान या ईज्जत पाने के लिए योग्यता का धार दिमाग पर लगाना पडता है । स्वभाव से जन्मजात ईष्र्यालु औरत कभी भी अपनी अयोग्यता और सीप, कौशल में अनाडी होने की बात को स्वीकार नहीं करती । बस सिर्फ दूसरी पढी लिखी और जो अपने दमखम से उंचे ओहदे पर पहुंची है । उन के जैसा ही बनने की चाह में गलत राह पकड लेती है । ईस के लिए झूठ बोलना और नकली सर्टिफिकेट भी लेना पडे तो ईष्र्यालु औरतें तनिक भी नहीं हिचकती है । महिलाएं योग्यताऔर पद के दौड में पीछे रहने का कारण पुरुषों को मान कर इस का पुरुषाें के सिर पर ही फोड देती है । पुरुष महिला को अपनी प्रतिद्वन्धी नहीं मानता पर महिला अपने जीवन के सारे दुख कष्टों का कारण पुरुषों को मान कर खुद ही पुरुष जाति को पहले दर्जे का और अपने को दुसरे दर्जे का नागरिक मान लेती है । कर्म करने में जो आलसी और निख्टटु होते है वह अपनी असफलताका श्रेय भाग्य को देते हैं । ठीक वैसे ही पति या पुरुष को अपनी जाति के पीछे पडने का कारण मान कर अपने कर्माें से हाथ झाड लेती है । सब कुछ बैठे, बिठाए बिना योग्यता के चाहिए और दूसराें की सफलता भी हजम नहीं होती । ऐसे लोग या महिलाएं दूसरे दर्जे का ही बने रहे यही समाज और देश के लिए हितकर है ।

