बिन पेंदी का लोटा
हमारे देश और समाज का चरित्र बिन पेंदी के लोटे के जैसा बनता जा रहा है । जिस लोटे का नीचे का हिस्सा यानी पेंदी नही होता वह एक जगह टिक कर नहीं रह सकता । वह लोटा एक जगह से दुसरे जगह लुढकता रहता है । ठीक उसी तरह के चरित्र वाले ईंसान भी एक जगह टिक कर नहीं रहते। कभी इस घर में तो कभी उस घर में, कभी इस राजनीतिक पार्टी में तो कभी उस राजनीतिक पार्टी में । कभी सास के साथ बैठ राम नाम का माला फेर रहे हैं तो कभी बहू के साथ बैठ कर किटी पार्टी कर रहे हैं । सौ बात की एक बात यह है कि यह हर जगह फीट होते है और कभी एक जगह नहीं बैठते । थाली के बैगन की तरह थाली से ईधर, उधर लुढ्कते रहते है । जहां फायदा देखा वहां लुढकते हुए पहुंच जाते हैं और चिपक जाते है । जब तब उस थाली या जगह पर शहद की चाशनी टपकती रहती है तब तक मक्खी की तरह चिपक कर बैठ जाएगें । जहां पर थाली सूख गई रस आना ख़तम हो गया तब चिडीया की तरह फुर्र से उड कर दूसरी डाल में डेरा जमा लेते है । क्या करें बेचारों के पास एक जगह टिके रहने के लिए पेंदी जो नहीं है । प्रकृति ने इनके स्वभाव में पेंदी जो नहीं लगाया । तो क्या करे अपने स्वभाव के वशीभूत हो कर लुढकते रहते हैं और लुढ्कते हुए ही कहां से कहां पहुंच जाते है । क्यों कि लोटे कि तरह लुढ्कना ही इनकी नियति होती है । बेचारे अगर नहीं लुढकेगें तो घर में दाना, पानी का बन्दोबस्त जो नहीं हो पाएगा । बिन पेंदी के लोटा वाले चरित्र के जो लोग होते हैं वह दो का पांच करने में उस्ताद होते है । वह बैठे बिठाए झगडा करवा देगें, प्रेमिका के लिए मूंह से ही ताजमहल बनवा देगें । जो जिदां है या जिस से फायदा हो रहा है उस को झाड़ पर चढ़ा कर महान बना देगें । जहां वह ईसांन मर गया या उस से फायदा होना बंद हो गया तब उसको या उस के परिवार को मुड़ कर भी नहीं देखेगें कि वह जिदां है या सचमुच में मर गया । क्यों कि यह मुरदो से दोस्ती नहीं रखते । यह तो जो पद और पावर मे है उसी के दोस्त और हितचिन्तक बन कर नजदीक आते हैं । जहां उस ईसान का पद और पावर गया वहां से यह भी अपना डेरा, डंडा उठा कर रफू चक्कर हो जाते है । जबतक आग में तपिस हो तभी तक आग तापने में मजा है । बुझे हुए आग को कौन सुलगाने और तापने का जहमत उठाएगा ? पद और पावर का गुमान जिस के पास हो उस के हां में हां और ना में ना ऐसे करेगें जैसे कि एबिसिडी पढ रहे हैं या पहाडा रट रहे है ।हरसिगांर के फूल की तरह फायदा या नोट झरझर झर रहा हो तो उस ईसान का उल्टी भी साफ करने में नहीं हिचकिचाएगें । जब देखेंगे कि वह आदमी दीपक के लौ तरह या आग की तरह जल्दी ही बुझने वाला है तब खुद भी कहीं नहीं बुझ जाएं ईसी डर से खेमा बदल कर विरोधी पार्टी या व्यक्ति के घर में शरण लेने पहुंच जाएगें । क्योंकि ईसान का चरित्र ही स्वार्थी है । वह न खुद आग जलाएगा, न खुद आग तापेगा न दूसरों को तापने देगा । पर जहां आग जलते हुए देखेगा तब झट से बिन पेंदी के लोटे की तरह अपनी पाली बदल कर आग तापने जला जाएगा । पर अब वही आग बुझने लगेगी तब उसको खोंस कर जलाने का प्रयास नहीं करेगा उल्टे उस को पानी डाल कर बुझा देगा और आगे दुसरी जगह हाथ सेंकने के लिए खिसक जाएगा । जिस लोटे में पेंदी नहीं होता उस मे कोई भी पानी नहीं भरता । क्यों कि उस में भरम हुआ पानी लोटे में टिकेगा नहीं सब गिर जाएगा । ठीक उसी तरह दो मूहें सांप की तरह दो मूहें चरित्र वाले ईंसान जो सिर्फ अपना ही फायदा देखता है और अपने फायदे के लिए दुसरे को डूबा देता है उस को भी कोईपसंद नहीं करता न उस पर कोई बिश्वास ही करता है । इस तरह कें ईसान बस एक जगह से दूसरी जगह लुढकता ही रहता है । कोई उस को लात मार कर लुढकाता है तो कोई पटक कर लुढका देता है । बेचारा लुढकते हुए दूसरी जगह पहुंच जाता है और वहां भी उस का वही हाल होता है । यदि बिश्वास न हो तो विभिन्न राजनैतिक दल के दल बदलू नेता और पार्टी कार्यकर्ता को देख लें । यह सभी बिन पेंदी के लोटा या थाली के बैगन ही है जो अपने स्वार्थ के वशीभूत हो कर लुढकते रहते है । बिन पेंदी के लोटे की तरह लुढ्कने में ही इन थाली के बैगनों की आन, बान और शान टिकी हुई है । ईसी लिए सभी मिल कर ईन को लुढ्कने और लुढकाने में मदद करें । क्यों कि यह इस देश के लोगों का राष्ट्रीय चरित्र है । और अपने राष्ट्रीय चरित्र को कभी बदलना या छोड्ना नहीं चाहिए । नहीं तो पहचान का सकंट हावी हो जाएगा ।


