आज वो आख़िरी तस्वीर जला दी हम ने जिस से उस शहर के फूलों की महक आती थी : जैदी
मुस्तफा जैदी मोहब्बत के बड़े फनकार माने जाते हैं। उर्दू के एक प्रगतिशील शायर थे। लोगों के बीच तेग इलाहाबादी के नाम से विख्यात हुए। इलाहाबादी में पढ़ाई की। वहां जैदी इब्न ए शफी तथा मोहम्मद उजियार से जूनियर रहे। बाद में पाकिस्तान में प्रशासनिक अफसर बने। इनकी मौत रहस्यमय ढंग से हुई। जन्म 16 अक्टूबर 1929 में तथा निधन 12 अक्टूबर 1970 में हुआ। जंजीरें, रौशनी, शहर-ए-अजार इनकी मुख्य रचना है।
कभी झिड़की से कभी प्यार से समझाते रहे 
हम गई रात पे दिल को लिए बहलाते रहे
अपने अख़्लाक़ की शोहरत ने अजब दिन दिखलाए
वो भी आते रहे अहबाब भी साथ आते रहे
हम ने तो लुट के मोहब्बत की रिवायत रख ली
उन से तो पोछिए वो किस लिए पछताते रहे
उस के तो नाम से वाबस्ता है कलियों का गुदाज़
आँसुओ तुम से तो पत्थर भी पिघल जाते रहे
यूँ तो ना-अहलों के पीने पे जिगर कटता था
हम भी पैमाने को पैमाने से टकराते रहे
उन की ये वज़्-ए-क़दीमाना भी अल्लाह अल्लाह!
पहले एहसान किया बा’द को शरमाते रहे
यूँ किसे मिलती है मामूल से फ़ुर्सत लेकिन
हम तो इस लुत्फ़-ए-ग़म-ए-यार से भी जाते रहे
वो भी आते रहे अहबाब भी साथ आते रहे
उन से तो पोछिए वो किस लिए पछताते रहे
आँसुओ तुम से तो पत्थर भी पिघल जाते रहे
हम भी पैमाने को पैमाने से टकराते रहे
पहले एहसान किया बा’द को शरमाते रहे
हम तो इस लुत्फ़-ए-ग़म-ए-यार से भी जाते रहे
हर इक ने कहा क्यूं तुझे आराम न आया
सुनते रहे हम लब पे तिरा नाम न आया
दीवाने को तकती हैं तिरे शहर की गलियाँ
निकला तो इधर लौट के बद-नाम न आया
मत पूछ कि हम ज़ब्त की किस राह से गुज़रे
ये देख कि तुझ पर कोई इल्ज़ाम न आया
क्या जानिए क्या बीत गई दिन के सफ़र में
वो मुंतज़िर-ए-शाम सर-ए-शाम न आया
ये तिश्नगियाँ कल भी थीं और आज भी ‘ज़ैदी’
उस होंट का साया भी मिरे काम न आया
निकला तो इधर लौट के बद-नाम न आया
ये देख कि तुझ पर कोई इल्ज़ाम न आया
वो मुंतज़िर-ए-शाम सर-ए-शाम न आया
उस होंट का साया भी मिरे काम न आया

