हम को गुज़री हुई सदियाँ तो न पहचानेंगी, आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाये :जाँ निसार अख़्तर
जाँ निसार अख़्तर उर्दू शायरी के मशहूर और मारूफ शायर हैं , जो कि तरक्की पसंद तहरीक से वाबस्ता रहे जिनको तरक्कीपसंद तहरीक के सफ्ह-ऐ-अव्वल के शायरों में शुमार किया जाता है |
जाँ निसार अख़्तर भारतीय फ़िल्म जगत प्रसिद्ध गीतकार ‘जावेद अख्तर’ के पिता हैं |
अच्छा है उन से कोई तक़ाज़ा किया न जाए
अपनी नज़र में आप को रुसवा किया न जाए
हम हैं तेरा ख़याल है तेरा जमाल है
इक पल भी अपने-आप को तन्हा किया न जाए
उठने को उठ तो जाएँ तेरी अंजुमन से हम
पर तेरी अंजुमन को भी सूना किया न जाए
उनकी रविश जुदा है हमारी रविश जुदा
हमसे तो हर बात पे झगड़ा किया न जाए
हर-चंद ए’तिबार में धोखे भी है मगर
ये तो नहीं किसी पे भरोसा किया न जाए
लहजा बना के बात करें उनके सामने
हमसे तो इस तरह का तमाशा किया न जाए
इनाम हो ख़िताब हो वैसे मिले कहाँ
जब तक सिफारिशों को इकट्ठा किया न जाए
हर वक़्त हमसे पूछ न ग़म रोज़गार के
हम से हर घूँट को कड़वा किया न जाए
कौन कहता है तुझे मैंने भुला रक्खा है
तेरी यादों को कलेजे से लगा रक्खा है
लब पे आहें भी नहीं आँख में आँसू भी नहीं
दिल ने हर राज़ मुहब्बत का छुपा रक्खा है
तूने जो दिल के अंधेरे में जलाया था कभी
वो दिया आज भी सीने में जला रक्खा है
देख जा आ के महकते हुये ज़ख़्मों की बहार
मैंने अब तक तेरे गुलशन को सजा रक्खा है
जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये
तिश्नगी कुछ तो बुझे तिश्नालब-ए-ग़म की
इक नदी दर्द के शहरों में बहा दी जाये
दिल का वो हाल हुआ ऐ ग़म-ए-दौराँ के तले
जैसे इक लाश चट्टानों में दबा दी जाये
हम ने इंसानों के दुख दर्द का हल ढूँढ लिया
क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाये
हम को गुज़री हुई सदियाँ तो न पहचानेंगी
आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाये
फूल बन जाती हैं दहके हुए शोलों की लवें
शर्त ये है के उन्हें ख़ूब हवा दी जाये
कम नहीं नशे में जाड़े की गुलाबी रातें
और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाये
हम से पूछो ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या है
चन्द लफ़्ज़ों में कोई आह छुपा दी जाये


