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विखंडन का नारा देश में आया कहाँ से ? इसके पितामह कौन है ? – अजयकुमार झा

 
जलेश्वर | नेपाल में काखा और पाखा का राष्ट्रव्यापी असर दिख रहा है। खासकर, सी.के.और विप्लव के सम्बन्ध में। एक ओर रित्तिक रोशन काण्ड के ज्वाला से प्रज्ज्वलित आत्मसम्मान और स्वाभिमानी जीवन के ज्योति को सूर्य की भाँती विश्वव्यापी रुपमे फैलाने में सफल नेपाल के गौरव, वैज्ञानिक डा.सी.के. राउत तो दूसरी ओर हजारों नेपाली युवाओं के हत्यारा और खरबों के भौतिक संम्पत्ति को राख बनानेबाले माओपथ अनुगामी, लोकतंत्र के भक्षक विप्लव के सम्बन्ध में सरकार द्वारा रातोरात लिया गया निर्णय आम चर्चा और बहस का विषय बना हुआ है। रित्तिक रोशन काण्ड के दौरान काठमांडू लगायत देश के पहाड़ी वाहुल्य क्षेत्रों में नेपाल के मधेशवसियों के साथ विदेशी शत्रुओं की तरह किया गया क्रूरतापूर्ण व्यवहार को प्रत्यक्ष रुपमे अनुभव करने के कारण गंभीर और संवेदनशील व्यक्तित्व डी.सी.के. राउत के हृदय में 250 वर्षों से मधेशी जनता के साथ नेपाली सरकार द्वारा नियोजित रूप में होते आ रहे विभेद और अत्याचार का भयानक दृश्य उपस्थित होने लगा। परिणाम में एक वैज्ञानिक व्यक्तित्व क्रांतिकारी राजनैतिक महामानव के रुपमे देश और विश्व मंच पर उदीयमान सूर्य की भाँती सी.के.राउत के रूप में प्रकाशित हुआ। मधेस प्रति के उपेक्षित दृष्टिकोण के कारण यहाँ के विद्वान्, पत्रकार, नेता, मानवाधिकारवादी लगायत सरकार तक को दमन के अलाबा संवाद दिखाई ही नहीं दिया।और बिना मौलिक तथ्य को समझे ही उनपर विखंडनकारी और देशद्रोही का आरोप लगाकर दमन का दौर आरम्भ कर दिया गया। राउत ने खस अधिनायक मानसिकता से ग्रसित लोगो के द्वारा मधेसियों के अपमान हेतु प्रयुक्त “मधेस शब्द” के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को खोजने क्रम में मधेस को एक स्वतंत्र भूखंड के रुपमे तथ्यगत रुप से प्रमाणित कर विश्वमंच पर लाने का काम किया, जो आज सरकार और खस अभिमान के लिए हृदय घात का विषय बना हुआ है। चीनी और पाक को स्वागत करना और स्वदेसी मधेसी को अपमानित करना खस समुदाय का फितरत रहा है, जिसके परिणाम में देश आज भी अधोगति की ओर ही उन्मुख है। मधेश वह भूखंड है, जो कुछ ही वर्षों में नेपाल को सोने की चिड़िया बना सकती है। लेकिन अबतक के अयोग्य सरकार ने मधेस और मधेसियो को बर्वाद करने और लूटने के शिवाय कुछ किया ही नहीं। दमन, लुट, षडयंत्र यही है मधेस प्रति नेपाल सरकार का मूल मन्त्र। परन्तु वर्त्तमान ओली सरकार ने उच्च राष्ट्रीय भाव और सर्वजन हिताय सोच के तहत राष्ट्रीय अखंडता और सार्वभौमिकता को अक्षुन्न रखने के लिए राउत के साथ राजनैतिक समझौता कर देश को बहुत बड़ी समस्या से उबारने का काम किया है।इसके लिए ओली सरकार धन्यवाद के पात्र है।उच्च राष्ट्रियता और नेपालीपन के द्योदत है। (हिमाली पहाड़ी तराई।
कोही छैनन पराई।।) के संरक्षक है।
रही बात समझौते और अलग देश अथवा विखंडन की ! तो, मैं इसके मौलिकता पर ध्यान देना परम आवश्यक समझता हूँ। विखंडन का नारा इस देस में आया कहाँ से ? इसके पितामह कौन है?
दौरा सुरुवाल को  राष्ट्रिय पोशाक से हटाने कि माग मधेसी ने नहीं, पहाडियो ने किया था। नेपाली भाषा को सामन्तों की भाषा बोलनेबाला क्या मधेसी था ? पृथ्वीनारायण शाह के शालिक को किसने तोड़ा ? नेपाल से हिन्दू राष्ट्र हटा धर्मनिरपेक्ष मुलुक बनाकर इसाईयो को खुसकर  अपनी सांस्कृतिक मौलिकता पर किसने लात मारी थी ? जनमत के विरुद्ध नेपाल को धर्मनिरपेक्ष घोषित कर लोकतंत्र का मजाक किसने उड़ाया था ? वेद को जलाना, मन्दिर तोडना, मन्दिर में विष्टा लेपन करना,किरिया पुत्र को मारना, संस्कृत विषय को हटाना, जातीय और भाषिक तौर पे राज्य की माग करनेवाला मधेशी नहीं, पहाड़ी ही थे। एक नेपाली होकर  दुसरे नेपाली को मारने, बेइज्जत करने, और दुःख देने का काम मधेशी ने नहीं सिखाया। पृथ्वीनारायण शाह पर अपशब्द का प्रयोग और वीर योद्धाओँ को गुण्डा कहने बाला मधेश नहीं है, भक्तपुर में पृथ्वीनारायण साह के नामपर थूकने का उत्सव मधेस में नहीं मनाया जाता है। भारत सरकार के चरणों में नेपाल को अर्पण करने का काम मधेसी ने नहीं किया था। समवेदना के स्थान पर शुभकमना देकर देश के गरिमा को निचे दिखाने का काम मधेसी ने नहीं किया था। जनता के प्रिय राजा के वंश विनाश किसने किया ? निर्मला हत्या काण्ड किसने किया ?
17 हजार नेपाली युवाओं को सत्ता के नामपर किसने मारा ? सत्ता के लिए देश के खरबों के भौतिक संम्पत्ति को किसने बम से उड़ाया ? नेपाल के आन्तरिक मामला के साथ साथ, सार्वभौम निर्णयाधिकार और शक्ति को विदेशी के चरणों में अर्पण कर २००७ सात से अबतक के १२ बुँदे दिल्ली सम्झौता कर के नेपालीपन के गरिमा और हिमालय के महिमा को धूमिल करने का काम मधेशी ने नहीं किया था, हिन्दी भाषी धोतिवाला ने नहीं नेपाली भाषी टोपीवाला ने किया था। लेकिन मधेसियों को हमेशा विखंडनकारी और भारत परस्त जैसे अतिरंजित शब्दों को प्रयोग कर यहाँ के तथाकथित विद्वान्, नेता और पत्रकार अपने को राष्ट्रवादी कहलाने में सफल होते आए हैं। लेकिन दुर्भाग्य से आज इनका यह टोपी विप्लव के प्रतिबंधित होने के कारण खिसकने लगा है। वर्त्तमान में नेपाल के सर्वशक्तिशाली प्रधान मंत्री श्री के. पी. शर्मा ओली के मुखसे राउत के प्रति निकले ‘दार्शनिक और महापुरुष’ जैसा  महावाक्यों से तथाकथित राष्ट्रवादियों के हृदय टुकड़े टुकड़े हो गए हैं। और प्र.म.ओली शान्त मधेशियों के बीच महान शान्ति दूत लगने लगे हैं।

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