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आज विश्व कविता दिवस, जहां भी जीवन है, कविता है, वहां तक आज का दिन है ।

 

आज विश्व कविता दिवस है। जैसे ‘प्रेम’ या ‘मृत्यु’ का सिर्फ एक दिन नहीं होता, उसी तरह एक ही दिन के लिए ‘कविता दिवस’ नहीं होता। हर पल हर रोज हमारे साथ, हमारे भीतर कविताएं जीती हैं।

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अपना दिल पेश करूं, अपनी वफा पेश करूं कुछ समझ में नहीं आता तुझे क्या पेश करुं

जो तेरे दिल को लुभाए वो अदा मुझ में नहीं क्यों न तुझको कोई तेरी ही अदा पेश करुं

साहिर लुधियानवी की कहीं ये पंक्तियां एक बेचैन आशिक की ईमानदारी का कलाम हैं. वो अपनी माशूक को कोई तोहफा पेश करना चाहता है, पर उलझन में है कि ऐसा क्या दे जो उसे पसंद आए. प्रेम में पड़े लोगों के सामने कभी न कभी तो ऐसा वाकया जरूर पेश आता है.

लेकिन अगर एक प्रेमी एक शायर भी हो तो इस मुसीबत का हल जरा आसान हो जाता है. शायर या कवि की कलम में इतनी ताकत होती कि वो पूरी कायनात बना सकता है, फिर एक तोहफे की क्या हस्ती.

कहते हैं कि अगर किसी शायर को आप से मोहब्बत हो जाए तो आप कभी मर नहीं सकते

वेलेंटाइंस डे हो या विश्व कविता दिवस, एक शायर के दिलकश कलाम या किसी कवि की हृदयस्पर्शी कविता से बेहतर कुछ भी नहीं.

इंसान के दुनिया में आने के साथ ही प्रेम दुनिया में आया और भाषा के बनने के साथ कविता. तो यहां पेश हैं आपके लिए हिंदी के सभी कालों से ली गईं कुछ प्रतिनिधि प्रेम कविताएं.

अमीर खुसरो की प्रेम कविताएं

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग

तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार

जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार

आ साजन मोरे नयनन में, सो पलक ढाप तोहे दूँ

न मैं देखूँ औरन को, न तोहे देखन दूँ

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अपनी छवि बनाई के जो मैं पी के पास गई

जब छवि देखी पीहू की तो अपनी भूल गई

खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय

वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय

छाप तिलक सब छीनी रे मोसे नैना मिलाइके

प्रेम भटी का मदवा पिलाइके

मतवारी कर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

गोरी गोरी बईयाँ, हरी हरी चूड़ियाँ

बईयाँ पकड़ धर लीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

बल बल जाऊं मैं तोरे रंग रजवा

अपनी सी रंग दीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

खुसरो निजाम के बल बल जाए

मोहे सुहागन कीन्ही रे मोसे नैना मिलाइके

केदारनाथ सिंह की कविता

तुम आयीं, जैसे छीमियों में धीरे- धीरे आता है रस

जैसे चलते – चलते एड़ी में, काँटा जाए धँस

तुम दिखीं, जैसे कोई बच्चा, सुन रहा हो कहानी

तुम हँसी, जैसे तट पर बजता हो पानी

तुम हिलीं जैसे हिलती है पत्ती,

जैसे लालटेन के शीशे में काँपती हो बत्ती !

तुमने छुआ, जैसे धूप में धीरे- धीरे उड़ता है भुआ

और अन्त में जैसे हवा पकाती है गेहूँ के खेतों को, तुमने मुझे पकाया

और इस तरह, जैसे दाने अलगाये जाते हैं भूसे से, तुमने मुझे खुद से अलगाया

शुरुआत साहिर से की तो अमृता को याद किए बिना प्रेम और कविता का यह किस्सा अधूरा ही रह जाएगा. अमृता प्रीतम के आखिरी संग्रह की यह कविता अपने प्रेमी को फिर मिलने का वादा करती है. कौन जाने वो इमरोज हों या फिर ये आखिरी ख्वाहिश साहिर के लिए हो.

मैं तुझे फिर मिलूँगी

कहाँ कैसे पता नहीं

शायद तेरे कल्पनाओं की प्रेरणा बन

तेरे केनवास पर उतरुँगी

या तेरे केनवास पर एक रहस्यमयी लकीर बन

ख़ामोश तुझे देखती रहूँगी

मैं तुझे फिर मिलूँगी

कहाँ कैसे पता नहीं

या सूरज की लौ बन कर

तेरे रंगो में घुलती रहूँगी

या रंगो की बाँहों में बैठ कर

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तेरे केनवास पर बिछ जाऊँगी

पता नहीं कहाँ किस तरह

पर तुझे ज़रुर मिलूँगी

या फिर एक चश्मा बनी

जैसे झरने से पानी उड़ता है

मैं पानी की बूंदें तेरे बदन पर मलूँगी

और एक शीतल अहसास बन कर

तेरे सीने से लगूँगी

मैं और तो कुछ नहीं जानती

पर इतना जानती हूँ

कि वक्त जो भी करेगा

यह जनम मेरे साथ चलेगा

यह जिस्म ख़त्म होता है

तो सब कुछ ख़त्म हो जाता है

पर यादों के धागे

कायनात के लम्हों की तरह होते हैं

मैं उन लम्हों को चुनूँगी

उन धागों को समेट लूंगी

मैं तुझे फिर मिलूँगी कहाँ कैसे पता नहीं

मैं तुझे फिर मिलूँगी!!

अमृता प्रीतम

किसी प्रेम करने वाले से पूछिए, वह जरूर बताएगा किस कदर बेचैन होकर वह ढूंढता है उन कविताओं को जो उसके जज्बात को ठीक ठीक जाहिर कर सके, या फिर खुद किस शिद्दत से कोशिश करता है एक कविता में अपनी भावनाओं को उकेरने की।

अपनी जिन्दगी की बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए जूझते, अपने हकों के लिए लड़ने वाले लामबंद किसी शख्स से पूछिए, उम्मीद का दामन थामे वह भी कुछ यही कहेगा,

हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए
हम लड़ेंगे साथी, ग़ुलाम इच्छाओं के लिए

हम चुनेंगे साथी, ज़िन्दगी के टुकड़े
हथौड़ा अब भी चलता है, उदास निहाई पर
हल अब भी चलता हैं चीख़ती धरती पर
यह काम हमारा नहीं बनता है, प्रश्न नाचता है
प्रश्न के कन्धों पर चढ़कर
हम लड़ेंगे साथी..(पाश)

या फिर रिश्तों में चोट खाए हुए किसी उदास व्यक्ति से पूछिए, वो गम का मारा भी कुछ यूं ही कहेगा:

इंशा जी उठो अब कूच करो इस शहर में दिल को लगाना क्या।
वहशी को सुकूं से क्या मतलब जोगी का शहर में ठिकाना क्या। (इब्ने इंशा)

यानी हमारी सारी इंसानी संवेदनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए हम कविताओं की तरफ रुख करते हैं। तमाम सामाजिक, राजनीतिक और निजी परेशानियों, दुष्टताओं और उधेड़बुन के बीच हमें हमारे अच्छेपन और इंसानियत का एहसास कराती हैं कविताएं। इन्हें अमूमन न कोई खरीदता है, न इनकी या इन्हें लिखने वालों की कद्र करता है, बल्कि एक बड़ा तबका तो कवियों को ‘लूजर’ करार देता है। लेकिन फिर भी ‘जिंदा’ होने को शिद्दत से महसूस करने के लिए हर हाल में कविताओं को ही पढ़ा जाता है, ढूंढ़ा जाता है और लिखा भी जाता है।

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जरा उन लोगों से पूछिए जिन्हें अपने ही देश में बोलने-लिखने की आजादी नहीं, वो बताएंगे कि कविताएं उनके लिए कितनी अहम हैं। ‘मता ए लौहो कलम छिन गयी तो क्या ग़म है/ कि खूने दिल में डुबो ली हैं उंगलियाँ मैंने!’

चाहें ईश्वर की तलाश का जुनून हो, या अपने प्रेमी से मिलने की ललक, गम-ए-रोजगार हो या गम-ए-दुनिया- कविता आपको जीने का उत्साह, उम्मीद और ऊर्जा देती है, आपके बेहद निजी एहसासात को शब्दों में ढाल कर एक किस्म का ‘रिलीफ’ देती है। आप इनकी कितनी भी उपेक्षा कर लें, लेकिन वे हमेशा हैं वहां, जहां भी आपको इनकी जरुरत हो।

इसलिए, एक ही दिन ‘कविता दिवस’ नहीं होता जैसे एक ही दिन ‘प्रेम’ या ‘मृत्यु’ का नहीं होता, हमारी सांसों की तरह बिना एहसास दिलाये हर पल हर रोज हमारे साथ, हमारे भीतर और हमारे बीच जीती हैं कविताएं, खोयी हुयी चीजों/ बीती हुयी घटनाओं की तरह।

चीज़ें खो जाती हैं लेकिन जगहें बनी रहती हैं
जीवन भर साथ चलती रहती हैं…

घटनाएं विलीन हो जाती हैं
लेकिन वे जगहें बनी रहती हैं जहां वे घटित हुई थीं
वे जमा होती जाती हैं साथ-साथ चलतीं हैं
याद दिलाती हुईं कि हमें क्या भूल गया हैं और हमने क्या खो दिया है।(मंगलेश डबराल)

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