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जीवनदायिनी नदियाँ, नमामि गंगे जैसी परियोजना की आवश्यकता नेपाल में भी-१ : मुरलीमनोहर तिवारी

 

मुरलीमनोहर तिवारी (सिपु),हिमालिनी, अंक फरबरी 2019 |नदियों के कई सामाजिक, वैज्ञानिक व् आर्थिक लाभ है । नदियों से जीवन के लिए अत्यन्त आवश्यक स्वच्छ जल प्राप्त होता है, यही कारण है कि अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं ,जनजातियाँ नदियों के समीप ही विकसित हुईं । उदाहरण के लिए सिंधु घाटी सभ्यता, सिंधु नदी के पास विकसित होने के प्रमाण मिले है । सम्पूर्ण विश्व के बहुत बड़े भाग मे, पीने का पानी और घरेलू उपयोग के लिए पानी, नदियो के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है । आर्थिक दृष्टि से भी देखे तो नदियाँ बहुत उपयोगी होती है क्योंकि उद्योगो के लिए आवश्यक जल नदियों से सरलता से प्राप्त किया जा सकता है । कृषि के लिए, सिंचाई एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, इसके लिए आवश्यक पानी नदियों द्वारा प्रदान किया जाता है । नदियाँ खेती के लिए लाभदायक उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी का उत्तम स्त्रोत होती हैं । नदियां न केवल जल प्रदान करती है बल्कि घरेलू एवं उद्योगिक गंदे व अवशिष्ट पानी को अपने साथ बहकर ले भी जाती है । बड़ी नदियों का उपयोग जल परिवहन के रूप मे भी किया जा रहा है । सैलानियों के लिए भी नदियों कई मनोरंजन के साधन जैसे बोटिंग, रिवर रैफ्टिंग आदि उपलब्ध करती है जिससे पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलता है । नदियो से मछली के रूप मे खाद्य पदार्थ भी प्राप्त होते है। नदियों पर बांध बनाकर उनसे हाइड्रो बिजली प्राप्त होती है । मानसून के बाद कहीं बाढ की तबाही होती है, तो कही नदियों का प्रवाह तेजी से कम हो रहा है । यह देशव्यापी चिन्ता का विषय है । इसी उद्देश्य के तहत ‘हिमालिनी’ ने नेपाल की नदियों का मैनुअल तैयार किया है । यह मैनुअल नदियों के उद्गम, प्रवाह मार्ग, बांध, परियोजनाएं, मानसून के बाद के प्रवाह की कमी को कम करने वाले प्रयासों तथा नवाचारों पर सुझाव प्रस्तुत करती है ।
नेपाल की नदियों का मैनुअल तैयार किया है । यह मैनुअल नदियों के उद्गम, प्रवाह मार्ग, बांध, परियोजनाएं, मानसून के बाद के प्रवाह की कमी को कम करने वाले प्रयासों तथा नवाचारों पर सुझाव प्रस्तुत करती है ।
मैनुअल के मुख्य उद्देश्य निम्नानुसार हैं ः
१. नदियों को अविरल बनाने के लिये प्रयास करना ।
२. नदी की प्राकृतिक जिम्मेदारियों को पूरा कराने वाले कामों को सहयोग देना ।
३. नदी की अस्मिता तथा जैवविविधता की बहाली के लिये प्रयास करना ।
४. नदी जल को स्वतः साफ होने वाली नैसर्गिक क्षमता की बहाली हेतु प्रयास करना ।
५. नदी जल के उपयोग हेतु समाज की सहमति से प्रकृति सम्मत नियम बनवाना और उनको लागू करवाना। प्रकृति सम्मत सुरक्षित विकास को बढ़ावा देना ।
६. नदी जल पर निर्भर समाज की आजीविका के लिये प्रयास करना ।
७. अन्य कार्य जो स्थानीय परिस्थितियों में किसी नदी विशेष के लिये आवश्यक हो, करवाने के लिये प्रयास करना ।
अरुण नदी
अरुण नदी कोसी नदी की एक महत्वपूर्ण उपनदी है । यह तिब्बत के शिगात्से विभाग के न्यालाम जिले में महालंगूर हिमाल की ढलानों में उत्पन्न होती है, जहाँ इसे फुंग चु और बुम चु के नाम से जाना जाता है और फिर यह नेपाल मे प्रवेश करती है । नेपाल सरकार ने १९९२ में इस परियोजना का गठन किया था । हालांकि, अरुण घाटी की संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता में व्याप्त निजीकरण के खिलाफ चिंतित गैर सरकारी संगठनों, पर्यावरण संरक्षक और व्यक्तियों ने इसके खिलाफ कई चिंताएं व्यक्त की हैं । इसके अलावा, परियोजना की आलोचना में पहले से ही उच्च बिजली दरों में वृद्धि का डर शामिल था लेकिन परियोजना नेपाल के विकास के लिए उपयुक्त था । वनों की कटाई और आवास के विखंडन से संबंधित परियोजना क्षेत्र के सड़क के लिए भी कई बहस हुए । तमाम तर्कों के बावजूद १९९५ में, विश्व बैंक ने परियोजना को रद्द करते हुए, अपना समर्थन वापस लेने का फैसला किया । बाद में परियोजना को फिर से पुनर्जीवित किया गया और नवंबर २०१४ में परियोजना विकास समझौते (पीडीए) पर हस्ताक्षर किए गए, जो २५ वर्षों के लिए नेपाल में २१.९५ मुफ्त शक्ति को लाइमलाइट में लाया गया, परियोजना से अधिशेष बिजली भारत में नेपाल के ढल्केबर से बिहार में मुजफ्फरपुर को निर्यात की जाएगी । २०१७ में भारत की कैबिनेट ने परियोजना को मंजूरी दी, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने रिमोट के जरिये ९०० मेगावाट के अरुण घ जलविद्युत संयंत्र की आधारशिला रखी । यह संयंत्र पूर्वी नेपाल के तुमलिंगतर क्षेत्र में स्थापित होगा ।
बरुण नदी
बरुण नदी, अरुण नदी की एक सहायक है और वरुण नदी नेपाल में पाई जाती है नेपाल में कोसी नदी प्रणाली का हिस्सा है । नेपाल में ऐसी बहुत सी नदियां पाई जाती हैं जैसे कंकई नदी युबराज नदी, दुध कोशी, इम्मा खोला, हांगू नदी, इंद्रवती नदी, लखांदेई नदी, विष्णुमती नदी, बिनाई नदी, पूर्वी राप्ती नदी, त्रिशूली नदी, सेती नदी, गंडकी नदी, मर्सयांगदी नदी, विष्णुमति नदी, लखनदेई नदी, लाल बकेया नदी, चकनाहा नदी, जमुने नदी, सिपरीधार नदी, छोटी बागमती, कोला नदी । बरुण नदी को कोशी नदी प्रणाली के सप्त कोशी के रूप में जाना जाता है, क्योंकि सात नदियां जो इस नदी के निर्माण के लिए पूर्व मध्य नेपाल में एक साथ जुड़ती हैं । कोशी प्रणाली बनाने वाली मुख्य नदियां हैं ः सूर्य कोशी नदी, इंद्रवती नदी, भोट कोशी, दुध कोशी, अरुण नदी, बरुण नदी और तमूर नदी । पहाड़ी से निकलने के लिए संयुक्त नदी चतुरा गोर्ज के माध्यम से एक दक्षिणी दिशा में बहती है ।
बरुण नदी आठ हजारों में से एक मकालू के आधार पर बरुन ग्लेशियर से निकलती है । वरुण नदी जो सर्दियों के महीनों में जम जाती है और गर्मियों के महीनों में कभी कभार बाढ़ का कारण भी बनती है, वरुण नदी को स्थानीय लोग किरात भाषा में चुक्चुवा के रूप में भी जानते है । अध्ययनों से पता चला है कि यह जगह शुरू में यक्ष और लिंबू द्वारा अधिकृत की गई थी । नेपाल की वरुण काठी में सबसे ऊपरी सतह पर घाटी है, जहां पंछी अक्सर पानी पीने के लिए आ जाते हैं, जहाँ इंसान का पहुंचना ना के बराबर है ।
तिनाउ नदी
तिनाउ नदी, नेपाल और भारत से होकर बहने वाली छोटी नदी है जो महाभारत पर्वतशृंखला से निकलकर शिवालिक पहाडि़यों एवं तराई क्षेत्र से बहती हुई बुटवल के पास भारतीय सीमा में प्रवेश करती है । अन्त में यह गंगा में मिल जाती है । ऋग वेद की मान्यता के अनुसार दनु पूर्व काल की एक देवी थी । वह दानवों की माँ थी जो देवों के विरुद्ध उठ खड़े हुए थे । बाद के समय में वह दक्ष की पुत्री और कश्यप की पत्नी बताई गई है । इसी नाम से नेपाल में एक नदी भी पाई जाती है ।
कमला नदी
नेपाल से उत्पन्न होकर मुख्यतः भारत के बिहार राज्य में बहने वाली एक नदी है । यह नदी मिथिलांचल में गंगानदी के बाद सर्वाधिक पुण्यदायिनी तथा महत्वपूर्ण उर्वरा शक्ति युक्त मानी जाती है । कमला का उद्गम स्थान नेपाल के ’महाभारत पर्वत’ कहलाने वाली शृंखला में है । कमला त्रिस्रोतसा नदी है अर्थात मूलतः तीन धाराएँ मिलकर कमला नदी बनती है । पश्चिम और मध्य भाग के स्रोत नेपाल के सिंधुली जिले से चलकर धनुषा जिले में आते हैं । इनमें पश्चिम के स्रोत से मध्य का स्रोत छोटा है, लेकिन पूर्व का तीसरा स्रोत लंबा है और कमला का वास्तविक उद्गम यही स्रोत है । स्त्रोत का उद्गम सागरमाथा अंचल के उदयपुर जिले के उत्तरी छोर में है और यह उदयपुर गढ़ी से नैऋत्य कोण में बहते हुए जनकपुर और धनुषा जिले में आकर तीनों स्रोत परस्पर मिलकर दक्षिण की ओर बढ़ते हैं । पहले पश्चिम और मध्य भाग के स्रोतों का मिलन होता है और फिर तीनों धाराएँ परस्पर मिलकर लगभग १८ मील पूर्व दिशा की ओर बहने के बाद उदयपुर गढ़ी के उत्तर से नेपाल के पहाड़ी भाग में लगभग १५ मील बहती हैं और तब उसकी तराई के धनुषा जिले में उतरती है । इस तराई भाग में भी लगभग २० मील दक्षिण की ओर बहने के बाद भारत के बिहार राज्य में जयनगर नामक प्रसिद्ध स्थान के पास कमला बिहार के वर्तमान मधुबनी जिले में अवतरित होती है, जहाँ उसे अत्यधिक पवित्र नदी के रूप में मान्यता प्राप्त हो जाती है । कमला नदी १,२०० मी. (३,९३७ फीट) ऊँचाई से चलती हुई ३२८ कि.मी. (२०४ मील) की लम्बी दूरी तय करती है ।
पुण्य की दृष्टि से मिथिला में गंगा के बाद कमला का ही सर्वोपरि स्थान है । श्रीवृहद्विष्णुपुराण के चतुर्दश अध्याय में ‘मिथिला–माहात्म्य’ के अंतर्गत मिथिला की महत्त्वपूर्ण नदियों का नाम गिनाने के क्रम में सर्वप्रथम ‘कोशी’ के बाद ‘कमला’ का ही नाम लिया गया है, यद्यपि मिथिलांचल की नदियों में कोशी सबसे बड़ी नदी है, परंतु उसकी प्रसिद्धि महाविनाशनी नदी के रूप में ही रही है । इसके विपरीत कमला शस्यहस्ता विष्णुप्रिया लक्ष्मी के रूप में प्रसिद्ध रही है । लोग इसे ‘कमला मैया’ कह कर पूजते हैं । एक मान्यता कोशी को महाकाली, कमला को महालक्ष्मी तथा बागमती को महासरस्वती के रूप में मानने की भी रही है । कोशी का पानी जिधर से बहता है उधर की जमीन बंजर हो जाती है, जबकि कमला का पानी बाढ़ में जिधर से गुजरता है उधर ऐसी पाँक छोड़ते जाता है कि फसलों की उपज कई गुना बढ़ जाती है, इसलिए बाढ़ में विकराल रूप धारण करने के बावजूद तथा काफी नुकसान पहुँचाने के बावजूद कमला की महिमा कमला मैया के रूप में बनी हुई है ।

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प्राचीन प्रवाहमार्ग
कमला की काफी प्राचीन तीन धाराएँ मिथिलांचल की एक प्रसिद्ध नदी ‘जीबछ नदी’ से मिलकर बहती थी, जिसका नामशेष अब ‘जीवछ नदी’ के रूप में ही रह गया है । कमला की ये प्राचीन धाराएँ जयनगर–मधुबनी रेल मार्ग से पश्चिम होकर बहती थीं, जबकि बाद की धाराएँ जयनगर–मधुबनी रेल मार्ग से पूरब होकर बहती रही हैं । ये ही धाराएँ वस्तुतः ‘कमला नदी’ के नाम से प्रसिद्ध हैं । वर्तमान में कमला मिथिलांचल की अपेक्षाकृत छोटी नदी ‘बलान’ से मिलकर बहती है और प्रायः ‘कमला–बलान’ के नाम से जानी जाती है । यह बलान मिथिलांचल की ही एक बड़ी नदी ‘भुतहीबलान’ से भिन्न है । कमला नाम से प्रसिद्ध धारा का भी प्राचीन मार्ग अब सूख चुका है तथा इतिहास बन चुका है ।
कमला की प्राचीन धारा भी जयनगर के निकट पूर्वी भाग के रेल मार्ग से प्रायः सटी हुई ही दक्षिण की ओर बहती हुई जयनगर के पूर्वी भाग के विशाल चौर (खाली स्थान, निर्जन) से होकर गुजरती थी । कमला की इस धारा के किनारे ब्रह्मोत्तर, सेलरा, सुक्खी, भकुआ, मनियरवा तथा खजौली गाँव पड़ते थे । सुक्खी के पास मिथिलांचल की एक काफी छोटी नदी ‘धौरी’ कमला से मिलती थी । कमला की यह प्राचीन धारा खजौली रेलवे स्टेशन और खजौली गाँव के बीच से बहती थी । इस धारा की दाँयी ओर पश्चिम में रेलवे स्टेशन तथा बाँयी ओर पूरब में खजौली गाँव था । उस समय गाँव से स्टेशन की दूरी लगभग ढाई मील थी । खजौली से दक्षिण लगभग ढाई तीन मील दूर लालपुर नामक गाँव तक जाकर कमला अग्निकोण में मुड़ती थी । मधुबनी से ७ मील दूर पूरब उत्तर कोने में स्थित मिर्जापुर नामक गांव के पास कमला की एक और धारा परिहारपुर की ओर से आकर मिलती थी तथा इसके बाद कमला अग्नि कोण में बहती हुई कोइलख गाँव से पश्चिम रघुवीर चक गाँव के पास से बहती हुई रामपट्टी, खनगाँव और नवहथ गाँव तक पहुँचती थी । नवहथ गाँव के पास से कमला की दो धाराएँ बनती थी, जिसमें से पूरबी धारा बिल्कुल समाप्त हो गयी है । यह धारा लोहट मिल के पास से तथा ‘भौर’ गाँव होते हुए अग्निकोण में रामपुर तथा माधोपुर गाँव तक पहुँचती थी । माधोपुर से यह प्राचीन धारा दक्षिण दिशा में मुड़ कर सरिसवपाही के पूर्व से दरभंगा झंझारपुर रेल लाइन को पारकर दक्षिण जाती थी । झंझारपुर से ३ मील पश्चिम में सुखवारे गाँव के पास यह रेल लाइन पार करती थी । इस रेललाइन के दक्षिण तथा कमला की इस मृतधारा के दाएँ भाग में पश्चिम दिशा में बिसौल नामक गाँव है । यह बिसौल गाँव हरलाखी के पास वाले बिसौल से भिन्न है । यहाँ से यह प्राचीन धारा अधिकतर अग्निकोण में झुकती हुई दक्षिण दिशा की ओर बहती थी तथा लगमा गांव से गुजरती हुई मदरिया गांव तक जाती थी और बहेड़ा के पूर्वोत्तर भाग में स्थित प्राचीन चौर (झील) में समाप्त हो जाती थी । चौर में जहां यह धारा अपना जलाशय बनाती थी वह स्थान बहेड़ा से लगभग छ या ट मील पूर्व उत्तर दिशा में है ।
नवहथ गाँव के पास कमला की जो दूसरी धारा पश्चिम की ओर मुड़ती थी वह सेमुआर गाँव के अग्नि कोण में पहुँचकर सकरी मधुबनी रेल लाइन को लाँघकर उसके पश्चिमी भाग से सटे सटे दक्षिण की ओर चलती हुई दहिभत(नरोत्तम गाँव को जाती थी । यह गाँव इसकी बाईं ओर तथा रेल लाइन के पूरब स्थित है । सकरी में रेलवे लाइन लाँघकर दक्षिण दिशा में बहती हुई कमला की यह धारा राघोपुर, नेहरा, मौजमपुर तथा सिरीरामपुर नामक गांव को पहुंचती थी । बहेड़ा से पूरब नवादा गांव भी इस धारा के बाएँ किनारे बसा है और मझौरा गाँव दाएँ किनारे । इस मझौरा गाँव से कमला की यह धारा अग्नि कोण में चलती हुई श्रीपुर जगत गाँव होते हुए हरसिंघपुर के पास पहुँच कर दक्षिण दिशा में बहती हुई विशुनपुर गाँव से होती हुई डुमरी तथा बिरौल के पश्चिम में पहुँचती थी । बिरौल बाजार कमला की इस धारा के बाएँ किनारे अवस्थित है । यहाँ से दक्षिण की ओर बहने पर कमला समस्तीपुर जिले के सिंघिया थाने में प्रवेश करती थी और अपनी धारा को अग्नि कोण में मोड़ते हुए मिस्सी गाँव तक पहुँचती थी । मिस्सी गाँव से दक्षिण महरी नामक गाँव के पास यह तारसराय होकर आने वाली अपनी प्राचीन शाखा जीवछ की पूरबी धारा को ग्रहण कर लेती थी । फिर अग्नि कोण में बहती हुई मोहीम खुर्द तथा बिसरिया गाँव होते हुए पिपरा गांव के पास उत्तर वाहिनी हो जाती थी । फिर कुछ दूर बाद पूर्व दिशा की ओर बहती हुई दक्षिण दिशा में घूमकर दरभंगा सहरसा जिले की सीमा बनती हुई दक्षिण दिशा में बहती हुई इटहर, सिमरटोक, महादेव मठ आदि गाँव के पास पहुँचती थी । पहले तिलकपुर के पूर्वोत्तर कोण में कमला की इस धारा का बागमती की शाखा ‘करेह’ से संगम होता था, लेकिन अब कोसी से संगम होता है । उक्त इटहर गाँव के पश्चिम में ही कुशेश्वर नामक प्रसिद्ध शिवस्थान है । क्रमशः

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नमामि गंगे जैसी परियोजना की आवश्यकता नेपाल में भी

नदी कभी ना रुकने वाला पानी का स्रोत है । पानी का महत्व समाज में इस बात से ही समझा जा सकता है कि मानव ने जीवन देने वाले जल को भगवान का दर्जा दिया । नदी तो सम्पूर्ण रूप में देवियाँ थीं ही उनमें भरा जल भी ईश्वर का एक रूप था जिस तरह आसमान और पातालों के देवों की कल्पना की गई, उसी तरह जल में रहने वाले देवता को भी आहूत किया गया । जल का देवता वरुण माना गया । वह पानी में ही रहता है । इस देवता का महत्व भी उतना ही है जितना कि आकाश से बरसने वाले पानी के देवता इन्द्र का ।
बारिश, नदी और समुद्र जैसे एक दूसरे के पूरक हैं । समुद्र का पानी नदियों तक लम्बी यात्रा करके आता है । नदियों मे बहता मीठा पानी रास्ते भर के लवणों को समेटते हुए समुद्र तक पहुँचते–पहुँचते खारा हो जाता है । इसे पिया नहीं जा सकता । फिर वह वाष्प के रूप में बादल बन जाता है । ये बादल मीठे पानी की सौगात लाते हैं । बादल बरसते हैं और नदियाँ उस पानी को अपनी संतान की तरह अपने में समेट लेती हैं धरती, खेतों और सभ्यताओं की प्यास बुझाने के लिए । न जाने प्रकृति को कैसे मालूम है कि मनुष्य और अन्य जीव धारियों को पीने के लिए मीठा पानी ही चाहिए । इसलिए समुद्र चाहे अनंत जल राशि से भरा है, अथाह है मगर नदियों के सामने बौना ही है । हमारी सभ्यता और हमारी संस्कृति नदियों की ऋणी है जिनके कारण मानवता और धरती का विकास हो सका । नदियों, बादलों, मनुष्यों का सम्बन्ध युग–युगों से चला आ रहा है । पर अफसोस इस बात का है कि जिन नदियों की हम पूजा करते हैं वही नदियाँ अपना स्वरूप बदल रही हैं प्रदूषित हो रही हैं और इसका सारा श्रेय मानव जाति को जाता है । आज नदियों को बचाने की मुहिम जारी है जिसके तहत भारत मे नमामि गंगे योजना शुरु की गई है । मोदी सरकार की यह कोशिश अपने आप में एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है जिसके तहत प्रकृति संरक्षण की पहल की गई है । इस योजना के अंतर्गत सबसे पहले ग्रामीण क्षेत्रों की सफाई से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों की नालियों से आते मेले पदार्थ को रोकना । इस योजना के अंतर्गत जहा शौच का ठोस कचरा नदी मे आता होगा वहा शौचालयो का निर्माण कर सिवेज की सुविधा की जाएगी । गंगा नदी के किनारो पर श्मशान गृह का नवीनीकरण, आधुनिकीकरण और निर्माण किया जाएगा, ताकि आंशिक रूप से जले हुए शव को नदी में बहाने से रोका जा सके । साथ ही गंगा नदी के किनारो पर लोगो और नदी के बीच सबंध को बेहतर करने के लिए घाटों के निर्माण, मरम्मत और आधुनिकीकरण का लक्ष्य भी निर्धारित है ।
नेपाल जलस्रोत का धनी देश है जहाँ नदियाँ ही नदियाँ हैं । पर दुखद पहलू ये है कि नदियाँ निरन्तर प्रदूषित हो रही हैं । पर सरकार की ओर से यहाँ नमामि गंगे जैसी कोई परियोजना नहीं है और न ही इसकी ओर कोई पहल की गई है । नेपाल की नदियों में बह रहा पानी एक नदी से दूसरी नदी में अपने उसी प्रदूषित जल का प्रवाह हो रहा है । यहाँ भी आवश्यक है कि नदियों का प्रशोधन तंत्र बने और नदियों को प्रशोधित किया जाय । एक दशक से नेपाल में नदियों में बढ़ते प्रदूषण पर और इसका पर्यावरण पर पड़ रहे दुष्प्रभाव पर बारीक नजर बनाये रखने वाले डा. विजय पण्डित का कहना है कि भारत सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना नमामि गंगे तभी सफल हो पायेगी जब गंगा नदी की सभी सहायक नदियाँ स्वच्छ होंगी और नेपाल से बहने वाली सभी नदियाँ उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार के रास्ते भारत में प्रवेश कर गंगा में मिल जाती हैं ।
चुकिं नेपाल मे किसी नगरपालिका के पास सीवर व दूषित जल शोधन सयंत्र नही हैं और सारा कचरा व दूषित जल नदियोँ के रास्ते गंगा मे मिल कर गंगा मे प्रदूषण की मात्रा बढ़ा रही हैं ।
अगर गंगा को पूर्ण रूप से प्रदूषण मुक्त करना है तो भारत सरकार को नेपाल की नदियों को नमामि गंगे परियोजना में शामिल करना होगा तभी हम सफल हो पायेंगे । यह देशव्यापी चिन्ता का विषय है । इन्हीं सब बातों के मद्दे नजर हिमालिनी टीम ने कोशिश की है नेपाल की नदियों पर अध्ययन किया और एक रिपोर्ट तैयार की है जिसकी पहली कड़ी इस अंक में प्रकाशित हो रही है ।

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