Sun. May 31st, 2020

एक समीक्षात्मक अनुशीलन: रेत होते रिश्ते

 लेखिका: डॉ मुक्ता

डाक्टर मुक्ता

प्रकाशन: पेसिफिक बुक्स इंटरनेशनल

मूल्य: 220 पृष्ठ: 128

समीक्षक 

डॉ बीना राघव साहित्यकार और शिक्षाविद्

मनुष्य मनन करता है तो ही ‘मनुष्य’ है। समाज की विसंगतियों से जब सहृदय मनुष्य का मन उद्वेलित हो उठता है तब लेखनी भाव उकेरती है। नि: संदेह मुक्ता जी की भाव कथाएँ उत्कृष्ट हैं और जनमानस को अभिव्यक्ति देती हैं। सबसे बड़ी खासियत है कि इन्हें कम समय में पढ़कर पाठकगण अभिभूत हो उठते हैं क्योंकि ये संक्षिप्त और सारगर्भित हैं। रिश्तों की अगर बात करें तो वे आज सच में ही रिस रहे हैं। ‘अर्थ’ की माया का आवरण ऐसा चढ़ गया है कि उन्होंने अपना अर्थ ही खो दिया है। धैर्य, सहनशीलता, त्याग, अपनापन, स्नेह, इन सबने मानो स्वार्थ के आगे हथियार डाल दिए हैं। यशस्वी और कर्मठ साहित्यकार डॉ मुक्ता जी ने रिश्तों के अलगाव को बखूबी अपने कथ्यों में उभारा है और साथ ही समाज में व्याप्त विभिन्न समस्याओं पर मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी दिया है। वे लघुकथा की भांति पाठक को औचक-भौंचक नहीं छोड़ देतीं अपितु सटीक व संक्षिप्त समाधान के साथ विश्लेषण भी प्रस्तुत करती हैं। यहाँ पात्रों के साथ विषय- वैविध्य भी है। स्त्री विमर्श हो, बाल जगत या वृद्ध जगत हो, समाज के हरेक कोने में से वैषम्य ढूँढ लाई हैं और उस विद्रुपता से हमें सावधान करने को लालायित लगती प्रतीत होती हैं। पढ़ने वाला पाठक उनकी संवेदनशीलता से परिचित हुए बिना रहता और स्वयं भी जागरूक बनता है। मेरे हृदय को सर्वाधिक छूने वाले बोध प्रसंग हैं- हृदय प्रसंग, हिटलर पापा, पिंजर, शून्यता, आपबीती, सज़ा, रहनुमा आदि। गहन चिंतन-मनन का बोध कराती ये बोध कराती कथाएँ विचारात्मक और संवेगात्मक शैली में हैं। लेखिका के स्तुत्य प्रयासों के अविरल प्रवाहित होने की शुभकामनाएँ लिए डॉ बीना राघव साहित्यकार और शिक्षाविद्

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