“तलाश” में प्यार है, चिन्ता है और मानव से कुछ सार्थक कर जाने की गुजारिश भी : डॉ. श्वेता दीप्ति
बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो खुद को खुद की तराजु में तौलते होंगे और अपनी खामियों से रुबरु हो पाते होंगे
तलाश जो अनवरत जारी है, जो बंदिशों में बँध जाय, सच कहूँ तो वो जज्बात कहाँ होते, वो तो बस एक सजा सँवरा गुथा हुआ शब्दों का गुलदस्ता होता है । जिसमें खूबसूरती तो यकीनन होती है, पर ताजे फूलों की खुशबू नहीं होती । प्रकृति का अस्तव्यस्त सौन्दर्य हमें जितना आकर्षित करता है, उतना सजा सँवरा बागीचा या चमन नहीं । पर हाँ खूबसूरत तो दोनों ही होते हैं और लुभावने और आकर्षक भी । अल्हड़ नदियाँ या बेपरवाह गिरते झरनों का संगीत जिस तरह अपनी ओर खींचता है, अटल अडिग आकाश को छूती पर्वतों की चोटियों की कशिश जिस तरह हमें अपनी ओर बुलाती है, बस कुछ ऐसी ही भावनाएँ तब दिल में जगती है जब आप उन पंक्तियों से गुजर रहे होते हैं, जो आपके अन्तर्मन को छू रही होती है । मैं व्यक्तिगत तौर पर जब भी कोई गीत, गजल या कविता पढती हूँ, तो उसके बिखरेपन को ज्यादा प्यार करती हूँ, जहाँ मुझे यह महसूस होता है कि दिल के जज्बात बस बयाँ होते चले गए हैं, बिना प्रयास के सायास ही और यह सब तब तो और भी सुन्दर हो जाता है, जब इसे शास्त्रीयता के साथ पेश किया जाय । बस तब तो सोने पे सुहागा वाली बात होती है । क्योंकि नियमों का भी अपना अलग अंदाज है और उसका अनुकरण हमें अनुशासनप्रिय बनाता है ।
यहाँ चर्चा करने वाली हूँ मैं एक “तलाश” की, तलाश ! एक ऐसा शब्द जो इंसान के साथ उसकी जिन्दगी के हर कदम पर संग चलता है । भूख है तो रोटी की, धूप है तो छाँव की, मकान है तो घर की, प्यार है तो अहसास की, जिद है तो जुनून की, साथ है तो एतबार की, भीड़ है तो तन्हाई की और सब हासिल है तो सुकून की, जी हाँ अनवरत रूप से हमारे साथ किसी ना किसी की तलाश चलती रहती है और यही हमारी जिन्दगी को गति प्रदान करती है । वरना जीवन भी ठहरे हुए पानी की तरह हो जाय । कुछ अच्छा पढ़ने की तलाश के तहत ही डॉ कृष्ण जंग राणा द्वारा रचित “तलाश” से गुजरने का सुअवसर मिला तो जाना—
जिन्दगी नीरस बनाकर छोड़ना क्यों कर भला
आँख खोलो ख्वाब देखो, प्यार का हो सिलसिला ।
बस जी लो, क्योंकि जीवन के यही चार पल जो गुजरने हैं, वही पल तो अपने होने वाले हैं । ऐसे में क्यों ना हम कुछ ऐसा कर जाएँ कि हमारे बाद भी हमारी तसवीर अलफाजों में जिन्दा रहे, तभी तो —
जिन्दगी को प्यार से लबरेज कर दो तुम
इश्क का पैगाम सब के दिल में भर दो तुम ।
डॉ राणा की लेखनी की सबसे बड़ी खासियत है उनके शब्दों की सहजता जहाँ भावनाएँ बहुत ही सरलता से व्यक्त होती हैं । आज के समय में जब हम सभ्यता का चोला ओढ़े हुए हैं और यह दम भरते हैं कि हम इंसान हैं तभी अगर कोई यह कहता है कि—
आदमी को आदमी कहना कठिन क्यों हो रहा है
गिर चुका हो आँख से जो फिर उठाना जोर है क्या ।
तो इन्हीं दो पंक्तियों में आज के समाज का वो चेहरा हमारे सामने आ जाता है जिसे यकीनन सभ्य नहीं कह सकते हम ।
और जब हमारे चारो ओर की दुनिया ऐसी ही हो, फिर तो यह भी कह सकते हैं कि —
खुद लगाई आग में हम जल रहे हैं
अब भला क्यों हाथ अपने मल रहे हैं ।
राह पथरीली नजर कमजोर है पर
जिन्दगी सर पर उठाए चल रहे हैं ।
इसी बीच जिन्दगी में बस एक ऐसा अहसास हमारे साथ होता है, जिसके भरोसे ही हम सारी जिन्दगी तय कर लेते हैं । कभी अतीत की यादें हों या फिर किसी अपनों का साथ हो और इन सबके दरमियाँ प्यार का अहसास हो तो उम्र गुजर ही जाती है क्योंकि, जीने का बहाना हमारे साथ होता है ।
कभी तो हम कहते हैं कि —
गर तुम्हें है प्यार पाना, प्यार कर लो तुम
लूट कर दिल का खजाना प्यार कर लो तुम ।
किन्तु बावजूद इसके एक इंसानी फितरत से भी हम बँधे होते हैं जहाँ कुछ भूलना आसान नहीं होता है और तब लगता है—
जिन्दगी आसान सी कटती नहीं है
बेरहम ख्वाहिश भी तो घटती नहीं है ।
है बहुत आसान कहना प्यार कर लो
पर भला क्यों दुश्मनी मिटती नहीं है ।
इसे सुनिए …
हमें जब कुछ हासिल होता है तो हम उसकी कीमत कम आँकते हैं और अक्सर उससे अधिक पाने की चाहत में जो मिला है, उसे भी दिल से स्वीकार नही कर पाते हैं और ऐसों के लिए तलाश की इन पंक्तियों पर नजर डालें कि—
दर्द दिल में जब उठे रोना जरुरी है
पर खुशी थोड़ी भी हो हँसना जरुरी है ।
इतना ही नहीं अगर हार मिली हो तो—
हारकर चुपचाप रहना है नहीं अच्छा
हौसले के साथ ही बढ़ना जरुरी है ।
चार दिन की जिंदगी को हम शिकवा–शिकायत में गुजार देते हैं । दुश्मनी दिल से निकल नहीं पाती, साजिशों का दौर चलता ही रहता है, ऐसे में आपका कहना है कि—
रंजिशों से है भरी ये जिन्दगी अपनी
अपने दिल में प्यार को बोना जरुरी है ।
“तलाश” की कौन सी पंक्तियाँ लूँ और कौन सी न लूँ यह असमंजस की स्थिति सामने है क्योंकि, संग्रह का हर शेर जिन्दगी की खुली दास्तान है । प्यार, सीख, शिकवा, शिकायत सभी मिलते हैं “तलाश” में ।
सब के दिलों में चाह का प्याला बड़ा लगा
है ख्वाहिशें इतनी बड़ी कि दिल डरा लगा ।
पर जिन्दगी रुकती कहाँ है, वो अपनी गति से चलती ही रहती है और इंसान उसके साथ ही हर रूप में जीना सीख ही जाता है—
सारा आलम खुदी से हारा है
फिर भी जीवन बहुत दुलारा है ।
पर एक चिढ़, जो व्यवस्था के प्रति है, समाज और देश की बिगड़ती अवस्था के प्रति है, वह भी शिद्दत से व्यक्त हुई है—
ऐसी दुनिया मुझे कुबूल नहीं
जिसमें हैवानियत का नारा है ।
देश अपना सा क्यों नहीं लगता
मुझको ऐसा नहीं गँवारा है ।
ऐसी ही भावना निम्न शेर में भी है—
आदमी क्यों गिर रहा है कब वो सुधरेगा
आदमी ही आदमी का दिल जलाता है ।
बहुत कम लोग ऐसे होते हैं जो खुद को खुद की तराजु में तौलते होंगे और अपनी खामियों से रुबरु हो पाते होंगे —
कुछ दिखावा मत करो तुम जिन्दगानी में
प्यार को तुम जिन्दगी से तोलकर देखो ।
क्या करोगे दूसरों की नुक्ताचीनी तुम
खुद ही अपने आप को तुम मोलकर देखो ।
इस संग्रह में ८७ गजलें शामिल की गई हैं । गजलगो राणा ने अपनी जिन्दगी के ८७ बेहतरीन वर्ष के सफर को तय किया है और तलाश में संग्रहित ८७ गजलें आपके उन अनुभवों से भरे गुजरे हुए ८७ वर्षों का एक प्रतीक है । उनकी बढ़ती उम्र के साथ ही यह संख्या भी अनवरत रूप से बढती रहे, हम पाठकों की तो यही अभिलाषा है । हिन्दी उर्दु के शब्दों का सम्मिश्रण और अंदाज–ए–बयाँ ने तलाश को पुरअसर बनाया है । सीधी सहज अभिव्यक्ति जो बहुत ही आसानी से पढ़ने वालों को व्यक्त भाव से परिचित करा जाती है ।
डॉ राणा से मैं जब भी मिली तो सायास नहीं, अनायास ही मैं उनसे प्रभावित होती गई । शांत, सहज, सौम्य और सरल व्यक्तित्व, चेहरे पर एक स्मित मुसकान, एक पुरअसर आवाज आपकी विशेषता है । जब आप अपनी लिखी हुई गजलों को गुनगुनाते हैं तो एक दिलकश शमा तो निश्चित तौर पर बन जाता है । एक और विशेषता है उनकी, अपनी बातों को व्यक्त करने का अच्छा सलीका उन्हें आता है, और वही सलीका उनकी लेखनी में भी दिखाई देती है । जब व्यक्ति अंतर्मन के द्वंद में जकड़ा रहता है और वस्तु और विचार के उद्भव पर सोचता है तो कह उठता है—
जिन्दगी जाने कभी तो रंग लाएगी
सोचता हूँ जिन्दगी फिर गीत गाएगी ।
दर्द को भी तुम खुशी से चूम लो यारों
चोट अपने दर्द को भी भूल जाएगी ।
जीवन में तलाश कभी समाप्त नहीं होती । उम्र चाहे जो हो, किसी ना किसी अव्यक्त की तलाश हमारे दिलों में हमेशा जिन्दा रहती है । अपने हासिल से कभी हम खुश होते हैं तो, कभी शिकायतें भी हमारी जुबान पर आती ही है । यह स्वाभाविक स्वभाव होता है मानव–मन का । इसलिए हमें प्यार करना भी आता है, नाराज होना भी आता है । छुपाना भी आता है और इजहार करना भी । रुठना भी आता है और मनाना भी । सीधी सहज परिभाषा गजल की अगर कुछ है तो वो यह है कि गजल दो प्यार करने वालों की गुफ्तगु का नाम है । पर “तलाश” में प्यार तो है ही, साथ ही अपने आस पास के लिए चिन्ता भी है और मानव से कुछ सार्थक कर जाने की गुजारिश भी । एक ऐसा संग्रह जो साहित्य जगत की तलाश को जरुर पूरी करेगी । ईश्वर से यही प्रार्थना है कि गजलगो डॉ. राणा की तलाश कायम रहे और उसे पाने की अनवरत कोशिशें भी साथ–साथ चलें क्योंकि, यही कोशिशें शब्दों के माध्यम से पन्नों पर उकेरी जाती रहेंगी और हम उससे धन्य होते रहेंगे —
आपका कहना है कि —
जिन्दगानी की कहानी कौन जाने है
आसमाँ की मेहरबानी कौन जाने है ।
कुछ गुलाबी ख्वाब में जीते रहे हैं हम
टूट जाए कब रवानी कौन जाने है ।
किन्तु हमारी तो यही चाहत होगी आपके ही शब्दों में कि—
सुखनवर ना रहें फिर भी जमाना याद करता है
लिखे उनकी गजल को भी बयाँ अँदाज करता है ।
तुम्हारी जिन्दगी का भले उनवान जो भी हो
तुम्हारा काम ही तुमको सरे नायाब करता है ।
बस आपके शब्द, आपका अहसास और जिन्दगी के प्रति आपकी मुहब्बत कायम रहे और हम हमेशा आपके आशीर्वाद के वटवृक्ष के साए में रहें ।
डॉ. श्वेता दीप्ति
पूर्व अध्यक्ष केन्द्रीय हिन्दी विभाग
त्रिभुवन विश्वविद्यालय, कीर्तिपुर ,काठमान्डौ, नेपाल
सम्पादक हिमालिनी हिन्दी मासिक पत्रिका काठमान्डौ ।







