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हिमालिनी, अंक मार्च 2019 |पति या पत्नी की मृत्यु के बाद जो बिना दूसरी शादी किए रह जाते हैं उसे ही हमारे समाज में विधुर या विधवा कहा जाता था पर आज उन्हें एकल कहने का चलन प्रचलित हो रहा है । पहले पति की मौत के बादपत्नी शादी नहीं कर सकती थी किन्तु पति को शादी करने की छूट थी । पत्नी की मौत के बाद अगर पति दूसरी शादी नहीं करता तो उसे पूजा पाठ या रसोई में प्रवेश करने पर प्रतिबंध लगा दिया जाता था । मान्यता उयह थी कि पत्नी के बिना पति की पूजा ईश्वर को स्वीकार नही है सभी बेकार चले जाते हैं जैसा कि हमारे धर्म ग्रंथों में भी उल्लेख है इसलिइ पुरुषों को दूसरी शादी करनी ही होती थी । इस कारण से वृद्धावस्था में भी पुरुष शादी करते थे ।

source:http://nari.ekantipur.com/news/2018-12-21/20181221114246.html

६० वर्ष के वृद्ध ८ वर्ष की किशोरी से शादी करता है इस अवस्था में नेपाली समाज में विधवाओं की संख्या बहुत अधिक पाई जाती हैं । किन्तु आज के समय में यह विकृति काफी हद तक कम हो गई है । समाज के दृष्टिकोण के कारण वृद्धावस्था में शादी करने की बाध्यता अब पुरुषों में नहीं है । आज महिला भी पति की मौत के बाद दूसरी शादी कर सकती हैं किन्तु यथार्थ में यह आज भी मुश्किल ही है एकल महिला के लिए यह उतना आसान नहीं है । क्योंकि अगर बच्चे साथ हैं तो उसे पालने की मजबूरी होती है जो स्वाभाविक तौर पर दूसरा पति स्वीकार करने की मनोदशा में नहीं रहता है दूसरी बात कि समाज आज भी एकल महिला की शादी को सहजता से स्वीकार नहीं करता है वहीं जो पुरुष एकल महिला से शादी करता है तो उसे भी सही नजर से नहीं देखा जाता है । । इसकी वजह से पुरुष भी यह जोखिम नहीं लेना चाहता है । एकल महिला को दूसरी शादी के लिए सही व्यक्ति का चुनाव करना भी मुश्किल होता है क्योंकि ठगे जाने का डर बना रहता है ।
शब्द और परिभाषा बददने से पात्र और प्रवृत्ति नहीं बदलता ।

विधवा या विधुर कहने के बदले एकल कह देने मात्र से समाज की सोचने की दृष्टि नहीं बदलती । देखा जाय तो समाज की बदलती मनोदशा से एकल महिला की स्थिति में बदलाव अवश्य आया है । शब्द से अधिक समाज की सोच में परिवर्तन की आवश्यकता है । एक समय वह भी था जब पत्नी को पति की चिता में साथ ही जला दिया जाता था । आज सतीप्रथा क उन्मूलन हो चुका है । परन्तु सोच की आग आज भी जल रही है । कुछ समय पहले जब राष्ट्रपति विद्या भंडारी विवाह पंचमी पर जनकपुर गई थी तो वहाँ हुआ वह निन्दनीय था । यानि आज भी मानसकिता पूरी तरह नहीं बदली है ।
दक्षिण एसियाली देशों में एकल महिलाएँ उल्लेख्य रूप में राष्ट्रप्रमुख तथा सरकार प्रमुख बनी हैं पर एकल महिलाओं के लिए सामाजिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक जो व्यवहार है दक्षिण एसिया के देशों में वह सबसे अधिक अमानवीय है । आज भी उनके लिए समाज और परिवार की सोच बहुत अच्छी नहीं है । आज भी एकल महिला को अभिशाप और कलंक ही माना जाता है । उन्हें कई बार मानसिक और शारीरिक यातना का शिकार होना पड़ता है । एकल महिला चाहे धनी हो या गरीब सामाजिक, धार्मिक तथा साँस्कृतिक के नाम पर उन्हें यातनाएँ दी जाती हैं ।
मृत्यु एक सामान्य प्रक्रिया है, पर इसका दोष पत्नी पर लगाया जाता है तथा मनहूसियत का नाम देकर धिक्कारा जाता है । और घर के शुभ कामों में सम्मिलित नहीं किया जाता है । उन्हें सजने सँवरने का अधिकार नहीं होता । पुरुष को दूसरी शादी का हक होता है पर महिलाओं को नहीं । उन्हें अकेले रहने के लिए बाध्य किया जाता है । ०६८ के जनगणना के अनुसार एकल महिलाओं की संख्या निर्धारित नहीं की जा सकती है । एक संस्था द्वारा सन् २०१३ में सार्वजनिक तथ्यांक नेपाल में एकल महिलाओं की संख्या ४ लाख ९८ हजार ६ सौ ६ थी । मानव अधिकार के लिए महिला समूह द्वारा सार्वजनिक एक दूसरे प्रतिवेदन में एकल महिला की संख्या कुल जनसंख्या का ६ दशमलव ७ प्रतिशत उल्लेख किया गया है ।
विवाह की उम्र के आधार पर १० से १९ वर्ष के समूह की एकल महिला सबसे अधिक है । इस समूह में ७५ दशमलव शून्य ४ प्रतिशत अर्थात् ३ लाख ७० हजार ६ सौ ८७ एकल महिला हैं । प्रतिवेदन के अनुसार १० वर्ष से कम उम्र की एकल महिलाओं की संख्या २६ हजार १ सौ ६२ अर्थात् ५ दशमलव ३० प्रतिशत है । इसी तरह एकल महिलाओं में से १६ दशमलव ५० प्रतिशत शहरी क्षेत्र के तथा ८३ दशमलव ६९ प्रतिशत हिन्दू धर्म सम्प्रदाय के हैं । जातीय आधार में क्षेत्री समुदाय में सबसे अधिक ८९ हजार ५ सौ ६८ और सबसे कम कुसुन्डा में ५ एकल महिला हैं । एकल महिलाओं में से ५६ दशमलव ८ प्रतिशत के पास जमीन का स्वामित्व नहीं है वहीं ४२ दशमलव ६ प्रतिशत के पास जमीन है । जनयुद्ध के बाद हजारों महिला एकल जीवनयापन कर रही हैं । शताब्दी से एकल महिलाएँ रुढिवादी परम्परा के नाम पर प्रताडित और शोषण का शिकार हो रही हैं । वैसे तो कई संस्थाएँ इस दिशा में काम कर रही हैं और उनका उद्धार का प्रयास कर रही हैं ।
महिला बालबालिका तथा समाजकल्याण मन्त्रालय ने एकल महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा कोष संचालन में लाया है । मन्त्रालय ने ०७० से नियमावली संचालन में लाया है । मन्त्रिपरिषद ने ०७० जेठ ९ गते उक्त नियमावली स्वीकृत किया है । विपन्न, एकल महिलाओं के हक–हित के संरक्षण तथा प्रवद्र्धन करने के उद्देश्य से उक्त नियमावली लाया गया है । आर्थिक दृष्टि से विपन्न, विधवा, सम्बन्धविच्छेदित महिला, ३५ वर्ष की अविवाहित, पति अगर पाँच वर्ष से ज्यादा समय से लापता, पति से अलग हुइृ महिला को एकल महिला की संज्ञा दी गई है । ।
गाँव तथा दूरदराज की महिलाओं के बीच राज्य द्वारा निर्धारित इन नियमों को पहुँचाना आवश्यक है । सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से कमजोर तथा विपन्न एकल महिलाओं का आवश्यक सीपमूलक तालीम, स्वरोजगार कार्य सञ्चालन, उद्धार, राहत तथा पुनस्स्थापना, औषधिपचार, कानूनी सहायता लेने के विषय में नियमावली के नियम ४ के अनुसार आवश्यकतानुसार ले सकती हैं । इस प्रकार के शोषण, उपेक्षा या कुसंस्कार से पीडि़त महिलाओं को समयअनुसार विकसित करना आवश्यक है ।
महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा
तुलनात्मक रूप में देखने पर शिक्षित एकल महिला को समाज का देखने का नजरिया अलग होता है । इसलिइ महिलाओं की शिक्षा पर बल देना चाहिए । शिक्षा का महत्तव उन्हें बताना चाहिए और देश के विकास में भी शिक्षा की महत्तवपूर्ण भूमिका होती है इसलिए भी सभी को शिक्षित करने का दायित्व सरकार का है और उसे पहल करनी चाहिए । शिक्षा ही आत्मनिर्भर बनाता है और आत्मबल बढाता है । पर देश की विडमबना है कि आज भ िशिक्षा का स्तर अत्यन्त कम है ।
आज भी कुल महिला जनसंख्या का ३५ प्रतिशत शिक्षा से वंचित है । पिछले समय में शिक्षा का स्तर बढा है पर पर्याप्त नहीं है । विश्व के कुल निरक्षरों में महिलाओं की संख्या ६७ प्रतिशत से अधिक है । २००१ की जनगणना में महिला साक्षरता दर ४२ दशमलव ८ प्रतिशत दिखाया गया है । उसके एक दशक के बाद सन् २०११ की जनगणना में महिला साक्षरता दर ६५ दशमलव ९ प्रतिशत दिखाया गया है । इसकी अगर पुरूष जनसंख्या से तुलना की जाय तो ११ प्रतिशत का अन्तर दिखाई देता है ।
जनगणना २०११ में पुरूष जनसंख्या की साक्षरता प्रतिशत ७१ दशमलव १ प्रतिशत दिखाया गया है । जिस देश की नारी शिक्षित होती है उस देश का विकास स्तर ऊँचा होता है यह उदाहरण भी है । नारी को उचित शिक्षा अगर दी जात िहै तो परिवार ही नहीं समाज और देश भी शिक्षित हाता है । शिक्षा मन्त्रालय के अनुसार कक्षा १ से १२ तक अध्ययन करने वाले ७५ लाख ४२ हजार ३ सौ ९३ विद्यार्थी में से छात्र से अधिक छात्राओं की संख्या अधिक होने का तथ्यांक है । उक्त तह में अध्ययनरत छात्राओं की संख्या ३८ लाख २२ हजार ५ सौ ८० है पर उसी तह में अध्ययनरत छात्रों की संख्या ३७ लाख १९ हजार ८ सौ १३ है ।
उच्च शिक्षा में महिलाओं से पुरुष अधिक अध्ययनरत होने का तथ्यांक है । कुल ५ लाख ६९ हजार ६ सौ ६५ विद्यार्थी उच्च शिक्षा में अध्ययनरत हैं वहीं उच्च शिक्षा में अध्ययनरत महिलाओं की संख्या २ लाख ७० हजार ८ सौ ६ का सरकारी तथ्यांक है । उच्च शिक्षा अध्ययनरत पुरुषों की संख्या २ लाख ९८ हजार ८ सौ ५९ है । अनौपचारिक शिक्षा अध्ययनरत महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में ६ लाख से अधिक है । सामाजिक, सांस्कृतिक एवं परिवार की वैचारिक पृष्ठभूमि के कारण महिला शिक्षा की शिक्षा प्रभावित होती है । गरीब राष्ट्र के कई घरपरिवार में परम्परागत अन्धविश्वास एवं कुसंस्कृति के कारण बालिकाएँ विद्यालय नहीं जा पाती हैं । इस दिशा में कदम उठाना आवश्यक है ।
सर्वोत्तम नारी से साभार

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