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किसी भी रूप में इसी धरती पर रहो कल्याणी ! : संजय कुमार सिंह

 

गंगा सप्तमी पर संजय कुमार सिंह जी की कुछ कविताएँ ।

नमामि गंगे

संजय सिंह की कविताएँ

१ पुनर्वास !

गंगे !

आज जब हृदय की प्यास

उभर आयी है होठों पर

दूर तक फैल–पसर रही है आत्मा पर

व्यथा की परछाईं

एक–एक कर झुलस रहे हैं  

इच्छाओं के कल्प–तरु

और विकल हो रहे हैं मन–प्राण !

तब तुम क्यों सूख रही हो ?

सूख कर कौन सी नदी मर गयी,

जो तुम मर जाओगी ?

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तुम बहो ! मेरी अंतश्चेतना में अमृता…

यह सही है भागेश्वरी

कि पुण्य ही जाता है पुण्य के पास

पर आज मैं आया हूँ तुम्हारे पास

दुख की तप्त रेत पर चल कर

मेरे मन की मरुभूमि को भी

चाहिए सजल प्रवाह

कल कल गति !

किसने कहा मोक्ष ?

मुझे जीवन चाहिए गंगे !

बहो !बहो ! बहो !

चेतना में चिन्मय धार बनकर

देह में रस धार बन कर !

हर हर गंगे !

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धरती पर जो माँगे मोक्ष

मैं नहीं माँगूँगा मोक्ष

मैं तो अभी जीवन माँग रहा हूँ माँ

तुम बहो, मेरे रिक्थ के ऋषिकेश में

हृदय के हरिद्वार में

प्राण के प्रयाग में

वाणी की वाराणसी में

भाग्य के भागलपुर में

हिमालय से हुगली तक

तुम बहो !

सृजन के सुंदरवन में

फल और फूल बनकर

किसी भी रूप में इसी धरती पर रहो

कल्याणी !

धरती से कभी मत रुठो

रूठ भी जाओ, तो

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हृदय की गंगोत्री से निकल कर

आँखों में नदी बनकर बहो….

बहोगी तुम सतत, तो जीवन है

यह नश्वर संसार भी अमर है

तुम्हारा बहना जरूरी है

इस कलिकाल में पाप ताप मोचिनी !

हर हर गंगे ! गंगे !! गंगे !!!

संजय कुमार सिंह, प्रिंसिपल ,अररिया कालेज अररिया।

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