Tue. Oct 15th, 2019

मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कुराना भी है : मजाज़

असरारुल हक मजाज़ या मजाज़ लखनवी (जन्म: 19 अक्तूबर 1911—देहांत: 5 दिसंबर 1955) तत्कालीन साहित्य जगत के सुधारवादी और बागी शायर थे. इस शायर ने उत्तर प्रदेश में प्रचलित भाषा का भी प्रयोग किया, जैसा कि ‘नन्ही पुजारिन’ में दिखता है. उन्होंने इसमें छोटी पुजारिन को सीता कहा है. उनकी मानवता और धर्मनिरपेक्षता उनके इस शेर में दिखती है: ‘हिंदू चला गया न मुसलमान चला गया/इनसान की जुस्तजू में इक इनसान चला गया.’

उस दौर में उर्दू साहित्य में वामपंथ का बोलबाला था जिसमें धर्मनिरपेक्षता और इनसानियत पर जोर था. हिंदू-मुस्लिम एकता के बड़े पैरोकार और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों का पालन करने वाले मजाज़ ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का तराना लिखा है: ‘यह मेरा चमन है, मेरा चमन/मैं अपने चमन का बुलबुल हूं.’

यह शायर इतना संवेदनशील और धुन का पक्का था कि हर बात को दिल पर ले लेता और शायद इसी वजह से जीवन पर शराब पीता रहा. तीन बार उन्हें नर्वस ब्रेकडाउन हुआ (रांची के मानसिक रोग अस्पताल—मेंटल असाइलम—में मजाज़ की मुलाकात बांग्ला के दिग्गज कवि काजी नजरुल इस्लाम से हुई और उन्होंने मजाक में कहा कि (अगर असाइलम में ही रहना है तो ) वे इस मेंटल असाइलम की जगह लाहौर या ढाका जाकर असाइलम (पनाह) मांग सकते हैं.) मजाज़ बंटवारे का दंश झेलने वाले देश और उम्मीद तथा बदलाव के प्रतीक थे. वे लखनऊ छोड़कर अलीगढ़ और फिर दिल्ली आ गए जिससे उन्हें संभलने का मौका मिले. लेकिन लोगों की बेरुखी की वजह से यह शायर एक सर्द रात को एक मधुशाला में चल बसा.

बर्बाद-ए-तमन्ना पे अताब और ज्यादा
हाँ मेरी मोहब्बत का जवाब और ज्यादा

रोएँ न अभी अहल-ए-नज़र हाल पे मेरे
होना ही अभी मुझको खराब और ज़्यादा

आवारा और मजनूँ ही पे मौकूफ नहीं कुछ
मिलने हैं अभी मुझको खिताब और ज़्यादा

उठेंगे अभी और भी तूफ़ान मेरे दिल से
देखूंगा अभी इश्क़ के मैं ख्वाब और ज़्यादा

टपकेगा लहू और मेरे दीदा-ए-तर से
धडकेगा दिल-ए-खाना-खराब और ज़्यादा

होगी मेरी बातों से उन्हें और भी हैरत
आयेगा उन्हें मुझसे हिजाब और ज़्यादा

देखना जज़्बे मोहब्बत का असर आज की रात
मेरे शाने पे है उस शोख़ का सर आज की रात

और क्या चाहिय अब ये दिले मजरूह तुझे
उसने देखा तो बन्दाज़े दीगर आज की रात

फूल क्या खार भी है आज गुलिस्ता बकिनार
संग्राज़ है निगाहों में गुहार आज की रात

महवे गुल्गासत है ये कौन मेरे दोष बदोश
कहकहा बन गयी हर राहगुज़र आज की रात

फूट निकला दरो दीवार से सैलाब निशात
अल्ला अल्लाह मेरा कैफ नज़र आज की रात

सब्नामिस्ताने तजल्ली का फशु क्या कहिय
चाँद ने फेक दीया रख्ते सफ़र आज की रात

नूर ही नूर है किस सिम्त उठाऊं आँखें
हुस्न ही हुस्न है ता हद-ए-नज़र आज की रात

कस्र्ते गेती में उमड़ आया है तुफाने हयात
मौत लरजा पशे परदे दर आज की रात

अल्ला अल्लाह वो पेशानीय सीमी का जमाल
रह गयी जम के सितारों की नज़र आज की रात

आरिजे गर्म पे वो रेंज शफक की लहरे
वो मेरी निगाहों का असर आज की रात

नगमा-ओ-मै का ये तूफ़ान-ए-तरब क्या कहना
मेरा घर बन गया ख़ैयाम का घर आज की रात

नर्गिस-ए-नाज़ में वो नींद का हल्क़ा सा ख़ुमार
वो मेरे नग़मा-ए-शीरीं का असर आज की रात

मेरी हर सांस पे वह उनकी तव्जाहा क्या खूब
मेरी बात पे वह जुम्बिशे सर आज की रात

वह तबस्सुम ही तबस्सुम का ज़माले पैहम
वह महब्बत ही महब्बत की नज़र आज की रात

उफ़ वह वाराफतगीये शौक में एक वहमें लतीफ़
कपकपाते हुए होंठो पे नज़र आज की रात

अपनी रिफत पे जो नाजा है तो नाजा ही रहे
कह दो अंजुम से की देखे न इधर आज की रात

उनके अलताफ का इतना ही फशु काफी है
कम है पहले से बहुत दर्दे जिगर आज की रात

आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *