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हिंदी साहित्य के पुरोधा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

 

पुण्यतिथि विशेष 19 मई

हिंदी साहित्य के पुरोधा आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का हिन्दी साहित्य में योगदान कभी नकारा नहीं जा सकता और कबीर जैसे महान संत को दुनिया से परिचित कराने का श्रेय भी उनको ही जाता है। दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रो. सुधीश पचौरी ने एक मुलाकात में कहा था कि रचनात्मक मेधा के धनी द्विवेदीजी रामचंद्र शुक्ल के बाद बहुत बड़े साहित्यकार हुए। उनके ललित निबंध अद्भुत हैं।

साहित्यकार हरीश नवल कहते हैं कि रामचंद्र शुक्ल पहली परंपरा के आलोचक रहे जबकि द्विवेदी जी दूसरी परंपरा के आलोचक थे। उनका यह भी मानना है कि द्विवेद्वी जी आलोचक के साथ बहुत बड़े रचनाकार भी थे। पचौरी और नवल दोनों का कहना है कि आज कबीर द्विवेदी की वजह से ही दुनिया के सामने हैं। नवल कहते हैं कि द्विवेदी जी ने ही जनमानस को कबीर से परिचित कराया। पचौरी ने कहा कि द्विवेदीजी ने गद्य को विश्लेषणात्मक से रचनात्मक रूप प्रदान किया। उनकी वर्णनात्मकता अद्भुत थी और चरित्र पर अद्भुत पकड़ थी। उन्होंने कहा कि उनकी अद्भुत कृति वाणभट्ट की आत्मकथा में मिथ, यथार्थ और इतिहास का बेजोड़ मिलन है। नवल कहते हैं कि द्विवेदीजी ने हिंदी साहित्य का इतिहास नये ढंग से लिखा जो परंपरा और आधुनिकता का द्योतक है।
उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के दुबे−का−छपरा गांव में 19 अगस्त, 1907 को जन्मे द्विवेदी जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा संस्कृत में ग्रहण की। सन 1930 में इंटरमीडिएट करने के बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिष की परीक्षा पास की। उन्हें आचार्य की उपाधि मिली। द्विवेदी जी अध्यापन के लिए शांतिनिकेतन चले गए। वहां 1940 से 1950 के बीच वह विश्वभारत में हिंदी भवन के निदेशक रहे। रवींद्रनाथ टैगोर, क्षितिमोहन सेन, विधुशेखर भट्टाचार्य और बनारसी दास चतुर्वेदी के प्रभाव से उनमें साहित्यिक गतिविधियों में दिलचस्पी बढ़ी। उन्हें संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, हिंदी, गुजरात, पंजाबी आदि कई भाषाओं का गहरा ज्ञान था। बाद में द्विवेदी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय एवं पजाब विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्रोफेसर बने। वह बतौर ‘रेक्टर’ भी बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से जुड़े।
सन 1957 में द्विवेद्वी जी को पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। उन्हें उनके निबंध संग्रह ‘आलोक पर्व’ के लिए 1973 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पचौरी कहते हैं कि द्विवेदी जी का जीवन संघर्षपूर्ण रहा लेकिन उन्होंने किसी से शिकायत नहीं की। विचार प्रवाह, अशोक के फुल, कल्पलता (सारे निबंध संग्रह), वाणभट्ट की आत्मकथा, चारूचंद्रलेख, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा (उपन्यास), सूर साहित्य, कबीर, कालिदास की लालित्य योजना, हिंदी साहित्य (उद्भव और विकास), हिंदी साहित्य का आदिकाल आदि उनकी श्रेष्ठ और अद्भुत साहित्यिक कृतियां हैं। द्विवेदी जी का 19 मई, 1979 को निधन हो गया। जब उनका निधन हुआ तब वह उत्तर प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष थे।

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